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आवरण कथा
 
जख्म दर जख्म

जिस तरह से १६ दिसंबर वाली द्घटना के बाद देश की जनता और मीडिया में उबाल आया वह पहली बार नहीं है। इससे पहले भी इस तरह के जघन्य कांड होते रहे हैं। समाज और इंसानियत शर्मसार होती रही है और सरकारी हलचलें भी युगलबंदी पर बाध्य हुई हैं। मगर यह सिलसिला थमता नहीं दिख रहा। महिलाओं के खिलाफ बलात्कार के साथ-साथ उनकी निर्मम हत्या के भी मामले सुर्खियों में रहे हैं उनमें से कुछ घटनाओं की याद दिलाता यह लेख

 

चन्द्रपुर कांड 

सबसे पहला चर्चित मामला वर्ष १९७४ में पुलिस कस्टडी में १६ साल की एक बच्ची के साथ महाराष्ट्र स्थित चंद्रपुर के देसाई गंज पुलिस स्टेशन में ही दो कांस्टेबल के बलात्कार करने का था। यह केस इतना पेंचीदा था कि भारतीय दंड संहिता में इसके चलते बदलाव करना पड़ा। पुलिस कस्टडी में हुए बलात्कार की रिपोर्ट लिखाने के लिए इस लड़की के रिश्तेदारों को थाने में आग लगानी पड़ी। इसके बाद मामला अदालत में गया और कोर्ट ने अपने सनसनीखेज फैसले में कहा कि 'यहां ऐसे कोई निशान या जबरदस्ती के सबूत नहीं मिलते जिससे रेप का मामला सामने आए। यहां बेशक सेक्सुअल इंटरकोर्स का मामला बनता है। लेकिन इसके लिए कोई सजा का प्रावधान नहीं है।' इसके बाद मुंबई हाई कोर्ट में अपील दायर की गई और दोषियों को पांच साल की कैद हुई। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि पीड़िता ने इसका कोई विरोध क्यों नहीं किया। क्योंकि कोई विरोध नहीं हुआ इसलिए रेप का केस नहीं बनता। सुप्रीम कोर्ट के इस बयान के बाद महिला समूहों ने इस कानून में बदलाव की मांग की। इसके बाद भारतीय दंड संहिता की धारा ३७६ में ;ंद्ध;इद्ध;बद्ध;कद्ध नए सेक्शन जोड़े गए।


माया त्यागी

उत्तर प्रदेश के बागपत जिले की रहने वाली माया त्यागी साथ पुलिस वालों ने जो हौलनाक हरकत की वह दिल दहला देने वाली है। माया अपने पति ईश्वर सिंह और दो दोस्तों के साथ एक विवाह समारोह में आई थी। पति और उसके दोस्त किसी काम से बाहर गए, उस दौरान माया गाड़ी में अकेली थी। तभी सिविल ड्रेस में एक पुलिस इंस्पेक्टर माया के साथ छेड़खानी करने लगा। इतने में ईश्वर वहां पहुंच गया और उसने पुलिस वाले की पिटाई कर दी। इसके बाद यह पुलिस अधिकारी थाने गया और साजो-सामान के साथ वापस आया। गुस्से से लाल इस पुलिस अधिकारी ने ईश्वर और उसके दोस्तों को गोली मार दी। इसके बाद माया के साथ इस पुलिस अधिकारी और उसके साथियों ने अभद्रता की। उसे निर्वस्त्र करके बागपत बाजार में द्घुमाया, पिटाई की और थाने ले जाकर सामूहिक बलात्कार किया। इस दौरान माया के गर्भ में छह माह का बच्चा था। वर्ष १९८० में हुई द्घटना में १९८८ में न्याय मिला जिसमें ६ पुलिस वालों को फांसी और ४ को आजीवन कारावास की सजा दी गई। लेकिन वर्ष १९८९ में फांसी की सजा को माफ करके इन पुलिस वालों को आजीवन कारावास की सजा दी गई। 


रुचिका गिरहोत्रा

पुलिस वालों की दरिंदगी का सबसे ताजा मामला रुचिका गिरहोत्रा का है। इस मामले में हरियाणा के आई जी पुलिस शंभु प्रताप सिंह राठौर का नाम सामने आया। यहा मामला १९९० में शुरू हुआ जब राठौर ने रुचिका को अपने ऑफिस में बुलाकर मोलेस्ट करने की कोशिश की। शिकायत की गई, जांच हुई जिसमें राठौर को दोषी पाया गया। लेकिन कई राजनीतिक दबावों के कारण यह मामला दब गया। इसके बाद राठौर ने रुचिका के परिवार वालों को परेशान करना शुरू किया। उसके भाई को कार चोरी के आरोप में बंदी बनाया गया। मात्र कुछ ही महीनों में ११ कार चोरी के केस दर्ज कर दिए गए। इन सब बातों से रुचिका इतनी परेशान हुई कि उसने २८ दिसंबर १९९३ को आत्महत्या कर ली। अप्रैल १९९४ में राठौर पर लगे सारे चार्ज वापस ले लिए गए और नवंबर में उसे प्रमोशन मिल गया। वर्ष २००० में यह मामला एक बार फिर खुला और सीबीआई ने १६ नवंबर २००० में चार्जशीट दाखिल की। राठौर अब तक डीजीपी बन चुके थे। उन्हें पद से हटाया गया और सीबीआई की स्पेशल कोर्ट ने उन्हें ६ महीने की सजा और १००० रुपए का जुर्माना लगाया। २५ मई २०१० को इसकी सजा ६ माह से बढ़ाकर १८ माह कर दी। यहां रसूखदार पुलिसवाले को सजा देने में दो दशक से भी ज्यादा लग गए।


भंवरी देवी

महिला शोषण के कुछ ऐसे मामले भी सामने आए जिन्होंने देश में राजनीतिक हलचल पैदा की। ऐसे मामलों में सबसे पहला १९९२ में भंवरी देवी गैंगरेप का मामला है। भंवरी राजस्थान सरकार के वुमन डेवलपमेंट प्रोजेक्ट में निचले स्तर की कार्यकर्ता थीं। वर्ष १९८७ में भंवरी ने अपनी एक पड़ोसी महिला पर बलात्कार की कोशिश के खिलाफ आवाज उठाई। ऐसे ही भंवरी ने अपने क्षेत्र में बाल विवाह को रोकने के लिए भी काम किया। समाज के लिए पूरी तरह से समर्पित इस महिला ने राम करन गुज्जर की नौ माह की बेटी का विवाह रोकने के लिए पुलिस की सहायता ली। इससे गुज्जर समुदाय आहत हो गया और भंवरी का हुक्का पानी बंद कर दिया गया। इतने से ही इस समुदाय का बदला पूरा नहीं हुआ। भंवरी के अनुसार २२ दिसंबर १९९२ को शाम ६ बजे गांव के पांच लाोगें ने उसके पति पर हमला किया। ये पांच लोग राम करन गुर्जर, राम सुख गुर्जर, घ्यार्सा गुर्जर, बदरी गुर्जर और श्रवन शर्मा थे। जब भंवरी अपने पति को बचाने आई तो घ्यार्सा और बदरी ने उसके साथ दुष्कर्म किया। इसके बाद भंवरी न्याय के लिए इधर-उधर भटकने लगी। पहले उसे एफआईआर लिखवाने के लिए अपनी मेडिकल जांच करवानी थी जिसके लिए उसे प्राइमरी हेल्थ सेंटर से सवाई मानसिंह अस्पताल तक भटकना पड़ा। जैसे-तैसे रिपोर्ट लिखी गई। केस को प्राइमरी कोर्ट तक पहुंचने में दो साल लगे। कई तरह से इस अकेली दलित महिला को न्याय के करीब पहुंचने से रोका गया। १९९४ में भंवरी देवी को केस वापस लेने के लिए पैसे ऑफर किए गए। लेकिन भंवरी ने इससे इंकार कर दिया। केस के दौरान पांच जज बदले गए। इसके बाद आए जज ने विवादास्पद तर्क देते हुए भंवरी की अपील को झूठी करार दिया। बकौल जज 'भंवरी के आरोप इस लिए बेबुनियाद है क्योंकि एक उच्च जाति का व्यक्ति किसी दलित महिला का बलात्कार नहीं कर सकता। इसके अलावा भंवरी का कहना है कि उसका बलात्कार चाचा और भतीजे ने मिल कर किया। यह भी संभव नहीं हैं क्योंकि कोई चाचा अपने भतीजे के सामने कैसे बलात्कार कर सकता है।' उन्होंने ५२ द्घंटे बाद हुई चिकित्सीय जांच का भी हवाला दिया और यह भी कहा कि कैसे भंवरी का पति चुपचाप अपनी पत्नी का बलात्कार होते देख सकता है। निचली कोर्ट से भंवरी को निराशा ही हाथ लगी। उधर इस जीत से खुश एक एमएलए ने जयपुर में बेशर्मी से रैली निकाली। 

भंवरी ने हिम्मत नहीं हारी और इंसाफ के लिए लगातार कोशिश करती रही। कई महिला संगठनों ने 'विशाखा' के नाम से एक पीआईएल सुप्रीम कोर्ट में दर्ज की। क्योंकि दोनों दोषी मर चुके थे इसलिए अब यह लड़ाई सिर्फ दोषियों को सजा दिलाने तक ही सीमित नहीं रह गई थी। कोर्ट ने भंवरी के मामले का संज्ञान लिया और महिला उत्पीड़न के इस मामले में और कार्यस्थलों पर सेक्सुअल हॉरेशमेंट के लिए कड़े नियम कानून बनाने की बात कही। कोर्ट के इस फैसले को भंवरी की जीत की तरह देखा गया। भंवरी की इस लड़ाई ने कई लोगों को प्रभावित किया। बॉलीवुड भी इससे अछूता नहीं रहा और वर्ष २००० में 'बवंडर' नाम से इस महिला के संद्घर्ष को बड़े पर्दे पर उतारा गया। भंवरी को कई पुरस्कार भी दिए गए।


नैना साहनी 

नैना साहनी भी ऐसा ही एक नाम है जिसने सिर्फ महिला होने की सजा पाई। इस महिला के पति सुशील शर्मा को शक था कि नैना अपने दोस्त मतलूब करीम के ज्यादा करीब है। इस कारण २ जुलाई १९९५ को सुशील ने नैना की हत्या की और उसके शव को तंदूर में जला दिया। तंदूर से निकलते धुंए ने पुलिस का ध्यान खींचा और मामला सामने आया। १० जुलाई १९९५ को कांग्रेस के इस युवा नेता ने आत्मसमर्पण कर दिया और ७ नवंबर २००३ को निचली अदालत ने इसे फांसी की सजा सुना दी। फांसी की सजा के खिलाफ यह मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग है।


केरल की सुर्यानेल्ली

आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों में सबसे ज्यादा बलात्कार के मामले होते हैं। जिनमें से कुछ ही मामले सामने आते हैं। ऐसे ही मामलों में साल १९९६ में केरला में सुर्यानेल्ली का मामला है। १६ साल की इस बच्ची के साथ ४० दिनों में ४२ लोगों ने बलात्कार किया। इसके बाद बीमार हो जाने पर २६ फरवरी को इसे थोड़े पैसे देकर और डरा-धमकाकर द्घर जाने के लिए कहा। इस मामले की जांच शुरू करने में सरकार ने पूरे तीन साल लगा दिए। वर्ष १९९९ में लोगों की मांग पर राज्य की पहली स्पेशल कोर्ट बनाई गई जिसमें शारीरिक शोषण के खिलाफ मामलों की सुनवाई हुई। ६ दिसंबर २००० तक ३५ लोगों को जेल में डाल दिया गया।


अंजना मिश्रा 

वर्ष १९९९ में सामने आया अंजना मिश्रा रेप केस महिला सुरक्षा की सारी पोल खोल देता है। अंजना मिश्रा एक आईएफएस ऑफिसर की पत्नी थीं। जब यह हादसा हुआ तो वे उड़ीसा में थी। इस हाई प्रोफाईल केस में क्रांग्रेस हाईकमान ने सीधे हस्तक्षेप किया और जेबी पटनायक को मुख्यमंत्री पद से हटा दिया गया। उन पर इस मामले में शामिल होने के आरोप थे। ९ जनवरी १९९९ को अंजना अपने पत्रकार दोस्त के साथ कार में जा रही थीं। रास्ते में उनकी कार को रोक कर उनके साथ बलात्कार किया गया। इस द्घटना में तीन लोग शामिल थे। इस हाई प्रोफाइल केस की जांच को उड़ीसा हाई कोर्ट ने सीबीआई को सौंपा। वर्ष २००२ में इस केस का फैसला आया और सभी आरोपियों को उम्र कैद की सजा सुनाई गई।


सोनाली मुखर्जी 

हर वर्ग में हर तरह से महिलाएं हिंसा का शिकार होती रही हैं और सुस्त आैर अपर्याप्त न्याय उन्हें दर-दर भटकने को मजबूर करता है। इसके माकूल उदाहरण झारखण्ड के धनबाद जिले की सोनाली मुखर्जी हैं, जो हाल ही में न्याय की तलाश में दिल्ली पहुंची थी। वर्ष २००३ में जब सोनाली मात्र १८ साल की थी तब उनके साथ यह हादसा हुआ। तपस मित्रा नाम के एक लड़के ने सोनाली को शादी के लिए प्रपोज किया, जिसको सोनाली ने ठुकरा दिया था। अपने इस अपमान का बदला लेने के लिए इस लड़के ने अपने दो दोस्तों के साथ मिलकर एसिड से सोनाली का चेहरा जला दिया। इसके बाद लचर कानून ने इसके दोषी को ९ साल कैद की सजा तो दी लेकिन उसे जमानत पर छोड़ दिया। इसके बाद से ही सोनाली न्याय के लिए धनबाद से दिल्ली तक के चक्कर लगाती रही है लेकिन न्याय उससे अभी भी कोसों दूर है। एसिड ने उसके चेहरे के साथ-साथ उसके जीवन को भी जला दिया है लेकिन इस सब का दोषी जमानत लेकर बेपरवाह अपनी जिंदगी जी रहा है।


थांगजम मनोरमा 

भारत के पूर्वोत्तर राज्यों और जम्मू-कश्मीर में आर्म फोर्सेज स्पेशल पॉवर एक्ट (।चेचं) लागू है जो रक्षा बलों को असीमित शक्ति देता है। बहुत पहले से ऐसी बाते सामने आती रही कि इस शक्ति का रक्षा बल दुर्व्यवहार गलत तरीके से इस्तेमाल करते हैं और महिलाओं के साथ बलात्कार भी करते हैं। हालांकि वहां से बहुत कम मामले मेन स्ट्रीम मीडिया में आ पाते हैं। ऐसा ही एक मामला थांगजम मनोरमा का है। ३२ साल की युवती के साथ १७ असम राइफल्स के जवानों ने पहले बलात्कार किया और उसके बाद उसकी हत्या कर दी। मनोरमा के परिवार वालों के अनुसार ११ जुलाई २००४ की सुबह १७ असम राइफल्स का एक ट्रप बामोन कंपू में बने उनके द्घर पहुंचा और वहां से सोती हुई मनोरमा को उठा लिया। इसके बाद उसी दिन शाम ५ बजे  मनोरमा का शव मिला। इसके बाद असम राइफल्स के प्रवक्ता ने कहा कि यह युवती पीपुल्स लिबरेशन आर्मी से संबंधित थी। इसने भागने की कोशिश की तो हमारे जवानों को इस पर गोली चलानी पड़ी। न्याय पाने के लिए परिवार वालों ने रीजनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस की पोस्टमार्टम रिपोर्ट को अस्वीकार कर दिया और बेटी का शव वापस नहीं लिया। इसके बाद इंफाल समेत पूरे मणिपुर में विरोध प्रदर्शन हुए। और मजबूर होकर के मुख्यमंत्री ने जांच के आदेश दिए। कमीशन ने जांच की और रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंप दी। आर्मड फोर्स स्पेशल पॉवर एक्ट के कारण इन दोषियों को कोई सजा नहीं दी जा सकी। लेकिन ३१ अगस्त २०१० को गुवाहाटी हाई कोर्ट ने प्रदेश सरकार को आदेश दिया कि वह इस जांच रिपोर्ट को खोले और उस पर जरूरी कार्यवाही करे। अभी तक इस मामले में किसी दोषी को कोई सजा नहीं दी जा सकी है।


इमराना 

अभी तक बात समाज और उनके रखवालों से महिलाओं को हो रहे खतरे की थी। लेकिन उत्तर प्रदेश के मुफ्फर नगर जिले में इमराना नाम की २८ साल की एक महिला के साथ जो हुआ उसने द्घर की चार दीवारी के अंदर भी उसकी सुरक्षा पर सवालिया निशान लगा दिए। यह सुनकर विश्वास नहीं होता कि उसके ससुर ने ही उसके साथ बलात्कार किया। ६ जून २००५ को इमराना के ससुर अली मोहम्मद ने उसके साथ बलात्कार किया। इसके बाद १३ जून को पंचायत ने इमराना को उसके पति के साथ रिश्ता न रखने का आदेश दिया। १३ जून को मामला सामने आया और मोहम्मद को गिरफ्‌तार कर लिया गया। १६ जून को मोहम्मद ज्यूडिसियल कस्टडी में भेजा गया। उनकी जमानत की याचिका को ठुकराते हुए कोर्ट ने उसे १० साल की सजा सुनाई। 


शोपियां कांड

ऐसा ही मामला जम्मू कश्मीर के शोपियां जिले में दो लड़कियों के साथ बलात्कार और हत्या का था। यहां आरोप सीआरपीएफ के जवानों पर लगा। पीड़ित युवतियां निलोफर जान (२२) और अषिया जान (१७) थीं। राज्य सरकार और जम्मू कश्मीर पुलिस ने इस मामले को छुपाने की, कोशिश की। लेकिन जनविद्रोह के बाद ३ जून २००९ को इस मामले की जांच न्याधीश मुजफ्फर अहमद की अध्यक्षता में एक कमीशन को सौंप दी गई। कमीशन ने अपनी ४०० पेज की रिपोर्ट में इस हत्या को परिवारिक रंजिश बताया और मीडिया पर आरोप लगाया कि इसे गलत तरीक&

 
         
 
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