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आवरण कथा
 
अब अधिनायक बनने का खतरा

गुजरात विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हैट्रिक लगाई है। इस जीत से उनके लिए दिल्ली तक पहुंचने का रास्ता साफ हो गया है। तमाम विरोधों अवरोधों और नापसंदगियों के बावजूद अगले २०१४ के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद की दावेदारी मजबूत हो गई है। यह न भाजपा के हित में है न लोकतंत्र के लिए शुभ है। कारण कि जिस तरह गुजरात में उन्होंने पार्टी से बड़ी अपनी छवि गढ़ ली, वह प्रवृत्ति अब उनको अआिँानायक बना सकती है। नया खतरा यही है

 

पूरे देश-दुनिया की नजर २० दिसंबर यानी गुजरात विधानसभा चुनाव के नतीजों पर थी। वह भी मुख्य रूप से 'मीडिया मैन' नरेन्द्र मोदी पर। यह चुनाव मोदी बनाम सोनिया मान लिया गया था। इसे २०१४ लोकसभा चुनाव रिहर्सल के रूप में भी देखा जा रहा था। अटकलों-कयासों का बाजार गर्म था। सट्टेबाजी का ग्राफ भी हाईप पर। यहां तक कहा गया कि इस बार दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश नहीं गुजरात से होकर गुजरेगा।

अमूमन सिनेमा और सियासत का सीधा संबंध होता नहीं है। लेकिन इसे महज इत्तेफाक ही समझा जाएगा कि दबंग-२ के सिनेमाद्घरों में प्रदर्शन की पूर्व संध्या पर गुजरात के दबंग ने तीसरी बार जीत हासिल कर हैट्रिक लगा ली है। सिनेमा का दबंग अपनी अदाकारी की बदौलत जनता का मनोरंजन करता है। मगर इस सियासत के दबंग ने जिन कारणों से दबंगई हासिल वो दानवता के दायरे में आता है। सुविधा के लिए आप उसे गुजरात दंगे का नाम दे सकते हैं। नरेन्द्र मोदी ने वैज्ञानिक न्यूटन के सिद्धांत क्रिया के बराबर प्रतिक्रिया का सहारा लेकर सियासत को दावानल में तब्दील कर दिया। इस हैट्रिक से वे देश के भावी कर्णधार के रूप में देखे जा रहे हैं। जीत के जश्न में पगे एक पत्रकार ने नरेन्द्र मोदी की मां से बात की तो मां ने कहा-'मेरे बेटे को अब प्रधानमंत्री बनना चाहिए।' मां की टिप्पणी के तुरंत बाद किसी ने ट्वीट किया-'नरेन्द्र मोदी अब राष्ट्रीय स्तर पर आने को तैयार हैं। इससे दुखदायी हमारी कंगाल राजनीति का प्रतीक कुछ और नहीं हो सकता।' मोदी की जीत के जश्न के हंगामे में भाजपा हिमाचल में हुई अपनी शिकस्त को छिपाने की कोशिश में जुट गई। गुजरात में इस बार भाजपा ने ११५ सीटों पर जीत हासिल की है। जबकि कांग्रेस को ६१ सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। भाजपा से अलग होकर केशुभाई पटेल की पार्टी गुजरात परिवर्तन पार्टी के झोले में दो सीटें आईं। 

वर्ष २००७ में हुए विधानसभा चुनाव में मोदी की अगुवाई में भाजपा ने ११७ सीटें जीती थीं। इस बार गुजरात विधानसभा चुनावों के दौरान हुई ७१ फीसदी वोटिंग सुर्खियों में रही। आमतौर पर अब तक चुनावी पंडित यही कहते रहे हैं कि वोट प्रतिशत का बढ़ना सत्ताधारी दल के लिए प्रतिकूल माना जाता है। लेकिन इस धारणा को गुजरात के मौजूदा चुनाव परिणाम ने गलत साबित कर दिया। हां, हिमाचल वोटिंग प्रतिशत का बढ़ना पुरानी धारणा की पुष्टि जरूर करता है।

नरेन्द्र मोदी की इस जीत के कई मायने हैं और यह देश के भावी राजनीति का भविष्य भी तय करने वाली है। यह जीत गुजरात की सीमाओं का अतिक्रमण कर दिल्ली में केंद्र और समूचे देश को प्रभावित कर सकती है। ऐसा माना जाता है कि नरेन्द्र मोदी सेल्फ मेड या मीडिया मैन हैं। उन्हें मीडिया ने ज्यादा बनाया है। पिछले दिनों दुनिया की सर्वाधिक प्रतिष्ठित पत्रिका 'टाइम' ने मोदी को भावी प्रधानमंत्री के रूप में पेश किया था। वे लोकप्रियता के रथ पर सवार होकर सरपट दौड़ते जा रहे हैं। वे विकास की नई लीक जरूर खींच रहे हैं, मगर सवाल है यह सब किन शर्तों और किस बुनियाद पर खड़ा है।

लार्जर दैन लाइफ की तर्ज पर नरेन्द्र मोदी की स्थिति भाजपा में 'लार्जर दैन पार्टी' की बन गई है। गुजरात में भाजपा नहीं, मोदी चुनावी मैदान में थे। सोनिया ने गुजरात जाकर मोर्चा संभाला। नई तकनीक का मोदी ने बखूबी इस्तेमाल किया। वे एक समय कई जगहों पर एक साथ दिखे। कहना न होगा कि तकनीक के मामले में कांग्रेस-भाजपा या कहें मोदी से इस बाबत पिछड़ गई। चुनाव प्रचार के दौरान नरेन्द्र मोदी के मुकाबले में प्रदेश कांग्रेस का कोई चेहरा उनके आस-पास भी नहीं ठहरता है। इसीलिए उन्होंने सीधे केंद्र की सरकार या कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पर हमले बोले। विकास के मुद्दे को भी उन्होंने अपने पक्ष में खूब भुनाया।

गुजरात में मोदी का चुनाव जीतना दूसरी राजनीतिक पार्टियों के लिए जीवन परेशान करने वाला है, उससे ज्यादा खुद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संद्घ के लिए हतप्रभ करने वाला है। न वे भाजपा के लिए सुखकर है न संद्घ के वास्ते। ऊपरी तौर पर भाजपा-संद्घ दुनिया को दिखाने के लिए कुछ भी कहें सच तो यही है कि नरेन्द्र मोदी दोनों के लिए ही गले की हड्डी बन गए हैं, जिसे न निगलते बन रहा है, न उगलते ही। एक पत्रकार नवल जोशी ने इस बाबत फेसबुक पर लिखा-'कहा जा सकता है कि भाजपा और संद्घ की राजनीति को मोदी उसके चरम तक ले आए हैं जिसके बाद केवल व्यक्ति ही निर्णायक हो जाता है। उसके लिए न कोई पार्टी, न कोई सिद्धांत या न कोई नीति निर्देशक तत्व बचा रह जाता है। वह परम स्वतंत्र किसी देश के लिए अच्छा नहीं है, किसी राजनीति के लिए था चाहे वह कोई भी हो।' लेकिन इसका एक दूसरा पक्ष भी है जो जनता पार्टी अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी जैसे लोगों का है। स्वामी की टिप्पणी है- 'मोदी का समर्थन करने की जरूरत इसलिए है क्योंकि उनके पास रीढ़ है और वे उदारवादियों की जरा भी परवाह नहीं करते।

ऐसा अक्सर होता है कि सफलता दंभ से भर देती है और दंभ अधिनायक बना देता है। नरेन्द्र मोदी की सफलता में भी यह खतरा है। हालांकि इसकी संभावना क्षीण हैं। मगर इतना तय है कि मोदी का प्रधानमंत्री बनना ही नहीं उस ओर बढ़ना भी खतरनाक है।

यह न देश हित में है, न लोकतंत्र के हित में और न ही भाजपा के हित में। बेशक मौजूदा कामयाबी से उनके सपने और सीना चौड़ा हो गया होगा। लेकिन उनके और उनके सपनों के बीच सबसे बड़ी बाधा उनकी पार्टी के लोग और संद्घ ही है। दिल्ली में बैठी भाजपा की शीर्ष पंक्ति में से शायद ही कोई नेता मोदी को भावी प्रधानमंत्री के रूप में देखने के पक्ष में है। लेकिन सवाल है कि अगर विकल्पहीनता की स्थिति में मोदी को भाजपा ने २०१४ में बतौर भावी प्रधानमंत्री के रूप में खड़ा कर दिया तब क्या होगा? और जिस तरह इस समय गुजरात में वे संद्घ की बेवफाई और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के पूर्ण सहयोग के अभाव में किला फतह कर लिया है, अगर वही कहानी उन्होंने लोकसभा चुनाव में दोहरा दी तब तक क्या होगा? क्या होगा अगर मोदी वास्तव में देश के प्रधानमंत्री बन ही गए। ये तमाम सवाल उन लोगों के जेहन में खदबदा रहे हैं। जो चेतना के स्तर पर जागरूक नागरिक हैं। एक बड़ा वर्ग है इस देश का जिसकी राय में मोदी का प्रधानमंत्री बनना देश की जनता के हित में नहीं है। खुद मोदी के भीतर देश के प्रधानमंत्री बनने का सपना किस तरह कुलाचे भर रहा है उसका संकेत उन्होंने अपनी जीत के बाद वाली प्रतिक्रिया में संकेतों में अभिव्यक्त कर दी है। मोदी ने जीत के तुरंत बाद ट्विटर पर लिखा-'पीछे देखने की जरूरत नहीं, अब आगे बढ़ना है।' आगे दिल्ली की गद्दी है, यह साफ है। और वे उसी ओर बढ़ना चाहते हैं। हालांकि अगले लोकसभा चुनाव में पार्टी के प्रधानमंत्री पद के दावेदार के बाबत पार्टी असमंजस में है। भाजपा प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद का कहना है-'भाजपा को इस बात का गर्व है कि उसके प्रधानमंत्री बनने की क्षमता रखने वाले अनेक नेता हैं। उचित समय पर उम्मीदवार को चुना जाएगा।' वैसे मोदी की इस जीत से गुजरात से दूर बिहार की गद्दी पर बैठे नीतीश कुमार जरूर मायूस हुए होंगे। 

बहरहाल मोदी की जीत पर भाजपा में मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार द्घोषित करने की मांग ने जोर पकड़ लिया है। मोदी समर्थक पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी पर हमलावर होते दिखाई दे रहे हैं। राम जेठमलानी का कहना है-'हिन्दुस्तान में अगर कोई प्रधानमंत्री बनने लायक है तो वह नरेन्द्र मोदी ही है' वे इस बाबत पार्टी में दबाव भी बनाने वाले हैं।

रही बात हिमाचल में प्रेम कुमार धूमल की शिकस्त और कांग्रेस की जीत की तो मोदी की जीत के जश्न में वहां कांग्रेस की सफलता धुंधली हो गई। यहां कांग्रेस को ३६ और भाजपा को २६ सीटें मिली, अन्य को ६ सीटें हाथ लगी। हिमाचल में कांग्रेसी नेता वीरभद्र सिंह का मुख्यमंत्री बनना तय है। उनको दो महीने पहले केंद्र से हटाकर वहां का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था। वैसे भी उन्होंने एलान किया था कि यह उनके जीवन का अंतिम चुनाव है। जनता ने ट्रेंड को तोड़ते हुए और केंद्र की नीतियां जिसमें रसोई गैस में कटौती और महंगाई भी शामिल है को नजरअंदाज कर कांग्रेस को चुना। इसकी एक वजह प्रदेश भाजपा नेताओं का भ्रष्टाचार के आरोपों में द्घिरा होना भी रहा। जिस तरह केंद्र में कई मंत्री भ्रष्टाचार और द्घोटालों के आरोपी रहे, यह आलम हिमाचल में भाजपा सरकार का भी रहा। कुल मिलाकर इन दोनों विधानसभा के चुनावी नतीजों ने जता दिया कि जनता अपने ढंग से सोचती है और फैसला देती है। 

 
         
 
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