fnYyh uks,Mk nsgjknwu ls izdkf'kr
चौदह o"kksZa ls izdkf'kr jk"Vªh; lkIrkfgd lekpkj i=
vad 14 23-09-2017
 
rktk [kcj  
 
न्यूज़-एक्सरे 
 
हवाई बयानों की उड़ान

प्रदेश की सरकार बदलते ही नए निजाम को नैनी-सैनी हवाई अड्डा याद आता है। वे तत्काल पिथौरागढ़ पहुंचकर यहां से हवाई उड़ान भरने का वादा कर चले जाते हैं। दशकों से सिर्फ वादे और द्घोषणाएं ही हो रही हैं। हवाई उड़ान अभी तक शुरू नहीं हो पाई है। दूसरी ओर हवाई पट्टी के लिए किसानों से कृषि योग्य भूमि छीन ली गई। आज ये किसान बेरोजगार और मजदूर बनने पर विवश हैं 

 

जिस जमीन से हम साल भर का राशन और चारा प्राप्त कर लेते थे, अब वह हमारी नहीं रही। बची-खुची जमीन से तीन माह का राशन ही निकल पाता है। राशन और चारे के लिए हम बाजार पर निर्भर हो गए हैं। खेती एवं पशुपालन दोनों ही बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। अब हालत यह है कि न तो खाने को भरपूर अनाज पैदा हो पाता है न पीने को पानी की व्यवस्था है न ही मवेशियों के लिए चारा उपलब्आँा होता है। हमसे बड़ी गलती हो गई अगर जानते कि इसी तरह का आधा अधूरा विकास होगा तो कदापि हम अपनी जमीन हवाई पट्टी के नाम नहीं सौंपते। यह व्यथा उस नैनी-सैनी इलाके के लोगों की है जहां हवाई सेवाएं शुरू करने के लिए ४८ करोड़ रुपए की द्घोषणा पिछले २७ नवम्बर को सूबे के मुखिया विजय बहुगुणा कर गए। 

फसलों से लहलहाने वाले खेतों को कंक्रीट की पट्टी बनाने के लिए ग्रामीणों ने इसलिए अधिग्रहित करवा दिया ताकि उनके गांव की कायापलट हो सके। पिछले २४ साल से इस इलाके में कई मुख्यमंत्री, मंत्री, कैबिनट सचिव पधार द्घोषणाओं पर द्घोषणाएं कर चुके हैं लेकिन गांव के बाशिंदों के सपने आज तक पूरे नहीं हो पाए हैं। इस बार मुख्यमंत्री बहुगुणा की आत्मविश्वास से भरी द्घोषणाएं भी लोगों में आशा का संचार नहीं कर पाई हैं। क्षेत्रीय लोगों का कहना है कि जब इतने सालों में हवाई उड़ान शुरू नहीं हो पाई तो अब क्या होगी। 

नैनी सैनी उड़मथा सुजई खूनी, गेंढ़ना, कनारी, पांभे, पदेरा, देवत, मखोली, दौला, जाजरदेवल गांवों के ६०० परिवारों की जमीन नैनी-सैनी हवाई पट्टी के नाम अधिग्रहित हो चुकी है। पहले अधिग्रहण में १२ हजार रुपया नाली, दूसरे में ३२ हजार, तीसरे में २ लाख रुपया नाली के हिसाब से जमीन का मुआवजा ग्रामीणों को अवश्य मिला लेकिन कुछ ग्रामीण ऐसे भी थे जिनकी कुल जमीन २ से ३ नाली या इससे भी कम थी। उनकी भूमि भी अधिग्रहण की भेंट चढ़ गई। कम जमीन वालों को मुआवजे का जो रुपया पैसा मिला था वह खत्म हो चुका है। खेतों पर निर्भर ये ग्रामीण मजदूरी, खोमचे लगाने या छोटी-मोटी नौकरी करने पर विवश हैं। पैसा आधारित बाजारी अर्थव्यवस्था में यह ग्रामीण खुद को अब असुरक्षित महसूस करने लगे हैं। 

दस हजार की आबादी वाला यह इलाका आज कई समस्याओं से दो-चार है। जिन लोगों की जमीन चली गई वह लंबे समय से जमीन के बदले जमीन की मांग कर रहे हैं। हवाई पट्टी बनेगी तो ग्रामीणों को रोजगार मिलेगा वाली बात छोड़ ही दें। मनरेगा के तहत १०० दिन का रोजगार भी लोगों को नहीं मिल रहा है। इस गांरटी वाली योजना के अंतर्गत मांग के अनुसार काम नहीं मिलने से लोग रोजगार के अभाव में बेकार बैठे हैं। अब बाहर से आकर लोग औने-पौने दामों में यहां जमीनें खरीद रहे हैं। जमीन खरीदने के लिए हर रोज लोगों की यहां आवाजाही बनी रहती है। बची खुची जमीन में मकान बनने से खेती बुरी तरह प्रभावित हुई है। हवाई पट्टी स्थानीय लोगों को रोजगार तो नहीं दे पाई वहीं मुआवजे के रूप में मिला पैसा कई परिवारों की बर्बादी का कारण भी बन गया। कई लोगों ने मुआवजे के रूप में मिले पैसे को जुआ, शराब और ऐशोआराम की चीजों में उड़ा दिया। दूसरी ओर आत्मनिर्भर यह गांव अब अपने को पराधीन महसूस करने लगा है। नैनी-सैनी के ग्राम प्रधान कुंदन सिंह कहते हैं। गांव के पानी के छह स्रोत खत्म हो जाने से यहां पानी की समस्या पैदा हो गयी है। पहले गांव वाले आत्मनिर्भर थे। यहां की खेती सोना उगलती थी। पूरे साल का राशन और चारा उपलब्ध हो जाता था। सिर्फ तेल एवं साबुन के लिए हम बाजार पर निर्भर थे। लेकिन अब न तो खेत रहे न खेती। पशुपालन भी कम हो गया है। हमारी जमीन के बदले जमीन की मांग को नजरअंदाज किया जा रहा है। पिछले दिनों जब मुख्यमंत्री यहां आए थे तो इसकी सूचना तक हमें नहीं दी गई। हम क्षेत्र की समस्याओं को लेकर उनसे मिलना चाहते थे।

इसी गांव की महिला आशा देवी कहती हैं। हम चाहते हैं कि हवाई पट्टी जल्द बन जाय और हमें भी कोई नुकसान न हो। अब हम किसी भी सूरत में जमीन नहीं देंगे। विकास पूरा होना चाहिए। इस आधे अधूरे विकास से हम क्या करेंगे।  हम यहीं रहना चाहते हैं, इसलिए सरकार जो भी करे वह गांव वालों के हकों की कीमत पर नहीं होना चाहिए। 

चारागाह में तब्दील हो चुकी इस हवाई पट्टी के आस-पास की खाली पड़ी जमीन पर अपने मवेशियों को चराने आए मोहन सिंह उदास स्वर में कहते हैं। हमें नहीं मालूम क्या हो रहा है। हवाई पट्टी बने न बने। हमारी तो जमीन चली गई है जो मुआवजा मिला वह अब खत्म हो गया है।' लोगों के ये बयान विकास की उस भयावहता को तो दर्शाते हैं जिसमें लोग मालिक से नौकर की स्थिति में आते हैं।

दूसरी ओर मुख्यमंत्री के दावों पर यकीन करें तो एक महीने बाद द्घाटी से हवाई उड़ानें शुरू हो जाएंगी। जो काम पिछले २४ सालों में नहीं हुआ वह अब होगा। मुख्यमंत्री ने जनवरी २०१३ से हवाई उड़ान शुरू करने का आश्वासन जनपदवासियों को दिया है। उन्होंने हवाई पट्टी के विस्तारीकरण के लिए ४८१९.६३ लाख की योजना स्वीकृत की और दावा किया है कि जनवरी में ४२ सीटर विमान यहां से उड़ान शुरू कर देगा। पहले चरण में तीन करोड़ रुपए स्वीकूत किए जाने की जानकारी भी उन्होंने दी। आज से १९ साल पहले वर्ष १९९३ में ५० लाख रुपए की लागत से बने टर्मिनल हाउस को धवस्त किया जाएगा। उसके स्थान पर करोड़ों की लागत से नया टर्मिनल हाउस बनेगा। इस प्रकार के धन का दुरुपयोग के अलावा किसी का लाभ नहीं हो रहा। पूर्व के भवन पर लाखों खर्च क्यों किया गया? राज्य अवस्थापना निगम इस नये टर्मिनल भवन का निर्माण करेगा। हवाई पट्टियों के विस्तारीकरण एवं यहां से शीद्घ्र उड़ान भरने के सरकारी दावे कितने सही साबित हुए हैं वह १९ सालों से बंजर पड़ी हवाई पट्टी  की स्थिति से समझी जा सकती है। वर्ष १९८७-८८ में नैनी- सैनी इलाके के लोगों ने सैकड़ों नाली जमीन हवाई पट्टी के नाम पर इसलिए अधिग्रहित करवा दी कि आने वाले भविष्य में उनके गांव का नाम पर्यटन मानचित्र में उभर कर आएगा। और उनके गांव से देश-विदेश के लिए उड़ाने भरी जाएंगी और ग्रामीणों को रोजगार भी उपलब्ध हो पाएगा। तब इन ग्रामीण काश्तकारों को क्या पता था कि जिन उपजाऊ जमीनों पर वह हवाई पट्टी के नाम पर अधिग्रहित करवा रहे हैं वहां भविष्य में सीमेंट की पट्टी की अलावा और कुछ नहीं होने वाला। वर्ष १९९३ में तत्कालीन उड्ययन मंत्री गुलाम नबी आजाद और उप्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने इसका उद्द्घाटन किया था। 

शुरुआती दौर में हवाई पट्टी के निर्माण के समय प्रशासन ने ग्रामीणों से २८८ नाली ८ मुट्ठी भूमि क्रय की थी। वर्ष १९९१-९२ में १९२ नाली १२ मुट्ठी भूमि फिर से अधिकूत की गई। वर्ष १९९२ में जब यह हवाई पट्टी बनकर तैयार हुई तो साढ़े तीन करोड़ रुपए इसमें खर्च किए गए।  तब इस हवाई पट्टी का रनवे १५२० गुणा ४३ मीटर था। जब हवाई उड़ान की बारी आई तो नागरिक उड्ययन विकास विभाग की तकनीकी शाखा ने इसे छोटी मानकर हवाई उड़ान भरने से इंकार कर दिया। दूसरा कारण यह था कि पट्टी में कई जगह दरारें भी आ गईं। तब इसके विस्तारीकरण की आवश्यकता को देखते हुए जमीनों की आवश्यकता पड़ी। शुरुआती दौर में ग्रामीण इस जमीन को किसी भी हालत में नहीं देना चाहते थे। बाद में जमीनें अधिग्रहित करवाई गई। वर्षं २००२ में कांगे्रस सरकार ने यहां से हवाई उड़ान भरने का दावा किया और कहा कि नैनी- सैनी सहित राज्य की सभी हवाई पट्टियों का विस्तार कर इसका मास्टर प्लान तैयार करने की जिम्मेदारी फोस्टर संस्था को सौंपी गई है। वर्ष २००७ में जब भाजपा की सरकार बनी और स्थानीय विधायक प्रकाश पंत पर्यटन मंत्री बने तो वह भी जब तब यहां से हवाई उड़ान भरने की द्घोषणा करने से नहीं चूके। लेकिन पूरे पांच साल के कार्यकाल में यहां से हवाई उड़ाने सुचारू नहीं हो पाई हैं। नागरिक उड्यन विभाग ने इस बीच हवाई पट्टी के विस्तारीकरण की स्वीकूति दी। इस हवाई पट्टी के रनवे को बढ़ाकर १६४० गुणा ४० मीटर बनाया गया और दावा किया गया कि यहां पर ७२ सीटर विमान उतरेगा। एक बार फिर ७२ सीटर तो नही ं४२ सीटर विमान उतारने के बयानों पर चर्चा अवश्य हो रही है।  इससे पहले रेल इंडिया टेक्निकल एंड इकोनामिक्स (राइर्टस) संस्था को भी इसकी डीपीआर एवं डिजाइन बनाने का काम सौंपा गया, जिसने ५४ करोड़ रूपए की डीपीआर बनाकर सरकार को सौंप दी। उत्तराखण्ड इंफ्रास्ट्रक्चर डवलपमेंट कारपोरशन (यूआईडीसी) द्वारा भी कई बार इसका सुपरविजन किया जा चुका है। 

नवंबर २०११ में १.५ किमी. लंबी इस हवाई पट्टी में ११ सीटर विमान से विमानन कंपनी डेक्कन चार्टर्स ने ट्रायल लेंडिग भी की। उस वक्त कहा गया कि ९ से १२ सीटर सेवा यहां से शुरू होगी जो पिथौरागढ से दिल्ली व देहरादून को हवाई सेवाएं प्रदान करेगी। सप्ताह में दो दिन हवाई सेवाएं शुरू होने की बात भी कही गई। ट्रायल के वक्त संसदीय कार्य व पेयजल मंत्री प्रकाश पंत ने कंपनी को मुफ्त एयर स्ट्रिप, सुरक्षा, पानी, बिजली देने की सहमति जताई थी। कहा गया कि टर्मिनल भवन की मरम्मत एवं हवाई पट्टी की सुरक्षा के लिए तारबाड़ भी की जाएगी। इस तरह के दावे एवं बयान समय के साथ टांय-टांय फिस्स हो गए। देखा जाय तो करोड़ों रुपए हवाई पट्टी के नाम पर पानी की तरह बहाया गया है। बेकार पड़ी इन हवाई पट्टियों से भले ही हवाई उड़ाने शुरू न हो पा रही हो लेकिन आए दिन हवाई बयान जरूर उड़ रहे हैं। बीते १९ वर्षों में नैनी सैनी स्थित यह हवाई पट्टी क्रिकेट खेलने, गाड़ी सीखने व पैराग्लाडिंग करने वालों की पहली पंसद अवश्य बनी। व्यावसायी राजेश पांडेय कहते हैं। यह तो घोषणाओं का विकास है। कई सालों से तरह-तरह की द्घोषणाएं हो रही हैं। जब तक द्घोषणाएं अमल में नहीं आ पाती तब तक इस तरह के बयानों में विश्वास करना कठिन है। आज तक मुख्यालय की बिजली, पानी, सड़क, स्वास्थ्य जैसी स्थितियां नहीं सुधर पाई हैं तो ऐसे में अगर हवाई उड़ान शुरू भी हो जाए तो इससे आम आदमी को क्या लाभ होने वाला है।

नए वर्ष के पहले माह में यहां से उड़ान भरते हवाई जहाज लोगों को दिखाई देंगे या फिर मुख्यमंत्री बहुगुणा का यह बयान भी 'हवाई' ही साबित होगा। फिलहाल इसका जवाब वक्त की कोख में बंद है। इन सबके बीच ग्रामीणों के उस दर्द को कौन महसूस कर पाएगा जिनकी जमीन भी गई और रोजगार भी नहीं मिला। 

 
         
 
ges tkus | vkids lq>ko | lEidZ djsa | foKkiu
 
fn laMs iksLV fo'ks"k
 
 
fiNyk vad pquss
o"kZ  
 
 
 
vkidk er

क्या मुख्यमंत्री हरीश रावत के सचिव के स्टिंग आॅपरेशन की खबर से कांग्रेस की छवि प्रभावित हुई है?

gkW uk
 
 
vc rd er ifj.kke
gkW & 68%
uk & 14%
 
 
fiNyk vad

  • कृष्ण कुमार

चुनाव के समय भाजपा ने अन्य राजनीतिक दलों के नेताओं के लिए दरवाजे खोलकर एक तरह से प्रदेश की राजनीति की दिशा और दशा बदल कर रख दी। प्रदेश में

foLrkkj ls
 
 
vkidh jkf'k
foLrkkj ls
 
 
U;wtysVj
Enter your Email Address
 
 
osclkbV ns[kh xbZ
1825146
ckj