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अंतिम संवाद
 
पलायन विरोधियों ने किया पलायन

उत्तराखण्ड के प्रथम मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी का १२ दिसंबर को निधन हो गया। यह प्रदेश के लिए अपूरणीय रिक्तता है। दि संडे पोस्ट के रोमिंग एसोसिएट एडिटर गुंजन कुमार ने इस अखबार के विशेषांक के लिए हाल ही में उनसे एक साक्षात्कार लिया था। संभवतः मीडिया को दिया गया यह उनका अंतिम साक्षात्कार है। उसे हम श्रद्धांजलि स्वरूप यहां प्रस्तुत कर रहे हैं

 

किसी नए राज्य के विकास के लिए बारह साल का समय कम नहीं होता। उत्तराखण्ड जिस विजन के साथ बना था, क्या उस ओर प्रदेश बढ़ रहा है?

आप हर किसी को संतुष्ट नहीं कर सकते। देश आजाद हुए ६५ साल से ज्यादा का समय हो गया। अभी भी इसे विकसित राष्ट्र बनाने के लिए बहुत कुछ करना है। यही उत्तराखण्ड के लिए भी कह सकते हैं। प्रदेश में विकास धीरे-धीरे हो रहा है। भाजपा सरकार के कार्यकाल में बहुत कुछ हुआ था। वर्तमान सरकार भी जो कुछ कर सकती है, कर रही है। 

लेकिन प्रदेश के बुद्धिजीवियों के साथ ही आम लोग भी कहते हैं कि वे इससे बेहतर स्थिति में तो उत्तर प्रदेश में थे। ऐसा क्यों?

यह उनका दृष्टिकोण हो सकता है। लेकिन उत्तर प्रदेश में आप जाएंगे तो वहां भी सैकड़ों समस्याएं हैं। यहां ऐसा नहीं है। लोग चर्चा करते होंगे कि यह नहीं हुआ, वह नहीं हुआ। इसको लेकर आप यदि कहेंगे कि यहां कुछ नहीं हुआ तो यह गलत है। वर्ष २००० से २०१२ के बीच प्रदेश में कई कार्य हुए हैं।

प्रदेश में विकास तो भ्रष्टाचार का भी हुआ है। आपको ऐसा नहीं लगता?

हां कांग्रेस शासन काल में बहुत भ्रष्टाचार हुआ है। भ्रष्टाचार की कोई सीमा नहीं है। अंततोगत्वा इससे प्रदेश की जनता गरीब हो रही है। हमारे यहां कई संसाधन हैं-नदी, वन, जड़ी- बूटियां। हम लोग इनसे राज्य का विकास कर सकते हैं। मुझे काम करने का बहुत कम समय मिला। मैं मात्र ११ महीने मुख्यमंत्री रहा। उसमें भी हमेशा तलवार गर्दन पर लटकी रहती थी। यदि मेरे पास लंबा समय होता तो विकास की कई योजनाएं बनाता। लेकिन कोई मेरे बारे में बोले तो मैं ईमानदारी से कहूंगा कि समय की कमी के चलते मैंने कोई विकास नहीं किया। जनता की रोजमर्रा की समस्याएं सुनने और उन्हें सुलझाने में ही मेरा समय बीत गया। कोई मुझे कहे कि आपने उद्योग नहीं लगाए तो यह सही है। हमने उद्योग नहीं लगाए। जो लगाए भी तो वे ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं थे। कोश्यारी जी भी ज्यादा काम नहीं कर पाए क्योंकि उनको भी समय नहीं मिला। खण्डूड़ी जी को कुछ समय मिला तो उन्होंने कई काम किए। वर्तमान सरकार चाहे तो बहुत कुछ कर सकती है क्योंकि केंद्र में कांग्रेस की सरकार है। प्रदेश के मुख्यमंत्री केंद्र से बहुत सारी मदद ले सकते हैं। लेकिन वे सफल नहीं हो रहे हैं क्योंकि उनकी पार्टी का हर नेता पैसा कमाने में लगा है। यह भाजपा में नहीं है।

केंद्र की भाजपा सरकार ने अलग उत्तराखण्ड राज्य बनाया। उसके बाद करीब डेढ़ साल तक प्रदेश में पार्टी की सरकार भी रही। फिर भी २००२ के विआँाानसभा चुनाव में भाजपा की करारी हार हुई। ऐसा क्यों?

अलग उत्तराखण्ड राज्य भाजपा ने दिया। लेकिन प्रदेश में हमें जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए बहुत कम समय मिला।

टिहरी जैसे बड़े बांआँा क्या प्रदेश के लिए जरूरी हैं?

मेरा मानना है कि पानी को रोके और दूषित किए बिना बिजली बनती है तो फिर क्या दिक्कत है। बड़े बांधों की आवश्यकता भी नहीं है। टिहरी बांध काफी है। अब छोटे-छोटे बांध बनें। १० मेगावाट या २०-३० मेगावाट की परियोजनाएं लगें। मिनी हाइड्रो प्रोजेक्ट बनने चाहिए। जिस समय मुझे यह काम दिया गया था, उस समय मैंने करीब २०,००० ऐसे स्थान छांटे थे। जहां छोटी परियोजनाएं बन सकती हैं। पहाड़ों में आज भी द्घराट चलते हैं, उनमें गेहूं पिस जाता है। बड़े बांधों से लोगों को काफी परेशानियां होती हैं। पर्यावरण पर प्रभाव पड़ता है। विस्थापन की समस्या खड़ी होती है। छोटे-छोटे बांध होने पर ये समस्याएं नहीं होंगी।

लेकिन उत्तराखण्ड की प्रत्येक सरकार बड़े बांधों को मंजूरी दे रही है। इस पर कोई गंभीरता से रोक नहीं लगा रहा। क्यों

बड़े बांधों का लोग विरोध करने लगे हैं। ये कई समस्याओं की जड़ भी हैं। इसलिए छोटे बांधों को ही मंजूरी दें तो बेहतर होगा। कई लोग निर्मल धारा की बात करते हैं। उन्हें गांगा की निर्मल धारा भी चाहिए और बिजली भी। इसका विकल्प भी है। हमने भी कहा था कि गंगा की निर्मलता को प्रभावित नहीं किया जाना चाहिए। इसके लिए बांध कंपनियां नदियों की एक धार को हमेशा खुला रखें। इससे गंगा की निर्मलता बनी रहेगी और बिजली भी बनेगी। गंगा की निर्मलता लोगों की भावनाओं से जुड़ी हुई है। हमें उसका भी खयाल रखना चाहिए। हिन्दू समाज के लोग गंगा में अपने मृत परिजनों का अस्थि विसर्जन करते हैं। गंगा में पवित्र स्नान करते हैं। इसके लिए गंगा की एक धारा बिना अवरुद्ध किए बहती रहनी चाहिए। साथ में हमें विकास के लिए बिजली भी चाहिए, तो दोनों में संतुलन स्थापित करना होगा। हम भाजपा के लोग इसे करेंगे।

उत्तराखण्ड की एक और बड़ी समस्या पलायन की है। किसी भी सरकार ने इसे रोकने के लिए कोई नीति नहीं बनाई। आप भी नहीं बना पाए क्यों

कुछ लोग अपनी गलती से पलायन कर रहे हैं। मेरे पास जब दिल्ली की जिम्मेदारी थी, उस समय वहां दो-तीन कॉलोनियां उत्तराखण्ड के लोगों की थी। उन लोगों ने मुझे बुलाया। मैंने उनसे सवाल किया कि आप पलायन के खिलाफ हैं? लोगों ने बोला-हां। फिर मैंने पूछा तो आपने पलायन क्यों किया? बड़ी-बड़ी कोठियां यहां क्यों बनाई? दिल्ली-मुंबई में उद्योग लगा लिए, क्यों? यह एक ह्‌यूमन नेचर है। इसे आप नहीं रोक सकते। जो व्यक्ति जहां अपना लाभ देखता है, वह वहां चला जाता है। यह भाषण देने में बहुत अच्छा लगता है। पर जो भाषण दे रहे होते हैं वह खुद पलायन कर चुके हैं। पलायन का विरोध करने वाले ही पलायन कर गए। जबकि उन्हें वहीं छोटा सा स्कूल खोलना चाहिए था। कोई और व्यापार पहाड़ पर कर सकते थे। इससे वहां के कुछ लोगों को रोजगार भी मिलता। हम पहाड़ के लोगों को अपने क्षेत्रों में ऐसी सुविधाएं मुहैया कराएंगे जिसमें उन्हें द्घर बैठे काम मिलेगा। उन्हें रोजगार देंगे। पहाड़ में छोटे उद्योग लगाएंगे। पहाड़ में छोटे उद्योग लगाने के पर्याप्त संसाधन हैं। पहले क्या हुआ और वर्तमान में क्या हो रहा है। इस पर हम नहीं जा रहे। उत्तराखण्ड का भविष्य बेहतर हो इसके लिए हम लोग आपस में बात करते हैं। कांग्रेस कुछ नहीं करती। वह सिर्फ अपने लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए काम करती है। आपदा से पहले सरकार ने उससे निपटने का कोई उपाय नहीं किया। जिस कारण आपदा के बाद प्रभावित क्षेत्रों में राहत एवं बचाव कार्य में विलम्ब हुआ। अभी भी वहां के लोगों को राहत नहीं मिल रही है।

आपने अपने कार्यकाल में कौन से बड़ा फैसला लिया था?

कुछ याद नहीं आ रहा। लेकिन आप ताज्जुब करेंगे जब मुझे प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी दी गयी, तब मैंने अपने हाथों से मेज कुर्सी लगाने का काम किया। मैंने यह तय कर दिया था  कि जो व्यक्ति जितनी दूर से आएगा, उससे पहले मिलूंगा। मैं रोजाना बहुत लोगों से मिलता था। उनकी समस्याएं सुनकर दूर करने की कोशिश करता था। लोगों की यह शिकायत मुझसे नहीं रही। हां, विकास के लिए मैंने कोई बड़ी योजना नहीं बनाई थी। क्योंकि करीब ग्यारह माह मैं मुख्यमंत्री रहा और मेरा ज्यादातर समय राज्य को स्टेबलिस करने में ही लग गया। कुछ आवश्यक दबाव भी था। लोगों की अपनी-अपनी अपेक्षाएं थी। अटल जी और आडवाणी जी ने मुझे इस्तीफा देने के लिए मना किया, लेकिन मैंने उन्हें कह दिया कुछ लोग इस्तीफे की बात कर रहे हैं तो मैं दूंगा। फिर मैंने बाहर निकलकर मीडिया के सामने अपने इस्तीफे की द्घोषणा कर दी। मैंने अपने कार्यकाल में कोई बड़ा काम नहीं किया, लेकिन जनता के दैनिक काम को सही ढंग से अंजाम दिया।

आप पर बाहरी होने का आरोप लगता रहा है। आप क्या कहेंगे?

मैं ८५ साल से देहरादून में रह रहा हूं। आज जो मुझे बाहरी कह रहे हैं वे जब पैदा भी नहीं हुए थे तभी से मैं देहरादून में हूं। हां, देहरादून में मेरा सिर्फ जन्म नहीं हुआ है। मेरी शिक्षा-दीक्षा से लेकर कर्म भूमि भी देहरादून रही है। मेरा सारा जीवन उत्तराखण्ड में बीता। अभी भी मैंने पार्टी को कह दिया है कि मैं अपना पूरा समय जनता की सेवा में दूंगा। पार्टी से कुछ नहीं लूंगा।

वर्तमान उत्तराखण्ड को देखकर आपको सबसे ज्यादा क्या कचोटता है?

प्रदेश में जिस प्रकार से भ्रष्टाचार बढ़ा और हो रहा है वह हमें कचोटता है। मैं यह नहीं कहूंगा कि भाजपा सरकार में गलतियां नहीं हुई हैं। कुछ गलतियां उस समय भी हुई होंगी। लेकिन कांग्रेस के अधिकार नेता अपना द्घर भरने की सोच रखते हैं। यदि हमारी पार्टी में एक-दो लोग भ्रष्ट होंगे तो कांग्रेस में ९९ लोग भ्रष्टाचार से द्घिरे होंगे। तुलनात्मक दृष्टि से हमारा कैडर और कार्यकर्ता कांग्रेस से ईमानदार हैं। इसलिए मैं आशावान हूं कि प्रदेश का भविष्य उज्जवल है।

आप कांग्रेस पर आरोप लगाते हैं और प्रदेश में पांच साल तक भाजपा की भी सरकार रही, उसमें ढेरों द्घोटाले हुए। इस पर आपके क्या विचार हैं?

नहीं ऐसा नहीं होना चाहिए। कई बार जरूरत से ज्यादा कहा भी जाता है। भाजपा के शासन में एक-दो गलतियां हुई भी होंगी तो विपक्षी बढ़ा- चढ़ाकर कह रहे होंगे कि ६५ द्घोटाले हुए हैं। यदि ऐसा है तो इन द्घोटालों की जांच की जानी चाहिए। भ्रष्टाचार कांग्रेस में ज्यादा है। निशंक के बारे में आपने बात की तो इसकी भी जांच होनी चाहिए और दोषियों को सजा मिलनी चाहिए। फिर मैं वही कहूंगा कि तुलनात्मक दृष्टि से भाजपा कांग्रेस से सौ गुना अच्छी है।

 
         
 
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