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खास खबर 
 
पाले का भ्रष्ट प्रकोप

कागज के फल@भाग&5

  • रवि जोशी

    ravi@thesundaypost&in

 

 

पाले से प्रभावित आम के जीर्णोद्धार की योजना के नाम पर अधिकारियों ने सरकारी खजाने को लाखों का चूना लगाया। योजना के लिए रसायनों और औद्यानिक औजारों की खरीद में गड़बड़झाला साफ नजर आता है। खास बात यह है कि योजना का बनाया जाना ही संदेह के ?ksjs में है। जिस वर्ष आमों को पाले से नुकसान हुआ उस वर्ष अल्मोड़ा जिले में न तो कोई प्राकृतिक आपदा आई और न ज्यादा पाला पड़ा

 

 

  • पाले से प्रभावित आम को बचाने के लिए बनी 1-5 करोड़ की योजना।
  • सरकारी खजाने को ७५ लाख रुपए का चूना।
  • मुंबई] लुधियाना] बंगलुरू और गुजरात की कंपनियों से खरीदा गया सामान।
  • रसायनों और औद्योगिक औजारों की खरीद में द्घोटाले की बू।
  • विभाग की जरूरतों और योजना के लिए एक ही समय में खरीदे गए सामानों की कीमतों में भारी अंतर।
  • काश्तकारों के पास उतनी भूमि ही नहीं जितने में जीर्णोद्धार योजना चलाई गई।
  • जहां आम के पेड़ ही नहीं] वहां भी चली जीर्णोद्धार योजना।

 

 

वर्ष २००७&०८ में उद्यान विभाग में पाले से प्रभावित आमों के जीर्णोद्धार के नाम पर लाखों रुपए के वारे&न्यारे हुए। इस वर्ष अल्मोड़ा जिले में 1-5 करोड़ की लागत से एक योजना चलाई गई। जिसमें काश्तकारों को रेड लेड] कॉपर कार्बोनेट जैसे रसायन और कुछ औद्यानिक औजार देने की बात की गई है। विभाग ने इस योजना के लिए १३ अलग&अलग कंपनियों से लाखों के सामान खरीदे। इनमें से कुछ कंपनियां मुंबई] लुधियाना] बंगलुरू और गुजरात की थीं। इस योजना को अमल में लाने के आंकड़े यदि धरातल पर देखे जाएं तो किसी को भी चकित कर सकते हैं। एक ऐसे जिले में जहां सरकारी दस्तावेजों में २० हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में फलदार पेड़ हों] वहां सिर्फ आम के लिए १००० हेक्टेयर जमीन पर जीर्णोद्धार योजना बना दी गई। ऐसे में लगभग १५०० काश्तकारों को फायदा पहुंचाने के लिए बनाई गई 1-5 करोड़ रूपए की इस योजना को लेकर दाल में कुछ काला होने का संदेह पैदा होना स्वाभाविक है।

 

इसी संदेह को दूर करने के लिए ^दि संडे पोस्ट^ की टीम ने जब अपने स्तर से पड़ताल शुरू की तो योजना के लिए खरीदे गए सामान और विभाग द्वारा प्रत्येक वर्ष खरीदे जाने वाले सामान के दामों में बहुत अंतर पाया गया। किसी&किसी सामान में तो यह अंतर दोगुना तक था। सूचना के अधिकार कानून के तहत विभाग से मिली जानकारी के अनुसार वर्ष २००७&०८ में जिले के काश्तकारों के लिए हर साल की तरह मंगाए जाने वाले सामानों की सूची में जिस रेड लेड ऑक्साइड का दाम ११४&४० रुपए प्रति किलो है] वहीं इसी वर्ष योजना के लिए इसे २०८ #- प्रति किलो खरीदा गया। यानी ९३&६० #- ज्यादा दाम देकर कुल २००० किलो रेड लेड ऑक्साइड खरीदा गया। जिसमें सीधे तौर पर सरकारी खजाने को १ लाख ८७ हजार २०० रुपए का चूना लगाया गया। ऐसा ही कॉपर कार्बोनेट की खरीद में हुआ। वर्ष २००७&०८ में २२०&४८ #- प्रति किलो में खरीदा गया कॉपर कार्बोनेट आम के जीर्णोद्धार की योजना के लिए ३१२ #- प्रति किलो के दाम पर खरीदा गया। ९१&९२ #- के हिसाब से अधिक भुगतान कर इसे भी २००० किलो खरीदा गया] जिससे सरकारी खजाने को १ लाख ८३ हजार ४० रूपए की चपत लगाई गई। इस योजना के अंतर्गत अलसी का तेल भी १५०० काश्तकारों में बांटा गया] जिसके दामों में भी ऐसा ही अंतर है जो अलसी का तेल वर्ष २००७&०८ में ७०&७२ #- किलो खरीदा गया उसे योजना के लिए इसी वर्ष ९७&७६ #- प्रति किलो खरीदा गया। इस तेल की कुल खरीद २५०० किलो थी] इसलिए इसे खरीदने में विभाग के अधिकारियों ने ६७६०० #- के वारे&न्यारे किए। कॉपर ऑक्सीक्लोराइड की खरीद में भी कुछ ऐसा ही किया गया। इस रसायन को सामान्य वार्षिक व्यय के अनुसार खरीदा गया तो इसका दाम ३८८&९६ #- प्रति किग्रा दिया गया। लेकिन इसी वर्ष योजना के लिए इसे ४४० #- प्रति किलो खरीदा गया] प्रति किलो के हिसाब से ५१&०४ रुपये के अंतर से यह रसायन १००० किलो खरीदा गया। इससे सरकारी खजाने को ५१००० #- की चपत लगाई गई। इसके अलावा काश्तकारों को पाले से प्रभावित आम के जीर्णोद्धार के लिए मोनोक्रोटोफॉस भी दिया गया। जिसे विभाग ने इस योजना के लिए ४३७ #- प्रति लीटर खरीदा था] किंतु इसी वर्ष हर साल होने वाली खरीद की सूची में इसका दाम ३०८ #- प्रति लीटर दिखाया गया है। योजना के लिए विभाग ने कुल १००० लीटर मोनोक्रोटोफास खरीदा जिसमें सरकारी खजाने को १ लाख २९ हजार रुपये का नुकसान हुआ। इस योजना में काश्तकारों को देने के लिए १० हजार किलो यूरिया और इतना ही नवजीवन जी नाम की बायो खाद भी खरीदी गई] किंतु इन दोनों के दामों में अंतर नहीं था। इससे साफ है कि अधिकारियों ने सोच&समझकर खरीददारी की। उन्होंने कैमिकल तो ज्यादा दामों में खरीदे] लेकिन यूरिया और बायो खाद इसलिए उचित दामों पर खरीदे ताकि इनके बाजार में उपलब्ध होने से काश्तकारों के सामने उनकी पोल न खुल जाए। इस तरह इस योजना में सिर्फ रसायनों और खादों की खरीद पर उद्यान विभाग के अधिकारियों ने ६ लाख १७ हजार ८४० #- के वारे&न्यारे किए। 

 

आम जीर्णोद्धार योजना में रसायनों के साथ काश्तकारों को कुछ औद्यानिक औजार भी दिए गए जिनमें प्रूनिंग सीजर] बड़िग ग्राफ्टिंग नाइफ] प्रूनिंग स्केटियर आदि शामिल थे। पड़ताल के दौरान जब जिले के कई सचल दल केंद्रों से जानकारी प्राप्त की गई तो सभी ६ वर्ष पुरानी योजना को महंगे औद्यानिक औजारों के कारण याद रखे हुए थे। योजना में जिन औद्यानिक औजारों को काश्तकारों को बांटने की बात की गई] वह आमतौर पर सचल केंद्रों में उपलब्ध होने वाले औजारों से बहुत मंहगे थे। योजना की एक खास बात यह भी थी कि इसके अंतर्गत कागजों के अनुसार काश्तकारों को जो औद्यानिक औजार दिए गए उनमें महंगे और सस्ते दोनों तरह के औजार शामिल थे। जो प्रूनिंग सीजर खरीदी गई उसमें एक की कीमत २०५० #- थी और दूसरे की १२०२ #- थी। ऐसा ही बड़िग ग्राफ्टिंग नाइफ के साथ भी हुआ। योजना में किसानों के लिए दो तरह के बड़िग ग्राफ्टिंग नाइफ खरीदे गए जिसमें महंगे वाले की कीमत ५६५ #- प्रति और सस्ते वाले की कीमत १३६ #- प्रति नग थी। एक ही काम के लिए इस्तेमाल में आने वाली इन चीजों को सस्ता और महंगा के जोड़े में काश्तकारों को देने की योजना क्यों बनी] यह रहस्य है। क्योंकि अधिकारी इस विषय में बात करना पसंद ही नहीं कर रहे हैं। इस योजना के लिए उद्यान विभाग द्वारा की गई खरीदारी का हिसाब&किताब था। इसमें कई जगह अधिकारियों की काली कमाई के सबूत साफ दिखाई दे रहे हैं। 

 

अब बात योजना की आवश्यकता और उसके क्रियान्वयन की करें तो इसमें भी दाल में काला नजर आता है। बताया जाता है कि वर्ष २००७&०८ में अल्मोड़ा जिले में न तो ऐसी कोई प्राकृतिक आपदा आई थी और न ही पाले का ऐसा प्रकोप हुआ था कि आम के बागीचों को भारी नुकसान हुआ हो। इसके बाद भी इस योजना को तैयार और लागू किया गया। चूंकि योजना के क्रियान्वयन से पहले सचल दल केंद्रों से योजना को लेकर उनकी जरूरत नहीं पूछी गई थी] इसलिए जाहिर है कि उन पर इसके क्रियान्वयन को थोपा गया। सूचना का अधिकार कानून के तहत योजना का लाभ उठाने वाले काश्तारों की जो सूची मिली है] उसे देखकर नहीं लगता कि योजना का मकसद काश्तकारों को नुकसान से उबारना है] बल्कि ऐसा लगता है कि काश्तकारों को सहूलियत और लक्ष्य के अनुसार सिर्फ उपलब्ध सामान बांट दिया गया। जानकारी का ट्रेंड इस प्रकार है कि दन्या सचल दल केंद्र से ७० से अधिक काश्तकारों को २५ नाली भूमि पर आम जीर्णोद्धार कराया गया। मजखाली में २० काश्तकारों के एक&एक हेक्टेयर जमीन पर ही आम पाले से प्रभावित हुआ और उसका जीर्णोद्धार विभाग ने कराया। सल्ट और मछोड़ के भी २० काश्तकारों के एक&एक हेक्टेयर आम प्रभावित हुए जिनका विभाग की सहायता से जीर्णोद्धार किया गया। जिले के कुछ सचल दल केंद्रों को छोड़ दें तो बाकी जगह योजना के क्रियान्वयन का जो पैटर्न विभाग द्वारा दी गई सूचना में दिखता है वह क्रियान्वयन के नाम पर हुई खानापूर्ति को दिखाता है और स्वयं सत्यापित भी कर देता है। 

 

योजना के संबंध में काश्तकारों से बात की गई तो इसका दूसरा पहलू ही सामने आया। सबसे पहले तो कई काश्तकार ऐसे मिले जिनके पास उतनी जमीन ही नहीं थी जितनी कागजों में दिखाई गई थी। गैरा गांव में भोलादत्त पुत्र मोती राम को एक हेक्टेयर भूमि पर इस योजना का लाभ लेते हुए दिखाया गया है। हालांकि दो वर्ष पूर्व भोलादत्त की मृत्यु हो चुकी है] किंतु तब भी उनके पास इतनी जमीन नहीं थी। इसी गांव के दान सिंह को २ हेक्टेयर भूमि पर आम जीर्णोद्धार योजना का लाभार्थी दिखाया गया है जबकि उनके पास न तो इतनी भूमि है और न ही उन्होंने कभी आम का बाग लगाया है। मजखाली के मोहन सिंह पुत्र बहादुर सिंह को भी इस योजना में एक हेक्टेयर भूमि पर आम जीर्णोद्धार करते दिखाया गया है जबकि वहां न तो आम हैं और न हीं इनके पास इतनी भूमि। सल्ट सचल दल केंद्र के अंतर्गत बंद्राण गांव में हालांकि आम के बाग अवश्य हैं] लेकिन उतने नहीं जितने कि विभाग ने दिखाए है। सूचना के अधिकार से प्राप्त दस्तावेजों में यहां २० हेक्टेयर जमीन पर आम जीर्णोद्धार दिखाया गया है। बंद्राण गांव के सटे सारूढ़ गांव के ग्राम प्रधान भीम सिंह से इस विषय पर बात की तो उन्होंने बताया कि २० हेक्टेयर तो बहुत ज्यादा होता है। आम के बाग तो हैं] लेकिन वह ज्यादा से ज्यादा २ से ४ हेक्टेयर भूमि पर ही हैं। मछोड़ केंद्र के अंतर्गत आने वाले कोठलगांव की तस्वीर भी यही है। गांव की १६ हेक्टेयर भूमि पर आम जीर्णोद्धार कागजों पर दिखाया गया है] लेकिन वहां सिर्फ २&३ हेक्टेयर भूमि पर ही आम के बाग दिखाई देते हैं। इन काश्तकारों से विभाग से प्राप्त रसायन और औद्यानिक औजारों के बारे में पूछा गया तो कुछ ने कहा कि थोड़ी खाद दी गई थी और एक आरी दी गई थी। जबकि कुछ ने कहा कि आरी और एक चाकू दिया गया था जिससे टहनियों को काटा जाता है। इन औद्यानिक औजारों की अनुमानित लागत के विषय में काश्तकारों ने बताया कि औजार कुछ खास नहीं थे] लेकिन हमें बताया गया कि बहुत महंगे हैं। 

 

क्रियान्वयन का एक पहलू और भी है जो सचल दल केंद्रों में पड़ताल के दौरान सामने आया। वर्ष २००७&०८ की इस योजना के क्रियान्वयन में विभाग को एक साल से भी अधिक समय लगा। सचल दल केंद्रों की एसआर ¼स्टोर रजिस्टर½ स्लिप के अनुसार योजना के अंतर्गत काश्तकारों को दिया जाने वाला रसायन इन केंद्रों में वर्ष २००८ के अंतिम महीनों में पहुंचा और औद्यानिक औजार मई २००९ में केंद्रों पर पहुंचाए गए। इससे इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि कैसे पाले से प्रभावित आम के जीर्णोद्धार के नाम पर अधिकारियों ने 1-5 करोड़ की योजना बनाई और सरकारी खजाने से ७५ लाख रुपए लेकर उसकी बंदरबांट की।

 
         
 
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