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आवरण कथा
 
महिला मीडिया और माहौल

दिल्ली का सामूहिक बलात्कार कांड अगर मुद्दा बन पाया और शासन-प्रशासन को बैकफुट पर आकर नए कानून बनाने के लिए सोचने पर विवश होना पड़ा तो उसमें सामाजिक चेतना के साथ-साथ मीडिया की भी अहम भूमिका रहेगी। बेशक सोशल मीडिया की भी। सोशल मीडिया तो नया है मगर मीडिया ने महिला उत्पीड़न की खबरों को कभी सामाजिक चेतना कभी मानवीयता तो कई दफा सनसनी की चाशनी में लपेटकर भी पेश किया है। कभी उसकी भूमिका सरहानीय रही है तो कई दफा उस पर उंगली भी उठी है। अभी ज्यादा समय नहीं बीता है जब मीडिया के बनाए माहौल और सामाजिक चेतना के चलते एनसीआर के बहुचर्चित आरुषि हत्याकांड के बंद चैप्टर को न सिर्फ खोला गया बल्कि उस पर नए सिरे से सुनवाई भी हुई 

 

ताजा घटना दिल्ली के सामूहिक दुष्कर्म को लें। इस मामले में कई अखबारों और टीवी चैनल्स ने तो बाकायदा कानून संशोधन कर बलात्कार के लिए फांसी या कैमिकल कैस्टरेशन की सजा के लिए अभियान चलाया हुआ है। उधर प्रेस कांउसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू ने मीडिया के इन अभियानों की समझ और उनसे जुड़े मीडिया हितों को लेकर अपने लेख में कई महत्वपूर्ण सवाल उठाये हैं। काटजू का कहना है कि छत्तीसगढ़ की शिक्षिका सोनी सोरी को नक्सलियों का हमदर्द बताकर पुलिस ने उसके गुप्तांग में कंकड़ ठूंस दिये उसे लेकर जया बच्चन की आंखों में आंसू क्यों नहीं दिखे इसी साल अप्रैल में रांची में एक अधेड़ मजदूर महिला के साथ पहले सामूहिक दुष्कर्म किया गया, फिर उसके जननांग को शराब की बोतल फोड़ कर क्षत-विक्षत कर दिया गया। अंततः उसने दम तोड़ दिया। इस महिला के लिए इंडिया गेट तो छोड़ दीजिए रांची के किसी चौराहे पर एक मोमबत्ती तक नहीं जली। मैंने अपने कुछ पत्रकार मित्रों से पूछा कि इन महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए आप टीवी-अखबार में अभियान क्यों नहीं चलाते। उन्होंने कहा ये अपना टीजी (टारगेट ग्रुप नहीं हैं। आदिवासी दलित मजदूर महिलाओं के साथ तो यह सब होता ही रहता है कहां तक अभियान चलायें। जिन मामलों में मसाला न हो उन्हें कितना खींचा जाये। इन सवालों को परखा जाय तो मीडिया के इस अभियान की तस्वीर कुछ-कुछ साफ हो जाती है। दिल्ली से जुड़े हरियाणा, उत्तर प्रदेश राजस्थान और पंजाब कुछ ऐसे राज्य हैं जो महिलाओं पर हो रहे अमानुषिक कृत्यों में सबसे अव्वल पर हैं। हरियाणा में पिछले दिनों ४० दिनों के भीतर २० बलात्कार के मामले सामने आए। इन मामलों में बलात्कार की शिकार महिलाएं अधिकतर दलित और पिछड़े समुदायों से ताल्लुक रखती हैं और शायद इसी के चलते मीडिया को इन सभी द्घटनाओं में कोई मसाला नजर नहीं आता। 

१९९२ में एक दलित महिला भंवरी देवी के साथ गांव के ही कुछ ऊंची जाति के लोगों ने सामूहिक बलात्कार किया। भंवरी ने साहस दिखाते हुए उन लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कराया। लेकिन जयपुर जिला कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि चूंकि आरोपी ऊंची जाति के हैं तो वे दलित महिला के साथ बलात्कार कर ही नहीं सकते। राजस्थान के एक समाचार पत्र में इस खबर के प्रकाशित होने के बाद यह मामला प्रकाश में आया।  

इस फैसले की खूब आलोचना हुई साथ ही इस फैसले ने हमारे देश की न्यायपालिका के चरित्र को भी उद्घाड़कर रख दिया। इसी तरह का एक मामला उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में अस्सी के दशक में भी सामने आया। बागपत की रहने वाली माया त्यागी के साथ तो पुलिस ने ही बलात्कार करने की कोशिश की और उसके कड़ा विरोध दर्ज कराने पर अमानवीयता की हद तक उस पर जुल्म किए। पुलिस ने ही उसके पति को डकैत करार देकर मार दिया। 

उस लक्ष्मी ओरांग को भी आज मीडिया ने भुला दिया है जिसे गुवाहाटी जैसे शहर में भी दरिंदों ने नहीं बख्शा। उसे सबके सामने निर्वस्त्र कर दिया गया और ऐसे ही उसे पूरे शहर में दौड़ा-दौड़ा कर पीटा गया। इस पूरी द्घटना की क्लिप्स को चैनलों ने बिना किसी शर्म और जवाबदेही के टेलीकास्ट की थी। पांच साल गुजरने के बाद आज भी उसे न्याय नहीं मिल पाया। पिछले साल असम में हुई द्घटना की फुटेज को कई चैनलों ने ज्यों का त्यों प्रसारित कर दिया। हालांकि बात में दबाव बढ़ने पर लड़की के नाम और फुटेज से परहेज किया गया। आखिर मीडिया कैसे भूल गया कि वर्ष २००४ में असम राइफल्स के जवानों ने मणिपुर की एक लड़की थांगजाम मनोरमा की बलात्कार के बाद निर्मम तरीके से हत्या कर दी थी। जिसके बाद दर्जनों महिलाओं ने असम राइफल्स के इम्फाल स्थित कंगला फोर्ट मुख्यालय पर बिलकुल नंगे होकर यह कहते हुए प्रदर्शन किया था कि 'असम राइफल्स हमारा बलात्कार करो।' यह एक ऐतिहासिक प्रदर्शन था जिसकी तस्वीरों ने अगले दिन पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। 

दरअसल आमतौर पर सभी कम्यूनिकेशन माध्यमों चाहे वह फिल्म टीवी विज्ञापन और खबर ही क्यों न हो में औरत की जो छवि पेश की जा रही है उसे लेकर कई सवाल खड़े किए जा सकते हैं। क्योंकि अभी तक तो पहले पेज पर महिला अधिकारों की लड़ाई और भीतर के पन्नों पर उसे प्रोडक्ट की तरह इस्तेमाल कर, मीडिया लड़ाई के बहाने सिर्फ मुनाफा ही कमा रही है। जेसिका लाल, नैना साहनी, कविता हत्याकांड, शेहला मसूद, शोपिया हत्याकांड, आरुषि-हेमराज, रुचिका गिरहोत्रा सभी द्घटनाओं के बाद औरतों पर बढ़ते जा रहे अत्याचारों को लेकर कोई बड़ी बहस खड़ी नहीं हो पाई। इनमें से ज्यादातर को तूल इसलिए भी मिला क्योंकि कहीं न कहीं ये द्घटनाएं राजनीतिक व्यक्तियों या विवादों से संबंिधत थीं। लेकिन इस बार दिल्ली में हुई इस द्घटना से कम से कम शहरी मध्यवर्ग में ही सही महिलाओं के साथ बढ़ते अत्याचारों पर लोगों का ध्यान गया है। इस पूरी मुहिम में मीडिया का योगदान तो जरूर है लेकिन उसने इसे अपने किस कंसर्न को ध्यान में रखकर किया है, इसे भी ध्यान में रखना जरूरी है। दिल्ली में रेप की द्घटना के चार दिन के भीतर ही बिहार में तीन और उत्तर प्रदेश में दो बलात्कार की द्घटनाएं सामने आ चुकी हैं। साफ है कि महिलाओं के प्रति जो आम धारणा समाज में कायम है इस तरह के कृत्य उसी की चरम परिणति है। मीडिया पर शक इसलिए भी है कि अभी तक उसका कोई भी अभियान इस सामाजिक ढर्रे के खिलाफ न होकर पनिशमेंट ओरिएंटेड ही रहा है। समाज में इन कृत्यों के खिलाफ बहस भी उसी सामाजिक बाढ़बंदी के भीतर ही जारी है जिससे फिलहाल तो किसी तरह के समाधान की उम्मीद नहीं है। 

 


प्रष्ठ ७ का शेष

घर पहुंचा और वहां से सोती हुई मनोरमा को उठा लिया। इसके बाद उसी दिन शाम ५ बजे  मनोरमा का शव मिला। इसके बाद असम 

राइफल्स के प्रवक्ता ने कहा कि यह युवती पीपुल्स लिबरेशन आर्मी से संबंधित थी। इसने भागने की कोशिश की तो हमारे जवानों को इस पर गोली चलानी पड़ी। न्याय पाने के लिए परिवार वालों ने रीजनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस की पोस्टमार्टम रिपोर्ट को अस्वीकार कर दिया और बेटी का शव वापस नहीं लिया। इसके बाद इंफाल समेत पूरे मणिपुर में विरोध प्रदर्शन हुए। और मजबूर होकर के मुख्यमंत्री ने जांच के 

आदेश दिए। कमीशन ने जांच की और रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंप दी। आर्मड फोर्स स्पेशल पॉवर एक्ट के कारण इन दोषियों को कोई सजा नहीं दी जा सकी। लेकिन ३१ अगस्त २०१० को गुवाहाटी हाई कोर्ट ने प्रदेश सरकार को आदेश दिया कि वह इस जांच रिपोर्ट को खोले और उस पर जरूरी कार्यवाही करे। अभी तक इस मामले में किसी दोषी को कोई सजा नहीं दी जा सकी है।

 

 


 

इमराना 

अभी तक बात समाज और उनके रखवालों से महिलाओं को हो रहे खतरे की थी। लेकिन उत्तर प्रदेश के मुफ्फर नगर जिले में इमराना नाम की २८ साल की एक महिला के साथ जो हुआ उसने द्घर की चार दीवारी के अंदर भी उसकी सुरक्षा पर सवालिया निशान लगा दिए। यह सुनकर विश्वास नहीं होता कि उसके ससुर ने ही उसके साथ बलात्कार किया। ६ जून २००५ को इमराना के ससुर अली मोहम्मद ने उसके साथ बलात्कार किया। इसके बाद १३ जून को पंचायत ने इमराना को उसके पति के साथ रिश्ता न रखने का आदेश दिया। १३ जून को मामला सामने आया और मोहम्मद को गिरफ्‌तार कर लिया गया। १६ जून को मोहम्मद ज्यूडिसियल कस्टडी में भेजा गया। उनकी जमानत की याचिका को ठुकराते हुए कोर्ट ने उसे १० साल की सजा सुनाई। 


शोपियां कांड

ऐसा ही मामला जम्मू कश्मीर के शोपियां जिले में दो लड़कियों के साथ बलात्कार और हत्या का था। यहां आरोप सीआरपीएफ के जवानों पर लगा। पीड़ित युवतियां निलोफर जान (२२) और अषिया जान (१७) थीं। राज्य सरकार और जम्मू कश्मीर पुलिस ने इस मामले को छुपाने की, कोशिश की। लेकिन जनविद्रोह के बाद ३ जून २००९ को इस मामले की जांच न्याधीश मुजफ्फर अहमद की अध्यक्षता में एक कमीशन को सौंप दी गई। कमीशन ने अपनी ४०० पेज की रिपोर्ट में इस हत्या को परिवारिक रंजिश बताया और मीडिया पर आरोप लगाया कि इसे गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया। लेकिन इस रिपोर्ट से नाखुश जनता के दबाव में १२ अगस्त २००९ को इस मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी गई। सीबीआई ने इस मामले की जांच की और १३ लोगों को गिरफ्तार किया। इनमें ६ डॉक्टरों को सबूत मिटाने के आरोप लगे। साथ ही यह भी कहा कि दोनों लड़कियों के साथ पहले बलात्कार हुआ फिर उनकी हत्या की गई। लेकिन अभी तक दोषियों को सजा नहीं दी जा सकी है। 


सौम्या

वर्ष २०११ में केरल के त्रिचूर में २३ साल की लड़की के सौम्या साथ अर्नाकुलम-शोरानुर पैसेंजर ट्रेन में बलात्कार किया गया। गोविंद चामी नाम के व्यक्ति ने लड़की को पहले चलती टेन से फेंका और फिर वापस लौटकर उसके साथ बलात्कार किया। सौम्या को गंभीर चोटे आईं और ६ फरवरी को उसने दमतोड़ दिया। फास्ट टै्रक अदालत ने इस मामले के दोषी गोविंद चामी को मौत की सजा सुनाई। 


जेसिका लाल

ऐसा ही एक मामला जेसिका लाल का है। जिसे अपनी राजनीतिक ताकत के गुरूर में डूबे मनु शर्मा ने एक छोटी सी बात पर गोली मार दी थी। अपने राजनीतिक रसूख  के बल पर यह व्यक्ति लगातार पुलिस बचता रहा। लेकिन जेसिका की लड़ाई को लोगों ने अपने कंधे पर ले लिया जिससे मनु शर्मा को आजीवन कारावास की सजा हुई। जेसिका की हत्या ३० अप्रैल १९९९ को हुई थी। इस हाईप्रोफाइल केस में मनु शर्मा को २० दिसंबर २००६ को सजा सुनाई गई। यहां भी न्याय की धीमी चाल ने इंसाफ करने में सात साल का समय लिया। आज भी सजा मिलने के बावजूद मनु बेल लेकर जेल से बाहर आता रहता है। पिछले दिनों दिल्ली सरकार ने बीमार मां की सेवा और कुछ पारिवारिक कार्यक्रमों में शामिल होने के लिए मनु को ३० और दिन के पैरोल पर जेल से बाहर आने की अनुमति दी थी। जिसे दोबारा ३० दिन के लिए बढ़ा दिया गया था। इस दौरान मनु नाइट क्लब और पार्टी में नजर आए और उनकी मां सामाजिक आयोजनों में शामिल होती दिखाई दीं। कानून, राजनीतिक रसूख और महिला अधिकार की तो असलियत सामने लाने के लिए तो मनु प्रकरण ही पर्याप्त है।

 
         
 
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  • गुंजन कुमार

 

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