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आवरण कथा ३
 
सुरक्षा के लिए नाकाफी कानून

 

जिस देश में औरतों को देवी का दर्जा दिया जाता है और धरती को माता का सा सम्मान उसी देश में दामिनी जैसे जघन्य कांड भी होते हैं। सतही तौर पर देखने पर यह विरोधाभास जान पड़ता है। लेकिन यह हमारे समय, समाज और देश का एक खौलता सच है जिससे कदम दर कदम औरतों को बावस्ता होना पड़ता है। सामाजिक मानसिक बुनावट तो महिलाओं की बदतर हालत के लिए जिम्मेदार है ही मगर उनकी सुरक्षा के लिए बने कानून भी पर्याप्त नहीं हैं। क्या हैं महिलाओं की सुरक्षा को लेकर बने कानून, एक तथ्यगत विवेचना

 

    बीते दिनों सिंगापुर में जो बाती बुझी उसे दिल्ली के लोगों ने थाम लिया। एक जिस्म से निकली रूह बेहिसाब जिस्मों में दाखिल हो गयी। तहरीर चौक जैसा समा बांधती जंतर मंतर की मशालें उदासी से भीगी थीं मगर कठोर इरादे से रोशन भी थीं। शांति, सादगी और अधिकार के साथ औरतें हक पाने को उठ खड़ी हुईं। बुलंद होती हुई आवाजों का मतलब साफ था कि औरतों की हिफाजत के लिए बने कानून और शासन का तंत्र नाकाफी है। 

    बलात्कारी को सजा देने के लिए तरह-तरह के सुझाव आ रहे हैं। मसलन बलात्कार के दुर्लभ मामले में दोषी को नपुंसक बना दिया जाए। बलात्कार के मामलों के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए जाए। केस का निपटारा तीन महीने में हो और दोषियों को ३० साल तक की सजा दी जाए। सरकार भी महिलाओं पर हो रहे अपराधों को रोकने के लिए ऐसी सजा देने पर विचार कर रही। 

    देश के महिला संगठन छात्र संगठन और तमाम कानूनविद मांग कर रहे हैं कि महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के प्रति कड़े से कड़े कानून बनाए जाने चाहिए। इस पूरे मामले में जहां पुलिस व्यवस्था पर गहरे सवाल उठे हैं तो वहीं भारतीय कानून व्यवस्था भी कहीं न कहीं कटद्घरे में खड़ी होती नजर आई। वैसे भारत में कई कानून बहुत कड़े हैं, बशर्ते पुलिस बिना राजनीतिक या प्रभावशालियों के दबाव के उन्हें अमल में लाए। 

    महिला की सुरक्षा के लिए भारतीय कानून जो भी दावा करते हैं उनमें बहुत खामियां हैं। बलात्कार होने पर पीड़ित की मेडिकल जांच की जाय। यह अभी भी अवैज्ञानिक और द्घटिया तरीका है। इस पर ह्‌यूमन राइट्स वॉच ने भी कड़ी आलोचना की है। मानवाधिकार संगठन ने कहा कि बलात्कार पीड़ित के साथ जांच के नाम पर होने वाली इस अभ्रदता पर पाबंदी लगे। इस संगठन ने भारत में बलात्कार पीड़ित पर किए जाने वाले फिंगर टेस्ट की कड़ी निंदा की है। बलात्कार के बाद भारत में 'फिंगर टेस्ट' के तहत डॉक्टर उंगली डालकर इस बात की जांच करते हैं कि लड़की 'यौन संबंध बनाने की आदी' है या नहीं। संगठन के मुताबिक भारतीय डॉक्टरों का यह तरीका वैज्ञानिक नहीं है। इस टेस्ट पर सुप्रीम कोर्ट ने भी अपना आदेश दे चुका है कि ऐसी कोई भी जांच मैनुअल न हो। बलात्कार पीड़ित की कॉल्पोस्कोपी टेस्ट होना चाहिए लेकिन ऐसा नहीं होता। 

    कानून में संशोधन उसकी खामियों का इलाज तो कर सकता है। लेकिन उनका क्या होगा जो इन कानूनों को ठीक तरीके से लागू ही नहीं करते। अगर महिलाओं की हिफाजत के लिए बने कई कानूनों को ठीक तरीके से लागू किया गया होता तो जिल्लत झेल रही आधी आबादी पर अत्याचार कुछ तो कम होते, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कई कानून तो विशेषकर महिलाओं की हिफाजत के लिए बने हैं। कानून की संख्या बढ़ने के साथ- साथ महिलाओं पर जुल्म भी बढ़ते गए हैं।

    कानून को और कड़ा बनाने की कसरत भी तब शुरू हुई जब गुस्से में जनता सड़कों पर आई। ऐसा ही एक गुस्सा ४० साल पहले १९७२ के मथुरा केस के दौरान भी सामने आया जब रपट लिखाने आई नाबालिग से थाने में दुष्कर्म करने वाले पुलिसवाले बरी हो गए। बवाल मच गया। महिला संगठनों ने देशव्यापी आंदोलन चलाया और नतीजतन १९८३ में पहली बार कानून संशोधन कर बलात्कार का कानून कड़ा किया गया। इस कानून संशोधन में पीड़ित की सहमति थी या नहीं यह साबित करना आरोपी की जिम्मेदारी हो गई। अगर पीड़ित कहती है कि उसकी सहमति नहीं थी तो अदालत उसकी बात को ही मानकर चलेगी। कानून में और भी कई बदलाव हुए जैसे अदालत में पीड़ित के चरित्र को लेकर सवाल पूछने पर रोक लगी। दुष्कर्म के अपराध की श्रेणियां बनीं और सजा भी कड़ी की गई। सुप्रीम कोर्ट ने यहां तक व्यवस्था दी कि आरोपी को सिर्फ पीड़ित के बयान पर भी सजा दी जा सकती है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के खिलाफ अत्याचार, यौन उत्पीड़न, मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना देना कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न और छेड़छाड़ तक रोकने के लिए दिशा निर्देश जारी किए। संविधान के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट के आदेश कानून की अहमियत रखते हैं और उन्हें लागू करना सरकार की जिम्मेदारी है।

    इतने कड़े कानून होने के बाद भी महिलाओं  के खिलाफ अपराध होते रहे। इसके लिए कानून नहीं बल्कि इसे लागू करने वाले तंत्र ने अपना काम ठीक से नहीं किया। लिहाजा जरूरत है तो स्वतंत्र, संवेदनशील और सजग पुलिस के साथ त्वरित न्याय प्रणाली की। इसे सुप्रीम कोर्ट के ६ दिसंबर २०१२ के फैसले में देखा जा सकता है जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने त्वरित सुनवाई के कानूनी प्रावधान (सीआरपीसी धारा ३०९) को सख्ती से लागू करने का निर्देश दिया है। इसमें बलात्कार जैसे मामलों की जांच और सुनवाई दो महीनों में पूरी करने की बात कही गई है। साथ ही अदालतों को आगाह किया गया है कि वे बेवजह के स्थगन आदेश न दें। इससे पहले भी दो फैसलों में सुप्रीम कोर्ट इस कानून को सख्ती से लागू करने का निर्देश दे चुका है लेकिन इस पर अमल नहीं हो पाया। महिलाओं के खिलाफ अत्याचार रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेशों पर नजर डालें तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले मील के पत्थर बनते दिखाई देते हैं। वर्ष १९९४ के एक केस का उदाहरण लेते हैं जो दिल्ली डोमेस्टिक वर्किंग वूमेंस बनाम भारत सरकार से संबंधित है। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने दुष्कर्म पीड़ित की मेडिकल जांच, उसे दी जाने वाली कानूनी मदद और पीड़ित को समुचित मुआवजा दिए जाने के बारे में निर्देश दिए। महिलाओं की सुरक्षा और यौन उत्पीड़न रोकने का सुप्रीम कोर्ट का एक अहम फैसला वर्ष १९९७ में आया। यह आज भी कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न रोकने में  अहमियत रखता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जब तक सरकार कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न रोकने के लिए कानून बनाती है। तब तक उनके दिशा निर्देश कानून की तरह लागू रहेंगे। १५ साल बाद भी सरकार कार्य स्थल पर यौन उत्पीड़न रोकने का कानून नहीं बना पाई। ऐसा एक विधेयक संसद में लंबित जरूर है। 

    सुप्रीम कोर्ट द्वारा वर्ष १९९७ में दी गई गाइड लाइंस पूरी तरह लागू नहीं हो सकीं। देश में बहुत से निजी और सरकारी दफ्तर हैं जहां इनका पालन नहीं हो रहा है। इसकी शिकायत फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंची और सुप्रीम कोर्ट ने १९ अक्टूबर २०१२ को मेधा कोतवाल लेले के केस में एक बार फिर सभी राज्यों को सख्ती से गाइडलाइंस लागू करने का आदेश दिया। इतना ही नहीं कोर्ट ने फैसले का दायरा भी बढ़ा दिया और इसमें बार काउंसिल ऑफ इंडिया, सभी बार एसोसिएशन, राज्य बार काउंसिल, मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया, काउंसिल ऑफ आर्किटेक्चर, इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टेड एकाउंटेंट, इंस्टीट्यूट ऑफ कंपनी सेक्रेटरीज और अन्य ऐसी ही विधायी संस्थाओं को भी ये दिशा निर्देश लागू करने का आदेश दिया। इस बीच कोर्ट ने दुष्कर्म और हत्या जैसे जद्घन्य मामलों में दंड देने की दंडनीति पर कई फैसले दिए। फरवरी २००८ में सुप्रीम कोर्ट ने दुष्कर्मी को दस साल की कैद देते हुए कहा कि दुष्कर्म में सजा अभियुक्त या पीड़ित को समाजिक स्तर के आधार पर नहीं बल्कि अभियुक्त के आचरण, पीड़ित की उम्र और अपराध की गंभीरता के आधार पर तय होनी चाहिए। कोर्ट ने यहां तक कहा कि दिए गए दंड में अपराध के प्रति समाज की द्घृणा परिलक्षित होनी चाहिए। उसी साल जुलाई में दुष्कर्म और हत्या के दोषी की फांसी पर मुहर लगाते हुए कोर्ट ने कहा कि उसका अपराध जद्घन्यतम श्रेणी में आता है। दो महीने बाद सितंबर में फिर दुष्कर्मी हत्यारे शिक्षक को फांसी की सजा सुनाते हुए कोर्ट ने एक बार फिर दंडनीति की व्यवस्था की।

    गंभीर अपराधों के अलावा सुप्रीम कोर्ट तो छेड़छाड़ के अपराधों पर भी सख्त रहा। इसी साल नवंबर कोर्ट ने महिलाओं से शारीरिक छेड़छाड़ रोकने के लिए सभी राज्यों को विस्तृत दिशा निर्देश जारी किए। कोर्ट ने सार्वजनिक स्थलों और सार्वजनिक वाहनों में सादे कपड़ों में महिला पुलिस तैनात करने का आदेश दिया। इसके अलावा महत्वपूर्ण स्थानों पर सीसीटीवी कैमरे लगाने को कहा ताकि छेड़खानी की द्घटनाएं न हों और अगर होती हैं तो अपराधी पकड़ा जाए।

    महिलाओं के खिलाफ अपराधों को दो श्रेणी में बांटा जा सकता है। भारतीय दंड संहिता के तहत दर्ज अपराध। आईपीसी में बलात्कार, अपहरण दहेज हत्या, दहेज प्रताड़ना, छेड़खानी और लड़कियों की तस्करी के मामले हैं। जबकि विशेष और स्थानीय कानूनों में अनैतिक देह व्यापार (रोक) कानून, दहेज  कानून, बाल विवाह रोक कानून सती प्रथा रोक कानून और महिलाओं के अश्लील प्रदर्शन रोक कानून है। इसके अलावा राज्य सरकारों ने भी जरूरत के हिसाब से कुछ कानून बनाए हैं। लेकिन असर वहां भी ढीला ही है।

    बहरहाल इस सरकार ने मौजूदा कानून में बदलाव करने के लिए जस्टिस वर्मा की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति बनाई है। इस समिति ने आम लोगों से भी अपील की है कि वे अपने सुझाव दें। समिति ३० दिन के भीतर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी। जो नया कानून होगा वह जस्टिस वर्मा की अगुवाई वाली समिति की सिफारिशों के मुताबिक होगा। बलात्कार के मामलों के लिए कड़ा कानून बनाने में राष्ट्रीय सलाहकार समिति की भी मदद ली जाएगी।

    इसी बीच सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अल्तमस कबीर ने २ जनवरी को दिल्ली स्थित जिला न्यायालय साकेत में फास्ट ट्रैक कोर्ट का उद्द्घाटन किया। इस विशेष अदालत में इस मामले की रोजाना सुनवाई होगी। साकेत के अलावा द्वारका, रोहिणी और तीस हजारी में भी फास्ट ट्रैक कोर्ट ३ जनवरी से शुरू हो गई हैं। 

 

महिलाओं की हिफाजत के कानून

दहेज रोक अधिनियम

सती प्रथा रोक अधिनियम

अनैतिक देह व्यापार रोक अधिनियम

महिलाओं का अश्लील प्रदर्शन रोक अधिनियम

बाल विवाह रोक अधिनियम

मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी एक्ट

हिंदू दत्तक एवं भरण-पोषण अधिनियम

द्घरेलू हिंसा रोक अधिनियम

प्रोहिबिशन ऑफ ईव टीजिंग एक्ट तमिलनाडु (राष्ट्रीय महिला आयोग ने ऐसा ही नया कानून बनाने की सिफारिश की है)

१० लिंग परीक्षण रोक कानून

११ भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की विभिन्न धाराएं

१२ दंड प्रक्रिया संहिता विभिन्न धाराएं

इनके अलावा श्रम, विवाह, गार्जियनशिप एवं हिंदुओं और मुसलमानों के पर्सनल लॉ में भी महिलाओं के हितों के प्रावधान हैं।

 

 
         
 
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  • सुमित जोशी

रामनगर ¼नैनीताल½। उत्तराखण्ड सरकार ने राजकोषीय द्घाटे को देखते हुए शराब की बिक्री के लिए बीच का रास्ता निकाला। स्टेट हाईवे को जिला मार्ग

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