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प्रदेश 
 
गिफ्ट देकर शिफ्ट

 

विरोधी गुट के विधायक को मैनेज करने के लिए मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने उन्हें जो झुनझुना थमाया है वह वास्तव में विधायक के लिए एक नई आफत बन गया है। बरम क्षेत्र के लोग बेहद नाराज हैं कि हरीश धामी उनका हक मारकर बंगापानी में तहसील बनवा रहे हैं

मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा लगातार अपने विरोधी खेमे के कांग्रेसी विधायकों को मैनेज करने में लगे हुए हैं। अल्मोड़ा के विधायक मनोज तिवारी को लालबत्ती देकर मैनेज करने के बाद उन्होंने पिथौरागढ़ में धारचूला क्षेत्र के विधायक हरीश धामी को भी अपने पक्ष में कर लिया है। यह मामला गिफ्ट देकर अपने पक्ष में शिफ्ट करने का है। हरीश धामी को अपने पाले में लाने के लिए उन्होंने नई तहसील बंगापानी का सृजन कर दिया है। इस तहसील का गठन कराना धामी के चुनावी वादों में से एक था। केंद्रीय जल संसाधन मंत्री हरीश रावत के खासमखास धारचूला के विधायक को मुख्यमंत्री बेशक लॉलीपॉप देकर शांत कर दें। लेकिन क्षेत्रीय जनता में तहसील स्तर पर दो गुट बन गए हैं। जिसमें एक बंगापानी को तहसील बनने का समर्थन कर रहा है तो दूसरा पक्ष इसे गोरीछाल (बरम) में बनाने की पैरवी कर रहा है।

              पिथौरागढ़ के सीमांत धारचूला क्षेत्र के विधायक हरीश धामी अपने विवादास्पद बयानों के लिए भी जाने जाते हैं। विधायक बनने के कुछ दिनों बाद ही इन्होंने यह कहकर कांग्रेस सरकार को सांसत में डाल दिया था कि सीमांत के विकास कार्यों में सरकार की उपेक्षा बर्दाश्त से बाहर हो चुकी है। इससे बेहतर है कि हम चीन में शामिल हो जाएं। उनका यह बयान काफी चर्चा में रहा। इस पर महीनों तक विरोध के स्वर सुनाई दिए। विधानसभा सत्र शुरू होने से पूर्व वह यह कहकर चर्चा में आए कि विधानसभा में काली पट्टी बांधकर जाएंगे। इसका पता चलते ही मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के करीबी सक्रिय हो गए। मुख्यमंत्री से हरीश धामी की मुलाकात कराई गई लेकिन वहां मामला नरम पड़ने की बजाय गर्मागर्मी में बदल गया। अभी कुछ दिनों पूर्व की ही बात है जब लोगों ने हरीश धामी को मुख्यमंत्री कार्यालय से नाराज हो निकलते देखा था।

              गौरतलब है कि जब मार्च माह में कांग्रेस आलाकमान ने विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाया तो हरीश रावत के समर्थन में सबसे ज्यादा विधायक कुमाऊं के ही थे। इनमें हरीश धामी कंधे से कंधा मिलाकर रावत के साथ रहे। उसके बाद भी जब रावत को मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया तो धामी ने यह कहकर सनसनी फैला दी थी कि वह मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को पिथौरागढ़ में द्घुसने नहीं देंगे। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि बहुगुणा अगर कुमाऊं में कहीं भी आएंगे तो उन्हें काले झंडे दिखाएंगे। हरीश रावत की भक्ति में सिर से लेकर पैर तक डूबे हरीश धामी की बीते १४ नवंबर को जौलजीवी मेले में उद्द्घाटन समारोह में काफी वाहवाही हुई। वाहवाही करने वाले कोई और नहीं बल्कि केंद्रीय जल संसाधन मंत्री हरीश रावत ही थे। रावत ने धामी की तारीफों के पुलिंदे बांध दिए। तब कार्यक्रम में ही मौजूद कांग्रेस के एक नेता ने चुटकी लेते हुए कहा था कि अब यह विजय बहुगुणा पर भारी पड़ेगा, हुआ भी यही। इसके करीब एक सप्ताह बाद ही हरीश ने कहा कि विधानसभा के सत्र में मुख्यमंत्री का विरोध करेंगे। इसके बाद बहुगुणा गुट में बेचैनी बढ़नी लाजमी थी। हालांकि राजनीतिक पैंतरेबाजी में माहिर समझे जाने वाले बहुगुणा के करीबियों ने विधानसभा सत्र शुरू होने से पूर्व ही हरीश धामी से संपर्क साध कर मुख्यमंत्री से मुलाकात कराना निश्चित कर दिया था। कांग्रेस सूत्रों के अनुसार तय समयावधि में हरीश धामी और विजय बहुगुणा की मुलाकात हुई जिसमें आम सहमति बनाने पर रजामंदी हुई। राजनीतिक सूत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री के आश्वासन पर हरीश धामी ने विधानसभा में काली पट्टी बांधकर विरोध करने का फैसला टाल दिया। विरोध न करने के पीछे की जो रणनीति बताई जाती है उसके अनुसार हरीश धामी ने मुख्यमंत्री के सामने फिलहाल दो मुद्दे रखे। जिसमें एक मुनस्यारी क्षेत्र के लोगों को ओबीसी में शामिल कराना तथा दूसरा बंगापानी को तहसील का दर्जा देना था। धामी की इन दोनों मांगों में से बंगापानी को तो तहसील का दर्जा दे दिया। लेकिन मुनस्यारी क्षेत्र के लोगों को ओबीसी के दायरे में लाने की मांग पूरी नहीं हो सकी। गौरतलब है कि मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने १७ दिसंबर को देहरादून में चार नई तहसील बनाने की द्घोषणा की है। जिनमें चमोली जिले की द्घाट एवं आदिबदरी, टिहरी की मंडीसौड तथा पिथौरागढ़ की बंगापानी है।

              धारचूला विधानसभा क्षेत्र में गौरीछाल (बरम) को तहसील बनाने की मांग १० साल पूर्व उठी थी। कारण कि गौरीछाल से तहसील धारचूला की दूरी ५० किलोमीटर है। इसके चलते ही तहसील मुख्यालय यहां बनाने की मांग उठी थी। इसके लिए बरम क्षेत्र के लोगों ने जमीन भी देने की द्घोषणा कर दी थी। लेकिन कांग्रेस के वर्तमान विधायक हरीश धामी ने गौरीछाल की बजाय तहसील बंगापानी में बनवाने की द्घोषणा करा दी। बरम क्षेत्र के लोगों का कहना है कि यह धामी द्वारा मदकोट के लोगों को लाभान्वित करने के लिए किया गया है। धामी मदकोट के निवासी हैं। बरम न्याय पंचायत क्षेत्र में आठ बड़ी ग्राम सभा हैं। जिनमें बरम, कनार, झुमती, मितली, छोरबगड़, जौलजीवी, तोली और दुंगातोली आदि हैं। भाजपा के बरम मंडल अध्यक्ष डंबर सिंह चेसर का कहना है कि तहसील को गौरीछाल से बंगापानी लाकर हरीश धामी ने यहां के लोगों के साथ सौतेला व्यवहार किया है। बरम क्षेत्र के लोग बंगापानी और धारचूला के बीच पिसने को मजबूर होंगे। एक तरफ जहां तहसील के लिए वे बंगापानी जाएंगे तो वहीं विकास खंड में काम कराने धारचूला ही जाएंगे। दोनों एक दूसरे के विपरीत दिशा में हैं। इससे बेहतर था कि वे धारचूला में ही बने रहते तो कम से कम दो जगह जाने को मजबूर नहीं होते। वहीं दूसरी तरफ धामी मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के इस फैसले का स्वागत करते हैं कि बंगापानी को तहसील बनाने से पूर्व उन्होंने स्थानीय लोगों से बात की थी। सभी की सहमति से ही इस तहसील का नवसृजन हुआ है। उन्होंने दावा किया कि तहसील का कोई विरोधी नहीं है। अगर कोई है तो उसका नाम बताओ।

 

 

 


 

उत्तराखंडी संस्क्रति और उनका इलाहाबाद

उत्तराखण्ड से सरोकार न रखने वाले शासकीय अधिवक्ताओं का जमावड़ा करने के बजाय यदि राज्य सरकार ऐसे अधिवक्ताओं की सेवाएं लेती है जो मुजफ्फरनगर कांड के दोषियों को सजा दिलवाने के लिए न्यायालयों में ठोस पैरवी कर सकें तो यही जनहित में उचित होगा

एक नेताजी को फुटबॉल मैच का उद्द्घाटन करने के लिए बुलाया गया। अपने संबोधन में नेताजी ने कहा कि तुम खिलाड़ियों की समस्या से मैं बहुत दुखी हूं। तुम द्घास के मैदान में खेल रहे हो, जल्दी ही मैं तुम्हारे लिए एक पक्के फर्श वाला मैदान बना दूंगा। तुम सब एक ही बॉल से खेल रहे हो, अब ऐसा नहीं होगा। मैं तुम सबके के लिए एक-एक बॉल उपलब्ध करवा दूंगा। आयोजकों को अपनी भूल का अहसास हुआ कि नेताजी की जगह किसी वरिष्ठ फुटबॉल खिलाड़ी या किसी अन्य जानकार राजनेता को उद्द्घाटन के लिए बुलाया जाता तो कार्यक्रम दर्शकों के लिए हंसी-मजाक का कारण नहीं बनता। कुछ ऐसा ही उत्तराखण्ड राज्य में भी होता रहा है। यह बात अलग है कि यहां आयोजकों को अपनी भूल का अहसास नहीं होता। विषय चाहे पर्यावरण, साहित्य, फिल्म, संस्कूति धर्म या कोई अन्य क्यों न हो, कार्यक्रम को आयोजित करने वाली उत्तराखण्डी संस्थाएं मान लेती हैं कि नेताओं की मौजूदगी से ही कार्यक्रम सफल हो पाता है। हर कार्यक्रम में नेताओं को वक्ता के तौर पर बुलाया जाता है और नेता संबंधित विषय पर बोलने के बजाय अपना गुणगान कर चले जाते हैं। ऐसा लगता है कि जैसे कार्यक्रम नेताओं को महिमा मंडित करने के लिए ही आयोजित किए जाते हैं।

                 अभी हाल में राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में राजुला मालूशाही की प्रेम कहानी पर आधारित फिल्म का प्रदर्शन समारोह था। इस कार्यक्रम के तहत 'राजुला-मालूशाही' पर आधारित लेखक हरिसुमन बिष्ट की पुस्तक का विमोचन भी किया गया। मुख्य अतिथि उत्तराखण्ड विधानसभा में विपक्ष के नेता अजय भट्ट और उत्तराखण्ड सरकार के महाधिवक्ता उमाकांत उनियाल ने इस किताब का विमोचन किया। अजय भट्ट तो बोलने में माहिर हैं। उन्होंने बड़े संतुलित ढंग से अपने विचार रखे। लेकिन महाधिवक्ता महोदय ने बड़े दंभ से अंग्रेजी भाषा में कहा कि 'मैं इलाहाबाद में पला-बढ़ा हूं इसलिए उत्तराखण्ड की संस्कूति के बारे में नहीं जानता। आयोजकों ने मुझे बुलाया इसलिए मैं यहां आ गया। कार्यक्रम में देरी से पहुंचा। आयोजकों ने मेरे लिए सीट खाली करवाई। मैं फिल्म खत्म होने तक यहां मौजूद रहा। मैं नहीं जानता कि फिल्म कैसी है। लेकिन लोग बता रहे हैं कि अच्छी फिल्म हैं।' इसके अलावा भी उन्होंने अपने संबोधन में कुछ और ऐसी बातें कहीं जिससे वहां उपस्थित कई लोग हैरानी से एक-दूसरे के चेहरे देख रहे थे।

                 उत्तराखण्ड का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि जो लोग अपने मुंह से कह रहे हैं कि 'हमारे उत्तराखण्ड से कोई सरोकार नहीं रहे। हमारे दिलों में इलाहाबाद रचा-बसा है, उनके हाथों में राज्य की जनता का भविष्य सौंप दिया जाता है। गौर करने वाली बात है कि इस वक्त उत्तराखण्ड सरकार के हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में कुछ अहम मामले चल रहे हैं। मुजफ्फरनगर कांड के दोषियों को सजा दिलवाने के लिए जनता सन्‌ १९९४ से मांग कर रही है। ऐसे में जिन लोगों के उत्तराखण्ड से सरोकार न रहे हों वे न्यायालयों में राज्य सरकार की ओर से पैरवी करने में कितनी गंभीरता दिखाएंगे, यह भगवान ही जान सकता है। बेहतर होगा कि सरकार ऐसे लोगों को जिम्मेदार पदों पर बिठाकर अनावश्यक खर्च करने के बजाय न्यायालयों में अपने मामलों की पैरवी के लिए देश के उन वरिष्ठ अधिवक्ताओं की सेवाएं ले जो राज्य के लिए हितकर साबित हो सकते हैं।

                 इस संबंध में अतीत में झांककर देखें तो इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जब मुजफ्फरनगर कांड की सीबीआई जांच के आदेश दिए तो उत्तर प्रदेश सरकार इसे रुकवाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय चली गई थी। उत्तर प्रदेश सरकार की पैरवी पूर्व न्यायमूर्ति बीएम तारकुंडे कर रहे थे। लेकिन उत्तराखण्ड मानवाधिकार संगठन के अध्यक्ष एसके शर्मा की याचिका ३२०/१९९४ पर सर्वोच्च न्यायालय ने सीबीआई जांच कराने से संबंधित हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखा। शर्मा की याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय में वरिष्ठ अधिवक्ता केके राय ने बहस की थी। राज्य में अनावश्यक रूप से शासकीय अधिवक्ताओं की भीड़ जमा करने के बजाय यदि सरकार मुजफ्फरनगर कांड के दोषियों को सजा दिलवाने के लिए केके राय जैसे सुलझे अधिवक्ताओं की बौद्धिक क्षमताओं का सदुपयोग करती है तो जनता निश्चित ही इसका स्वागत करेगी। इसके अलावा मुजफ्फरनगर कांड की जांच के लिए सरकार एक आयोग गठित कर सकती है।

 

 
         
 
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  • सिराज माही

जीत के इरादे से इंग्लैंड की टीम भारत दौरे पर आई तो जरूर] लेकिन उसे भारत से हर श्रृंखला में हारकर लौटना पड़ा। भारत और इंग्लैंड के बीच टेस्ट]

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