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सिहांवलोकन २०१२ उत्तराखण्ड
 
शह और मात का खेल

 

साल २०१२ उत्तराखण्ड के लिए उथल-पुथल भरा रहा। विधानसभा चुनाव के नतीजे हैरान करने वाले आए। सरकार गठन को लेकर मची खींचतान और द्घमासान ने पूरे देश का आँयान राज्य की तरफ आकर्षित किया। राजनेताओं की बदली निष्ठाओं ने दलबदल को बढ़ावा दिया। प्राकृतिक और मानव निर्मित आपदाओं के चलते जान-माल की भारी क्षति हुई। राज्य के विकास के लिए सिडकुल-२ की मुख्यमंत्री ने जो द्घोषणा की उसे भी लोग अव्यावहारिक ही बता रहे हैं

 

वर्ष २०१२ के दामन में कई रंग रहे। प्रदेश में विजय बहुगुणा की ताजपोशी ने सबको हैरत में डाला तो पूर्व मुख्यमंत्री भुवनचंद्र खण्डूडी की विधानसभा चुनाव में हार सबसे बड़ी चौंकाने वाली द्घटना साबित हुई। कई राजनीतिक पंडितों ने खण्डूड़ी की इस हार को राजनीति और चुनाव का असली चेहरा उजागर करने वाला बताया। साल की तीसरी सबसे बड़ी राजनीतिक द्घटना हरीश रावत की बगावत रही। विधानसभा चुनाव में जीत के बाद हरीश रावत की वरिष्ठता को दरकिनार करते हुए कांग्रेस हाईकमान ने उन्हें एक बार फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने से वंचित कर दिया। इससे रावत काफी खफा हुए। रावत कैंप के सभी विधायक उनके दिल्ली आवास में एकत्र हो गए, सांसद प्रदीप टम्टा ने सामने आकर मोर्चा संभाला। ऐसा लगने लगा कि इस बार हाईकमान के फैसले का जवाब रावत प्रदेश कांग्रेस को तोड़कर देंगे। लेकिन जल्द ही रावत के तेवर ढीले हुए और मामला सामान्य हो गया।

विधानसभा चुनाव

राज्य का तीसरा विधानसभा चुनाव साल का सबसे बड़ा राजनीतिक आयोजन, भाजपा और कांग्रेस के बीच कांटे के संद्घर्ष के बाद कांग्रेस की कामयाबी के साथ खत्म हुआ। नतीजों से साफ हो गया कि लंबे समय तक अलग प्रदेश की पुरजोर मांग करते रहे क्षेत्रीय दल आज भी राज्य में अपनी राजनीतिक जमीन तलाश कर रहे हैं। राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों के कई चर्चित चेहरों को हार का स्वाद चखना पड़ा। हारने वाले इन बड़े नेताओं में शूरवीर सिंह सजवाण, टीपीएस रावत, हीरा सिंह बिष्ट, प्रकाश पंत, मातवर सिंह कंडारी, दिवाकर भट्ट, त्रिवेंद्र सिंह रावत, बलवंत सिंह भौर्याल, गोविंद सिंह बिष्ट, काशी सिंह ऐरी और पुष्पेश त्रिपाठी आदि शामिल हैं। इसके अलावा कई दागी और दबंग नेताओं ने जीत हासिल कर राजनीति का असली चरित्र दिखाया। पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल 'निशंक' जिन्हें भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा, उन्होंने भी विधानसभा चुनाव में डोईवाला से जीत हासिल की। चुनाव के बाद काफी खींचतान के बावजूद भाजपा आलाकमान ने रानीखेत के विधायक अजय भट्ट को नेता प्रतिपक्ष बनाया। 


सितारगंज में साख

इस बार सितारगंज में हुआ उपचुनाव भी काफी हलचल पैदा करने वाला रहा। यहां से मुख्यमंत्री के लिए सीट खाली करने वाले भाजपा विधायक किरण मंडल इस उपचुनाव में विजय बहुगुणा से ज्यादा चर्चित हुए। मंडल ने न सिर्फ बहुगुणा के लिए सीट खाली की बल्कि भाजपा से भी इस्तीफा दे दिया। बाद में भाजपा के प्रकाश पंत यहां बहुगुणा के खिलाफ खड़े हुए और बुरी तरह से पराजित हुए। बहुगुणा की खाली की हुई टिहरी लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में मुख्यमंत्री ने अपने पुत्र का राजनीतिक भविष्य तलाशने की कोशिश की। लेकिन राजलक्ष्मी शाह ने साकेत को २२ हजार से ज्यादा मतों से हरा दिया। इससे मुख्यमंत्री को काफी बड़ा झटका लगा। औद्योगिक विकास की दृष्टि से सिडकुल-२ की स्थापना राज्य की राजनीति में बहुगुणा का उठाया हुआ एक बड़ा कदम बताया जा रहा है। कुछ लोग इसे ज्यादा उद्योग-ज्यादा विकास की तरह देख रहे हैैं तो कुछ इसे राज्य की जमीनों पर भू-माफियाओं को स्थापित करने की तैयारी करार दे रहे हैं। इसके अलावा मुख्यमंत्री की गैरसैंण में कैबिनेट बैठक भी काफी चर्चा में रही। दिल्ली में शराब कारोबारी पॉन्टी चड्ढ़ा की हत्या और इसमें उत्तराखण्ड अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष सुखदेव सिंह नामधारी का नाम आने से प्रदेश में राजनीति पर सवाल उठे। कांग्रेस ने इस मामले में अपना पल्ला यह कहकर झाड़ा कि नामधारी की नियुक्ति भाजपा के शासनकाल में हुई थी। 

राजनीति को प्रभावित करने वाली इन प्रमुख द्घटनाओं के अलावा जुलाई माह में बाबा रामदेव के साथी और पतंजलि योगपीठ के महामंत्री आचार्य बालकूष्ण को फर्जी पासपोर्ट और नागरिकता के मामले में गिरफ्तार किया गया। गंगा को प्रदूषण मुक्त करने और अविरल प्रवाहित होने देने की मांग को लेकर स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद जीडी अग्रवाल ने आमरण-अनशन किया। स्वामी के अनशन ने जल विद्युत परियोजनाओं के विरोध को नया मोड़ दिया। 


सत्ता सुख के लिए दलबदल

चुनाव की हलचल से भरे इस साल में दलबदल भी काफी हुआ। सत्ता का सुख भोगने के लालच में कई नेताओं ने भाजपा से कांग्रेस में छलांग लगाई। इन नेताओं में सबसे बड़ा नाम सितारगंज से चुने गए भाजपा विधायक किरण मंडल का है। मंडल ने चुनाव जीतने के बाद इस्तीफा दिया और कांग्रेस में शामिल हो गए। दलबदल की यह कहानी साल की शुरुआत के साथ ही शुरू हो गई थी। सबसे पहले हल्द्वानी की नगर पालिका अध्यक्ष रेनू अधिकारी कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुईं। गदरपुर में नारायण दत्त तिवारी ने अपने भतीजे मनीष तिवारी को टिकट दिलाया। इससे नाराज हुए जसैल सिंह काली निर्दलीय ही चुनावी मैदान में कूद पड़े। पूर्व मंत्री मातवर सिंह कंडारी टिहरी लोकसभा क्षेत्र के उपचुनाव में भाजपा छोड़कर कांग्रेस में चले गए। कभी टिहरी रियासत के पूर्व महाराजा स्वर्गीय मानवेन्द्र शाह के चक्कर काटने वाले कंडारी की आस्था अचानक यूं बदली कि वे कांग्रेस प्रत्याशी साकेत को जितवाने में जुट गए। पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी वर्ष भर चर्चा में रहे। विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उन्होंने राज्य में अपने प्रत्याशी उतारने के संकेत देकर कांग्रेस आलाकमान पर दबाव की नीति अपनाकर टिकट वितरण में खुद को महत्वपूर्ण साबित किया। पुत्र विवाद में रोहित शेखर के पक्ष में आए न्यायालय के फैसले से भी वे चर्चित रहे। साल के जाते- जाते उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह के प्रति उमड़ा उनका प्रेम सुर्खियों में रहा।


 आपदाओं की मार

बीता साल आपदाओं का साल भी कहा जा सकता है। राज्य के पिथौरागढ़, ऊखीमठ, उत्तरकाशी और कई अन्य क्षेत्रों में बादल फटने से मची तबाही से धन-जन की भारी क्षति हुई। करोड़ों की संपत्ति भी बर्बाद हो गई। इस आपदा के दौरान राजनीतिक संवेदनहीनता ने पीड़ित लोगों के द्घावों पर मरहम लगाने के बजाय उन्हें और गहरा किया। मुख्यमंत्री ने पीड़ित लोगों का हौसला बढ़ाने के बजाए उन्हें 'भजन-कीर्तन' करने की सलाह दी। कुछ मंत्री तो इतनी बड़ी आपदा को नजरअंदाज कर ओलंपिक के मजे लेने लंदन पहुंच गए। दयारा बुग्याल और गंगोरी में भी अगस्त माह में बादल फटने के कारण जान-माल का काफी नुकसान हुआ। इसके अलावा २५ मार्च को हुई एक दुर्द्घटना भी वर्ष २०१२ के साथ एक बुरी याद जोड़ गई। इस दिन श्रीनगर में अलकनंदा नदी पर निर्माणाधीन चौरास पुल ध्वस्त हो गया। जिसमें ६ मजदूरों की मृत्यु हो गई और १८ से अधिक द्घायल हुए। इससे पहले भी वर्ष २०११ में दो पुल टूट चुके हैं। इन टूटते पुलों ने सरकार की बहुत किरकिरी की। सरकार पर पुल जैसे महत्वपूर्ण निर्माण में कोताही बरतने और स्तर का काम न करवा पाने के आरोप लगे। 

शेर सिंह बिष्ट की मृत्यु इस साल की एक और दुखद द्घटना है। उत्तराखण्ड के साहित्य में उनका योगदान अमूल्य है। इसी कारण उन्हें शेर दा 'अनपढ़' नाम दिया गया। २१ मई को हल्द्वानी स्थित अपने आवास पर उन्होंने अंतिम सांस ली। 


और अंत में 

साल के लगभग अंत में विधानसभा के बाहर लोकतांत्रिक ढंग से अपनी मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे शिक्षा मित्रों पर बर्बरतापर्वूक लाठी प्रहार कर सरकार ने स्पष्ट संकेत दिए कि आने वाले समय में जन आंदोलन का जवाब इसी तरह दिया जाएगा। करीब एक दर्जन संगठन सरकार के समक्ष गुहार लगा रहे थे, लेकिन सरकार उनकी सुनने को तैयार नहीं है। इस तरह से उत्तराखण्ड के लिए वर्ष २०१२ राजनीतिक उथल-पुथल, दलबदल, आपदाओं और दुर्द्घटनाओं के लिए ही जाना जाएगा। 

 


 

बढ़ा अपराधों का ग्राफ

देवभूमि उत्तराखण्ड के लिए वर्ष २०१२ आपराधिक द्घटनाओं के बढ़ने को लेकर खासा चर्चा में रहा। मित्र पुलिस के अधिकारियों और सिपाहियों की कार्यशैली के चलते बाकी पर भी दाग लगे। राज्य भर में हत्याओं के बढ़ते मामलों पर तुलनात्मक दृष्टि से देखा जाए तो जहां वर्ष २०१० में १५३ और २०११ में १५५ हत्याएं हुई। वहीं वर्ष २०१२ में यह आंकड़ा बढ़कर १८९ पहुंच चुका है। लूट की द्घटनाओं का तीन वर्षीय तुलनात्मक आंकड़ा देखा जाए तो २०१० में लूट के १४०, २०११ में १३२ और २०१२ में ११२ लूट की द्घटनाएं दर्ज की गई। डकैती को लेकर आंकड़ों का यह मामला जरूर पुलिस के लिए सिरदर्दी पैदा कर सकता है। वर्ष २०१० में डकैती की आठ, २०११ में ११ और २०१२ में २० वारदातें हुई हैं। २०१२ में चोरों ने राज्य भर में जमकर चोरियों को अंजाम देते हुए पुलिस के सामने खुली चुनौती पेश की। इस दौरान देहरादून की एसएसपी रही नीरू गर्ग को अपना पद तक गंवाना पड़ा। सितंबर २०१२ में चोरों ने खुली चुनौती पेश करते हुए पूरे राज्य में देहरादून से लेकर सुदूर पर्वतीय क्षेत्रों तक धर्मस्थलों को भी नहीं बख्शा। २०१० में चोरी की २६२ द्घटनाएं दर्ज की गई तो २०११ में यह आंकड़ा २८६ तक जा पहुंचा। लेकिन २०१२ में ३० नवंबर तक चोरी की द्घटनाओं का यह आंकड़ा ३४२ तक जा पहुंचा है। आजकल दिल्ली में हुई बलात्कार की द्घटना को लेकर पूरा देश गुस्से में है। लेकिन बलात्कार की द्घटनाओं को लेकर देवभूमि के नाम से प्रसिद्ध उत्तराखण्ड भी अछूता नहीं है। महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों में इस राज्य में भी तेजी देखने को मिली है। २०१० में बलात्कार के ९६ मामले सामने आए, २०११ में यह संख्या बढ़कर ११२ तक जा पहुंची। ३० नवंबर २०१२ तक यह संख्या १२८ तक जा पहुंची है।

 

 
         
 
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  • कृष्ण कुमार

रैबार कार्यक्रम को लेकर सरकार की मंशा पर सवाल उठ रहे हैं। लोग हैरान हैं कि जब मुख्यमंत्री गढ़वाली बोली में जनता से विकास के सुझाव मांग रहे

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