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फोकस
 
विकास के ताल में दाग धोने की तैयारी

 

नरेन्द्र मोदी का नाम लेते ही एक साथ दो चीजें किसी भी भारतीय के जेहन में कौंधती है-पहला है विकास और दूसरा इस विकास को कटद्घरे में खड़ा करता गुजरात दंगा। उस दंगे में बीस हजार लोगों की जान गई थी। तब मोदी ने न्यूटन के सिद्धांत के सहारे उसे गोधरा कांड की प्रतिक्रिया बता सामान्य बनाने की कोशिश की थी। हालांकि तब के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें राजधर्म निभाने की नसीहत तक दे डाली थी। भले ही उसके बाद मोदी संभले और अपने माथे पर लगे उस दाग को विकास के तालाब में नहाकर धोने के लिए आतुर हुए। अब वही दाग उनके सपने यानी प्रधानमंत्री की दावेदारी में सबसे बड़ी बाधा बन रहे हैं।

           डिक्टेटर घोर हिन्दुत्ववादी नीरो और तो और हजारों बेगुनाहों का हत्यारा जैसे विशेषणों के बाद भी यह नरेंद्र मोदी का प्रभाव ही था जिसने गुजरात के लोगों को लगातार तीसरी बार उन्हें मुख्यमंत्री चुनने के लिए विवश किया। मोदी की इस जीत को उनके केंद्र की राजनीति की तरफ बढ़ते हुए कदम की तरह देखा जा रहा है। 

           मोदी का जन्म १७ सितंबर १९५० को गुजरात में मेहसाणा के वादनगर में हुआ। एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे मोदी बचपन में साधु बनना चाहते थे। अपनी इस चाह को पूरा करने के लिए मोदी द्घर से भाग गए और साधुओं के साथ रहने लगे। कुछ ही दिनों में उन्हें समझ आ गया कि वे साधु नहीं बन सकते। इसके बाद द्घर वापस लौटकर उन्होंने अपने बड़े भाई के साथ चाय बेचना शुरू किया। चाय की दुकान में वह अक्सर आरएसएस कार्यकर्ताओं को बात करते हुए सुना करते थे। उनकी बातों का इतना असर हुआ कि वह आरएसएस संगठन में शामिल हो गए। संगठन में शामिल होने के बाद उन्होंने पीछे पलटकर नहीं देखा। पहले प्रचारक और फिर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सदस्य बन मोदी धीरे- धीरे भगवा कॉडरों में सबसे ऊपर चढ़ते चले गए। इमरजेंसी में आरएसएस एक मजबूत संगठन के तौर पर सामने आ गया था। ऐसा कहा जा सकता है कि आरएसएस और मोदी एक साथ अपना कद बढ़ा रहे थे। द्घर से शादी का दबाव होने पर उन्होंने द्घर छोड़ दिया और दो वर्षों तक द्घर में किसी से बात भी नहीं की। इसी से मोदी का लक्ष्य के प्रति समर्पण समझ में आता है। १९८७ में मोदी भाजपा में शामिल हुए। इस दौरान मोदी ने गुजरात विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में मास्टर डिग्री प्राप्त की। अपने काम और समर्पण के कारण मोदी भाजपा में अपनी पकड़ बनाते जा रहे थे। पर्दे के पीछे रहकर मोदी ने खुद को गुजरात भाजपा का महत्वपूर्ण हिस्सा बना लिया। 

           राजनीतिक सफर की शुरुआत में शंकर सिंह वाद्घेला के साथ नरेंद्र मोदी ने गुजरात में भाजपा को मजबूती दी। जिसके परिणाम स्वरूप १९९५ में भाजपा गुजरात सत्ता पर काबिज हुई। गुजरात में मोदी के काम से प्रभावित होकर उन्हें केंद्र से जिम्मेदारियां दी जाने लगीं। सबसे पहले उन्हें आडवाणी की सोमनाथ से अयोध्या तक की रथ यात्रा और कन्या कुमारी से लेकर कश्मीर तक की पद यात्रा के आयोजन की जिम्मेदारी दी गई। इसके बाद इन्हें भाजपा का राष्ट्रीय सचिव बनाया गया। सचिव के तौर पर इन्हें पांच राज्यों की जिम्मेदारी सौंपी गई। बेहतरीन काम का नतीजा था कि कुछ ही समय बाद मोदी को महासचिव बनाया गया। महासचिव बनने के बाद मोदी ने गुजरात और हिमाचल में होने वाले विधानसभा चुनावों में प्रचार की जिम्मेदारी ले ली। 

           अभी केंद्र में मोदी खुद को मजबूती दे ही रहे थे कि २००१ में गुजरात में विनाशकारी भूकंप आया। इस भूकंप ने गुजरात के साथ-साथ वहां की राजनीति को भी हिला दिया। मोदी के राजनीतिक जीवन में भी प्रभाव पड़ा। इस भूकंप में गुजरात में बीस हजार से ज्यादा लोग मारे गए। तत्कालीन मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल को पद छोड़ना पड़ा। भूकंप के इन झटकों ने मोदी को केंद्र से गुजरात पहुंचा दिया। उन्होंने मुख्यमंत्री पद संभाला और तब से आज तक गुजरात से मोदी को कोई टस से मस नहीं कर सका। मुख्यमंत्री बनकर उन्होंने बड़े-बड़े उद्योगपतियों को गुजरात बुलाया उन्हें सुविधाएं दीं। जिसके परिणाम स्वरूप गुजरात विकसित बना और मोदी लगातार चमकते गए। एक सर्वे के अनुसार मोदी के समर्थकों में एक बड़ी तादाद युवाओं की है जिनके लिए चुनावी मुद्दा सिर्फ विकास है। अपनी इस लोकप्रियता के लिए मोदी ने लगातार खुद को बदला भी है। आरएसएस के इस समर्पित कार्यकर्ता ने खुद को आधुनिक तकनीक से जोड़ा। वह देश के शायद पहले मुख्यमंत्री हैं जो ट्वीटर, फेसबुक के जरिए खुद को युवाओं से जोड़े हुए हैं। 

           आने वाला वर्ष मोदी के राजनीतिक जीवन के लिए बहुत महत्वपूर्ण होगा। सभी राजनीतिक विश्लेषकों और चिंतकों की पैनी नजर मोदी पर रहेगी।  खैर दिल्ली आने की चाह मोदी के विजय भाषण में साफ सुनाई दी। यहां मोदी का अंदाज कुछ बदला-बदला था। उन्होंने कहा कि 'एक इंसान के नाते कभी मुझसे कोई गलती हो गई हो कोई कमी रह गई हो तो छह करोड़ गुजरातवासियों मैं आपसे मन से क्षमा चाहता हूं।' कई लोगों ने इस 'क्षमा' को दिल्ली पहुंचने की तैयारी के तौर पर देखा।

           गुजरात चुनावों के नतीजे आने के बाद से ही गुजरात भाजपा मुख्यालय से ज्यादा नजरें दिल्ली के भाजपा दफ्तर पर टिकी हुई हैं। इस जीत ने भाजपा के लिए कई सवाल भी खड़े कर दिए हैं, जिनमें सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर २०१४ का चुनाव भाजपा किसके नेतृत्व में लड़ेगी। क्या पिछले कई सालों से केंद्र में अपनी बारी का इंतजार कर रहे भाजपा के बड़े चेहरे खुद को पीछे कर मोदी को आगे आने देंगे। क्या २००१ में लगे दाग को 'गुजरात के विकास और इस जीत' के नाम पर मोदी धो सकने की कूवत रखते हैं।' क्या विकास के नाम पर देश की २० प्रतिशत (मुस्लिम आबादी उन्हें २००१ के लिए माफ करेगी? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब भाजपा की कोर टीम को समय रहते खोजने होंगे। उनसे बड़े और उनके समक्ष नेता सकते में हैं। मोदी ने उनके सामने एक बड़ी लकीर खींच दी है। जिससे पार पाना किसी के लिए भी बहुत हद तक मुश्किल है।


मोदी का राजनीतिक सफर

  •        छोटी उम्र में ही आरएसएस में शामिल हुए और पहले प्रचारक फिर कार्यकर्ता बनकर कार्य किया। 
  • १९८७ में मोदी ने भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए। इस दौरान हिन्दुत्ववादी राष्ट्रवाद की सोच को लेकर यह पार्टी अपनी पकड़ बना रही थी।
  • १९९५ में गुजरात में बीजेपी सत्ता में आई। शंकर सिंह वाद्घेला और मोदी को इस जीत का श्रेय दिया गया। हालांकि मोदी तब तक पर्दे के पीछे रहकर ही काम कर रहे थे। 
  • १९९५ में ही मोदी ने आडवाणी की रथ यात्रा और कन्याकुमारी से कश्मीर तक की मार्च आयोजित किया। जिसकी सफलता से खुश होकर मोदी को केंद्र में भाजपा का राष्ट्रीय सचिव बनाया गया। 
  • सचिव के तौर पर मोदी ने ५ राज्यों की जिम्मेदारी ली। १९९५ में ही गुजरात और हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनावों की जिम्मेदारी भी मोदी ने ही संभाली। पार्टी ने उन्हें राष्ट्रीय महासचिव बनाया।
  • २००१ में विनाशकारी भूकंप के कारण केशुभाई को मुख्यमंत्री पद से हटना पड़ा। तब मोदी ने यह जिम्मेदारी संभाली। 
  • २००२ मोदी के राजनीतिक जीवन का सबसे काला वर्ष रहा। उन पर गोआँारा के दंगों को हवा देने का आरोप लगा, जो उनके प्रधानमंत्री बनने की राह में सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है।
  • वर्ष २००५ में मोदी को अमेरिका ने वीजा देने से इंकार कर दिया।
  • २००७ में मोदी एक बार फिर विधानसभा चुनावों में जीत हासिल कर मुख्यमंत्री बने।
  • ३१ अगस्त २०१२ को मोदी ने इंटरनेट के जरिए ऑनलाइन 
  • लोगों से बात की। इनमें विदेशों में रह रहे गुजराती भी शामिल थे। 
  • जनता से जुड़े रहने के लिए मोदी ट्वीटर का बखूबी इस्तेमाल करते हैं। 

और अब हालिया विधानसभा चुनावों में दमदार जीत दर्ज कर मोदी ने खुद को भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री के लिए सबसे प्रबल दावेदार के रूप में सामने किया है।

 

 
         
 
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