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प्रदेश 
 
कैसे पारदर्शी हो कल्याण परिषद

आंदोलनकारी कल्याण परिषद को लोकप्रिय और पारदर्शी बनाने के लिए इसे स्थायी स्वरुप प्रदान किया जाए। आंदोलनकारी संगठनों के प्रतिनिधि इसके सदस्य हों। इन्हीं में से किसी एक को सरकार अध्यक्ष बना सकती है। अध्यक्ष का कार्यकाल एक वर्ष और सदस्यों का तीन वर्ष से अधिक न हो

        उत्तराखण्ड में आंदोलनकारियों को चिह्नित कर सम्मानित किए जाने की मांग को लेकर आंदोलन चल रहे हैं। सरकार आंदोलनकारियों को चिह्नित करने का काम आंदोलनकारी संगठनों को दे सकती है। इस बारे में दि संडे पोस्ट के पिछले अंक में इसी स्तंभ में चर्चा की जा चुकी है। अब सवाल यह है कि आंदोलनकारियों के कल्याण के लिए राज्य सरकार ने जो परिषद गठित की है उसका स्वरूप कैसा हो? वह कैसे लोकप्रिय और पारदर्शी बने ताकि आंदोलनकारी संगठन संतुष्ट हो जाएं और सरकार भी भेदभाव के आरोपों से बच जाए। अक्सर आंदोलनकारियों की शिकायत रही है कि उन्हें चिह्नित किए जाने की प्रक्रिया उचित नहीं रही है। जो मानदंड बनाए गए हैं वे पर्याप्त नहीं हैं।

सरकार को चाहिए कि वह जनभावनाओं का सम्मान करते हुए आंदोलनकारी कल्याण परिषद के स्वरूप को दुरुस्त करे। इसके लिए सर्वप्रथम परिषद को स्थायी बना दिया जाए। सरकार चाहे किसी भी पार्टी की आए, लेकिन परिषद हमेशा अस्तित्व में रहे। उसे भंग न किया जाए। परिषद का अध्यक्ष सरकार खुद तय कर सकती है। लेकिन उसका कार्यकाल एक वर्ष से अधिक का न हो। आंदोलनकारी संगठनों के प्रतिनिधि इस परिषद के सदस्य हों। प्रत्येक संगठन से एक प्रतिनिधि इस परिषद में हो। सदस्यों की संख्या २१ या ३१ अर्थात्‌ आंदोलनकारी संगठनों के प्रतिनिधियों के हिसाब से कम या ज्यादा भी हो सकती है। लेकिन सदस्यों का कार्यकाल तीन वर्ष से अधिक का न हो। यानी प्रत्येक वर्ष एक तिहाई सदस्य नए नियुक्त हों। सदस्यों में से ही किसी एक को अध्यक्ष बनाया जाए। अध्यक्ष का कार्यकाल एक वर्ष और सदस्यों का कार्यकाल तीन वर्ष होने से निरंतर नए सदस्यों की प्रतिभा और क्षमताओं का उपयोग आंदोलनकारियों के कल्याण में हो सकेगा। 

आंदोलन में सरकारी कर्मचारियों की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। उत्तराखण्ड में तमाम सरकारी कर्मचारी सड़कों पर उतरे। दिल्ली, मुंबई, लखनऊ इलाहाबाद जयपुर गाजियाबाद मेरठ आदि तमाम शहरों में भी प्रवास में रह रहे सरकारी कर्मचारी आंदोलन में शरीक रहे। लेकिन परिषद के सदस्य उन्हीं आंदोलनकारियों में से होने चाहिए जो सक्रिय रूप से हर वक्त आंदोलन के संचालन में लगे रहे। आंदोलनकारी कल्याण परिषद आंदोलनकारियों को चिह्नित कर उन्हें पेंशन ताम्र पत्र आदि देकर सम्मानित कर सकती है। जो सदस्य सरकारी सेवा चाहते हैं उन्हें सरकारी सेवाएं दी जाएं। आंदोलनकारियों के आश्रितों को सरकारी नौकरी प्राप्त करने के लिए प्रतियोगिता परीक्षाओं में ५ या १० अंकों की वरीयता दी जा सकती है। इसके अलावा सरकार के अंदर इच्छाशक्ति हो तो योग्यतानुसार आंदोलनकारियों की प्रतिभा का सदुपयोग सलाहकार समितियों में किया जा सकता है। राज्य गठन के बाद उत्तराखण्ड की सरकारें लालबत्तियों की रेवड़ियां बांटने के लिए चर्चा में रही हैं। जिस भी पार्टी की सरकार आती है, वह अपनों को उपकूत करने के चक्कर में सलाहकार समितियों बोर्डों और निगमों में कई ऐसे लोगों को बिठा देती है जिन्हें इस बात की मूल समझ भी नहीं होती कि जो दायित्व उन्हें सौंपा गया है उसका सदुपयोग वे जनहित में कैसे कर सकते हैं। दायित्व कोई प्रदर्शन की वस्तु नहीं, बल्कि एक चुनौती है। इसे स्वीकार करने के लिए अध्ययन के साथ ही अनुभव और संघर्ष से विकसित परिपक्वता की जरूरत होती है।

अब जबकि उत्तराखण्ड में लोग जगह-जगह आंदोलनकारियों को सम्मान देने के लिए धरने-प्रदर्शन कर रहे हैं तब सरकार को चाहिए कि वह आंदोलनकारी संगठनों से विचार-विमर्श कर आंदोलनकारियों को चिह्नित करने का काम शुरू कर दे। सबसे पहले हर आंदोलनकारी संगठन के कम से कम पांच पदाधिकारियों को आंदोलनकारी द्घोषित किया जाए और फिर उनके परामर्श से आंदोलनकारियों को चिह्नित किया जाए। आंदोलनकारी द्घोषित किए गए विभिन्न संगठनों के पदाधिकारियों में से ही कुछ कल्याण परिषद के सदस्य बनाए जा सकते हैं। यह भी ध्यान में रखा जाए कि हर जिले से कम से कम एक सदस्य इस परिषद में अवश्य हों। एक लोकप्रिय और पारदर्शी परिषद सरकार को समय-समय पर यह राय भी दे सकती है कि वह किन-किन शहीद आंदोलनकारियों एवं राज्य के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर करने वाले आंदोलनकारियों के नाम से विकास योजनाएं चलाए।

 

 


 

 

 

शिकंजे में सपा विधायक

उत्तर प्रदेश के विधायक ठाकुर प्रेम प्रकाश सिंह को उत्तराखण्ड के सितारगंज में मतदान करना महंगा पड़ रहा है। केंद्रीय निर्वाचन आयोग ने दोनों प्रदेशों की मतदाता सूचियों में नाम दर्ज होने और उत्तराखण्ड में फर्जी मतदान को गंभीरता से लेकर उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज करने के संकेत दिए हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक विधायक को कानूनी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है

उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले से विधायक ठाकुर प्रेम प्रकाश सिंह मुश्किलों में घिरते नजर आ रहे हैं। उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले और उत्तराखंड के सितारगंज की मतदाता सूची में नाम होने और दोनों जगह से अपने मताधिकार का इस्तेमाल करने के कारण चुनाव आयोग का शिकंजा प्रेम प्रकाश सिंह पर कसता जा रहा है। मामला सामने आने पर दोनों प्रदेशों के चुनाव आयोगों ने इसकी जांच की, जिसमें विधायक को अपने मताधिकार का गलत प्रयोग करने का दोषी पाया गया। वर्तमान में स्थिति यह है कि दोनों प्रदेशों से रिपोर्ट  केंद्रीय निर्वाचन आयोग भेज दी गई है। यह लगभग तय माना जा रहा है कि केंद्रीय निर्वाचन आयोग इस विधायक को फर्जी मतदान करने के लिए जनप्रतिनिधित्व कानून १९५० की धारा १७-१८ के अंतर्गत सजा सुनाएगा। जिसमें एक साल की कैद या अर्थदंड का प्रावधान है। 

   यह मामला तब सामने आया जब आठ जुलाई को सितारगंज विधानसभा के उपचुनाव में मतदान करते हुए मीडिया के कैमरों में प्रेम प्रकाश सिंह कैद हो गए। इसके बाद मामला उछला और निर्वाचन आयोग का ध्यान इस ओर गया। उत्तराखण्ड के चुनाव आयोग ने इस बात का संज्ञान लेते हुए जांच के आदेश दिए। अपनी रिपोर्ट में उधमसिंह नगर के जिला मजिस्ट्रेट ने कहा कि प्रेम प्रकाश पुत्र श्री केशवनाथ ने ८ जुलाई को सितारगंज विधानसभा उपचुनाव में मतदान किया है। उनका नाम भाग संख्या २९ के क्रम संख्या ४८ पर दर्ज है। रिपोर्ट में यह भी साफ है कि उत्तर प्रदेश का ये विधायक सितारगंज के कुसमोठ गांव के निवासी हैं और इस तहसील में इनके खुद के नाम के खेत और आवासीय भूमि है। जांच में उत्तर प्रदेश निर्वाचन आयोग की मदद भी ली गई। पत्र लिखकर यूपी वोटर लिस्ट में इस विधायक का नाम होने के संदर्भ में जानकारी मांगी गई। इस आधार पर देवरिया के सहायक जिला निर्वाचन अधिकारी से जांच कराई गई। जिसमें स्पष्ट हुआ कि प्रेम प्रकाश का नाम देवरिया की मतदाता सूची में दर्ज है। मुख्य चुनाव अधिकारी उमेश सिन्हा ने बताया कि इस रिपोर्ट को केंद्रीय निर्वाचन आयोग को भेज दिया गया है। दोनों प्रदेशों के चुनाव आयोग ने जांच में पाया कि यह विधायक देवरिया और सितारगंज दोनों जगह की मतदाता सूची में हैं और सितारगंज से पहले उत्तर प्रदेश में हुए विधानसभा चुनावों में भी इन्होंने वोट डाला था। हालांकि उत्तर प्रदेश में सपा की सरकार होने के कारण मामला दबाने की कोशिश लगातार जारी है। इसके बाद भी उत्तराखंड निर्वाचन आयोग ने रिपोर्ट तैयार कर केंद्रीय निर्वाचन आयोग को भेज दिया। जहां से अब इस विधायक को सजा मिलना लगभग तय माना जा रहा है। 

   दो जगहों से अपने मताधिकार का प्रयोग करने के आरोप से अपना बचाव करते हुए प्रेम प्रकाश सिंह कहते हैं कि मैं वर्तमान में उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले का मतदाता हूं। यूपी में चुनाव लड़ने से पूर्व ही मैंने सितारगंज की मतदाता सूची में नाम हटाने के लिए ऊधमसिंह नगर जिला निर्वाचन आयोग में आवेदन किया था। फिर भी सरकार ने नाम नहीं हटाया। लेकिन ऊधमसिंह नगर के जिलाधिकारी ब्रजेश कुमार संत की रिपोर्ट विधायक की इस बात का खंडन करती है। इस रिपोर्ट में साफ है कि सितारगंज ब्लॉक के डाकबंगला वसगर क्षेत्र में नियुक्त बीएलओ प्रभा मंडल जब घर-घर जाकर वोटर लिस्ट का सत्यापन कर रही थीं तो विधायक की पत्नी ने इस सूची से किसी का भी नाम हटाने से मना कर दिया था। रिपोर्ट के अनुसार यहां आए अधिकारी से कहा गया कि परिवार के सभी सदस्य यहीं रहते हैं इसलिए सूची से किसी का नाम नहीं हटाया जाए। इसके अलावा इस बात के भी कोई प्रमाण नहीं हैं कि प्रेम सिंह ने मतदाता सूची से अपना नाम हटाने के लिए आवेदन फार्म नं. ७ या कोई अन्य प्रार्थनापत्र संबंधित अधिकारी को दिया हो। बीएलओ समेत समन्वयक, रजिस्टॉर, कानूनगो, तहसीलदार, एसडीएम सभी ने किसी भी प्रकार का आवेदन प्राप्त होने से इंकार किया है। 

 

 


 

रसूखदार हैं विधायक

शक्तिफार्म से करीब एक किलोमीटर पहले एक आलीशान मकान दिखाई देता है। जिसके सामने कई राइफलधारी युवक पहरेदारी करते दिख जाते हैं। इस मकान के बाहर कई लग्जरी गाड़िया खड़ी दिख जाती हैं जो कि साफ कर देती हैं कि यह मकान किसी रसूखदार व्यक्ति का है। 'दि संडे पोस्ट' की टीम ने जब यह नजारा देखा और जानने की कोशिश की कि आखिर किसका मकान है यह। तब पूछताछ में पता चला कि यह उत्तर प्रदेश के सपा विधायक ठाकुर प्रेम प्रकाश सिंह का है। यह भी पता चला कि यहां प्रेम प्रकाश की तूती बोलती है। 

 

 


 

बात अपनी अपनी

इस मामले की जांच रिपोर्ट हमने केंद्रीय निर्वाचन आयोग भेज दी है। वहां से जो भी आदेश आएंगे उनका पालन किया जाएगा।

राधा रतूड़ी मुख्य निर्वाचन अधिकारी उत्तराखण्ड

उत्तराखण्ड निर्वाचन आयोग ने हमसे दो बिंदुओं पर जांच आख्या मांगी थी। जो हमने भेज दी। अपनी जांच रिपोर्ट के साथ मतदाता सूची भी भेजी है जिसमें प्रेम प्रकाश का नाम दर्ज है। 

उदयराज सिंह जिला सहायक निर्वाचन अधिकारी देवरिया

जांच रिपोर्ट प्रदेश मुख्य निर्वाचन अधिकारी को २ नवंबर को ही पूरी करके भेज दी है। 

कुमार रविकांत जिलाधिकारी देवरिया

अगर इस मामले में विधायक दोषी हैं तो उन पर प्रतिनिधित्व कानून १९५० के अंतर्गत कार्यवाही की जाएगी। इस मामले में एक साल की सजा का प्रावधान है।

एस के मेंहदीरत्ता लीगल एडवाइजर केंद्रीय निर्वाचन आयोग

 
         
 
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