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आवरण कथा
 
कुंभ भूमि पर कब्जा

  • गुंजन कुमार@अजय शर्मा

  gunjan@thesundaypost.in

 

हरिद्वार में lk/kq&संत सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अवहेलना कर सरकारी भूमि पर voS/k कब्जा करते रहे] लेकिन शासन&प्रशासन आंख मूंदकर बैठा रहा। वर्ष 2010 के कुंभ में अखाड़ों और /kkर्मिक संस्थाओं को अस्थायी रूप से आवंटित भूमि को ही प्रशासन खाली नहीं करवा पाया। इसी लापरवाही से बैरागी कैंप में बकायदा voS/k निर्माण हो गए। सिंचाई विभाग पिछले पांच वर्षों के दौरान इस बारे में शासन&प्रशासन को दर्जनों बार पत्र लिख चुका है] लेकिन lk/kq&संतों की ऊंची पकड़ के चलते कहीं से भी कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं दिखाई गई। कुंभ भूमि में अवैध कब्जों को लेकर ^दि संडे पोस्ट^ की सिलसिलेवार रिपोर्ट की पहली किस्त


कुंभ नगरी हरिद्वार में साधु&संत सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जे कर भव्य इमारतें बनाने में आगे रहे हैं। सरकार एवं उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों तक पहुंच होने के कारण स्थानीय प्रशासन उनके खिलाफ कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। इसी तरह का एक मामला बैरागी अखाड़ों का है। अखाड़े को वर्ष २०१० में हुए कुंभ मेले के दौरान सिंचाई विभाग की बैरागी कैंप स्थित जमीन अक्टूबर २००९ से मई २०१० तक के लिए अस्थाई रूप से आवंटित की गई थी। लेकिन अखाड़ों ने इस जमीन पर पक्का मंदिर बना लिया। सिंचाई विभाग ने संबंधित थाना और संबंधित सेक्टर के मजिस्ट्रेट को मार्च&अप्रैल २०१० में ही इस अवैध अतिक्रमण को गिराने का अनुरोध किया था। इस अनुरोध के बावजूद अतिक्रमण रोकने और निर्माण को गिराने की कोई कार्रवाई नहीं हुई। इससे अखाड़ों वालों के हौसले बुलंद होते गये। जिस कारण धीरे&धीरे इस जमीन पर मंदिर के साथ&साथ साधु&संतों के रहने के लिए पक्के कमरों का भी अवैध निर्माण कर लिया गया। यही नहीं सिंचाई विभाग के अधिकारियों का कहना है कि सरकारी जमीन पर अवैध कॉलोनी भी विकसित कर दी गई। बताया जाता है कि कई संतों ने सरकारी भूमि पर पहले कब्जा किया और फिर उसे आम लोगों को बेच दिया। जिससे इस क्षेत्र में एक छोटा सा नगर बस गया है। इसकी शिकायत भी प्रशासन से की गई] मगर उस पर भी कुछ नहीं हुआ। आखिर प्रशासन कार्रवाई करने में इतना लाचार क्यों] इसका जवाब खुद प्रशासन में बैठे लोगों के पास भी नहीं है।

 

आज कुंभ नगरी में सबसे अधिक सरकारी भूमि धार्मिक संस्थाओं के कब्जे और अवैध निर्माणों की भेंट चढ़ चुकी है। कुंभ मेला क्षेत्र में सिंचाई विभाग की भूमि पर सैकड़ों आश्रम और भवन खड़े हो चुके हैं। इसके अलावा सिंचाई विभाग और नगर निगम की भूमि पर भी अखाड़ों&मठों ने अवैध कब्जे कर लिए हैं। बैरागी कैम्प के हालात सबसे ज्यादा खराब है। यह मेले का अति महत्वपूर्ण क्षेत्र है। प्रत्येक कुंभ और अर्द्धकुंभ में प्रशासन इस क्षेत्र में धार्मिक संस्थाओं और अखाड़ों को अस्थाई भूखंड आंवटित करता है। इस दौरान सभी संस्थाएं यहां अस्थाई निर्माण करती हैं। वर्ष २०१० के कुंभ मेले में भी प्रशासन ने कई धार्मिक संस्थाओं] मठों और अखाड़ों के संतों को अस्थाई भूखंड आवंटित किये थे] लेकिन मेला समाप्त होने के बाद कई संस्थाओं ने इस क्षेत्र में अपने पक्के निर्माण करवाकर वहां जबरन कब्जा जमा लिया। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार किसी भी सरकारी भूमि पर धार्मिक स्थलों का निर्माण नहीं किया जा सकता। अगर कोई निर्माण किया जाता है तो उसे ध्वस्त करने का भी आदेश है। लेकिन प्रशासन संतों के रसूख और धार्मिक भावनाओं के चलते कार्रवाई करने से बचता रहा है।

 

आश्चर्यजनक है कि बैरागी कैंप से अतिक्रमण हटाने को लेकर सिंचाई खंड हरिद्वार के उपराजस्व अधिकारी और अधिशासी अभियंता के कार्यालय से मार्च २०१० से लेकर जनवरी २०१३ तक शासन&प्रशासन को करीब दो दर्जन बार २५ पत्र पत्र मेलाधिकारी और जिलाधिकारी से लेकर अन्य सभी संबंधित अधिकारियों से एफआईआर दर्ज करने एवं अतिक्रमण पर रोकथाम का अनुरोध किया जाता रहा] लेकिन कहीं से कोई जवाब तक नहीं दिया गया। मार्च २०१३ को सिंचाई खण्ड हरिद्वार द्वारा मेलाधिकारी को लिखे एक पत्र के मुताबिक जून २०१२ में बैरागी कैम्प स्थित आवासीय कमरों को पुलिस के सहयोग से ध्वस्त कर दिया गया था। लेकिन यहां मंदिर और अवैध कॉलोनी अभी भी यथावत है। इस पत्र में भी मेलाधिकारी से अतिक्रमण हटाने का आग्रह किया गया। फिर भी प्रशासन ने कोई कार्रवाई नहीं की। जब प्रशासन सरकारी विभाग की दर्जनों शिकायतों के बाद कार्रवाई नहीं करता है] तो फिर आम लोगों की शिकायत पर कितना अमल होता होगा] इसे आसानी से समझा जा सकता है।

 

इस पूरे मामले में आखिर किस विभाग ने लापरवाही cjrh\  ^दि संडे पोस्ट^ ने जब इसकी खोजबीन शुरू की तो कुछ चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। मसलन] मेला प्रशासन ने इस बात को स्वीकार किया कि सिंचाई खंड की शिकायत पर अधिकारी ने किसी थाने को कार्रवाई करने का निर्देश ही नहीं दिया। आखिर वह क्यों लापरवाह रहे? इसका जवाब मेला प्रशासन के पास नहीं है। २३ मार्च २०१३ को सिंचाई खंड हरिद्वार के अधिशासी अभियंता ने मेला अधिकारी को एक पत्र लिखकर अनुरोध किया  था कि वह कुंभ मेले के लिए आरक्षित समस्त भूमि में निषेधाज्ञा लगाने के लिए अपने स्तर से जिलाधिकारी को लिखें। लेकिन मेला अधिकारी यहां भी लापरवाह रहे। उन्होंने जिलाधिकारी को ऐसा कोई पत्र भी नहीं किया इसके चलते वहां निरंतर अतिक्रमण एवं कब्जा जारी है। इससे अगले साल शहर में होने वाले अर्द्धकुंभ के सफल आयोजन के लिए जमीन की कमी पड़ सकती है।

 

बैरागी अखाड़े के साधु&संतों का इस तरह सरकारी भूमि पर कब्जा करना आस्था पर कुठाराद्घात है। बताया जाता है कि जब कभी स्थानीय प्रशासन इनके अवैध निर्माण के विरुद्ध कार्रवाई का साहस जुटाता है तो साधु&संत अपनी ऊंची पहुंच की धौंस जमाकर उसे धमकाते हैं। आस्था की आड़ में जमीन की लूट को राजनीतिक रंग देने की भी कोशिशें खूब होती हैं। विजय बहुगुणा सरकार के समय बिड़ला ?kkV पर अखाड़ा परिषद के पूर्व महामंत्री हरिगिरी के अबैध कब्जे पर जब हरिद्वार प्रशासन पहुंचा तो यही हुआ था। तत्कालीन जिलाधिकारी सचिन कुर्वे ने उनका चार मंजिला भवन ध्वस्त तो कर दिया] लेकिन मंदिर नहीं हटा पाए। उस वक्त इस पर खूब राजनीति हुई थी।

 

 जूना अखाड़े के संतों पर भी सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जे और निर्माण के आरोप हैं। डामकोठी हरिद्वार से हरकी पौड़ी जाने वाले मार्ग पर सिंचाई विभाग की कई जमीनों को आश्रमों के नाम पर कब्जाया गया है। इनमें सिंचाई विभाग की करोड़ों की भूमि पर निर्माण किये जाने का प्रयास चल रहा है। बताया जाता है कि उक्त भूमि पर पंचायती अखाड़े से जुड़े महामण्डलेश्वर की ओर से भव्य अपार्टमेंट का निर्माण किया है। यह भूमि भी सिंचाई विभाग की है। इसी तरह जूना भैरव अखाड़े के संतों ने भी गंगा तट पर मंदिर और आश्रम का निर्माण किया हुआ है। 

 

ऋषिकेश में भी सरकारी भूमि पर रातों&रात कब्जा करने के कई मामले हैं। सरकारी भूमि को फर्जी रजिस्ट्री के जरिए अपने नाम कर उस पर कई भव्य आश्रमों का निर्माण किया जा रहा है। शीशम झाड़ी नाम से प्रसिद्ध सरकारी भूमि पर आश्रम निर्माण किया गया है। यह गंगा से लगा हुआ क्षेत्र है। यहां वेद विज्ञान पीठ ट्रस्ट ने बहुमंजिले आश्रम का निर्माण कराया है। बताया जाता है कि इस भूमि को देहरादून के अग्रवाल परिवार से खरीदा गया और अग्रवाल परिवार ने यह किसी ब्रह्मानंद नामक व्यक्ति से खरीदी। जबकि जिलाधिकारी और उपजिलाधिकारी की जांच में इस भूमि को सरकारी पाया गया है। इस भूमि की रजिस्ट्री भी हो चुकी है। नगर पंचायत मुनि की रेती और गंगा प्रदूषण इकाई की ओर से इस आश्रम के निर्माण को लेकर अनापत्ति प्रमाण पत्र दिए गये हैं जो कि नियम के तहत कभी नहीं दिए जा सकते थे। इस आश्रम का हरिद्वार विकास प्राधिकरण ने बकायदा नक्शा पास किया है। जबकि यह गंगा नदी से २०० मीटर दूर होने के नियम पर खरा नहीं उतरता है। 


बात अपनी&अपनी

मेरे आने के बाद इस तरह की कोई शिकायत नहीं आई है। यदि आती है तो इस पर जरूर कार्रवाई होगी। अर्द्धकुंभ मेले को सफल बनाने के लिए मेला अधिकारी और पूरा प्रशासन लगा हुआ है। यहां आने वाले श्रद्धालुओं को समुचित व्यवस्था देंगे।

एसके सेमवाल] जिलाधिकारी हरिद्वार


अर्द्धकुंभ की तैयारियां हो रही हैं। मेला भूमि पर हुए अतिक्रमण को अर्द्धकुंभ से पूर्व हटा दिया जाएगा। बैरागी कैंप में अतिक्रमण का मामला कोर्ट में चल रहा है। उस पर जिलाधिकारी को ही निर्णय लेना है। हमारा काम मेले की तैयारी करना और उसका सफल आयोजन कराना है।

बीडी शर्मा] विशेष मेला कार्याधिकारी


हरिद्वार में जिस प्रकार से सरकारी भूमि पर अतिक्रमण और कब्जा कर पक्का निर्माण किया जा रहा है] उससे कुछ वर्षों बाद यहां खाली जमीन नहीं बचेगी। नतीजा यह होगा कि कुछ वर्षों बाद सरकार हरिद्वार में कुंभ कराने से हाथ खड़ा कर लेगी। जो साधु&संत कुंभ भूमि पर अवैध कब्जा कर रहे हैं] उन्हें कुंभ] गंगा से कोई लेना&देना नहीं है।

स्वामी शिवानंद महाराज] संस्थापक मातृसदन

 

आप कुछ भी छापने के लिए स्वतंत्र हैं। इसलिए आपको जो लिखना हैं] लिखिए। मैं आपको नहीं जानता तो अपनी राय आपको क्यों दूं? इस प्रकार की बातें फोन पर नहीं बल्कि आमने&सामने बैठकर होती हैं।

महंत हरिगिरी] महामंत्री अखाड़ा परिषद


जब कुंभ भूमि पर अवैध कब्जा होने की जानकारी मिली तो हमने प्रशासन को पत्र लिखा। कई बार बैरागी कैंप स्थित भूमि पर अतिक्रमण की शिकायत की। लेकिन प्रशासन कार्रवाई नहीं कर सका। अखाड़ों के साधु&संतों का इस तरह अवैध कब्जा करना शर्मनाक है।

जेपी बडोनी] समाजिक कार्यकर्ता हरिद्वार

 
         
 
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