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आवरण कथा
 
कुंभ बनेगा अखाड़ा

हमारी धर्म सत्ताओं का स्त्री को लेकर हमेशा से ही एक अलग रवैया रहा है। बुद्ध भी अपने धर्म में स्त्री को लाने के पक्ष में नहीं थे। मस्जिदों और कई मंदिरों में स्त्रियों के प्रवेश पर रोक है। पिछले दिनों जूना अखाड़े में राधे मां को महामंडलेश्वर की पदवी देने पर काफी बवाल मचा। इस प्रकरण पर जूना अखाड़ा दो फाड़ हो गया है। इलाहाबाद में लग रहे कुंभ में यह विवाद नया मोड़ ले सकता है

 

सुखविंदर कौर उर्फ राधे मां और हरिद्वार स्थित पंच दशनाम जूना अखाड़ा एक बार फिर चर्चाओं में हैं। चार माह पूर्व राधे मां उस समय चर्चा में आईं थी जब जूना अखाड़े के मठाधीशों ने उन्हें गुपचुप तरीके से रातोंरात महामंडलेश्वर की उपाधि से अलंकूत कर दिया था। आनन-फानन में ही महामंडलेश्वर की उपाधि ले राधे मां रात ही में हरिद्वार से निकल गई। इसके बाद इस पर साधु-संतों ने यह कहकर विवाद खड़ा कर दिया कि वह इस पद के लायक नहीं हैं। इस पर अखाड़े ने राधे मां को महामंडलेश्वर पद से निलंबित ही नहीं किया बल्कि इस पर जांच भी बिठा दी गई। जांच की समय सीमा बीत जाने के बाद आज भी इसका कोई निष्कर्ष नहीं निकला। इसी ऊहापोह के बीच जूना अखाड़े में एक बार फिर राधे मां को लेकर तनातनी शुरू हो गई है। 

अखाड़े में समर्थन और विरोध के दो गुट बन गए हैं। एक गुट जो राधे मां का समर्थन कर रहा है वह चाहता है कि आगामी १६ दिसंबर को इलाहाबाद कुंभ  में वह शानोशौकत के साथ पेशवाई में शामिल हो। जबकि दूसरा गुट इसके विरोध में है। जूना अखाड़े के लिए गले की फांस बन चुकी राधे  मां  की कुंभ में शिरकत को लेकर जोर आजमाइश चल रही है। अखाड़े के साधु संतों में इस मामले को लेकर विवाद बढ़ता ही जा रहा है।  जिसकी गंभीरता को देखते हुए अखाड़े के प्रशासक बीच का रास्ता तलाशने में लगे हैं। गौरतलब है कि हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए इन अखाड़ों की नींव रखी गई थी। लेकिन साधु-संतों की आपसी राजनीति का शिकार हुए अखाड़े अब 'कुश्ती' के मैदान बनकर उभर रहे हैं। पूर्व में कुछ अखाड़ों का निर्माण आदि गुरु शंकराचार्य ने नागा संन्यासियों की धार्मिक सेना के रूप में किया था। लेकिन इन अखाड़ों के निर्माण के साथ महाकुंभ के दौरान इनके बीच हुए खूनी संद्घर्ष का भी इतिहास है। अखाड़ों के बीच संद्घर्षों के कारण कई महाकुंभों का इतिहास रक्तरंजित रहा है। अधिकांशतः कुंभ स्नान के दौरान दिखने वाले अखाड़ों के संन्यासी हमेशा आपस में भिड़ते रहे हैं। १९९८ का हरिद्वार का कुंभ हो या पिछला उज्जैन कुंभ, अखाड़ों की आपसी भिडंत की पटकथा लिखी जाती रही है। आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं कि आगामी दिनों से इलाहाबाद के प्रयाग कुंभ में भी राधे मां की ताजपोशी को लेकर साधु-संतों में भिडंत हो सकती है।

राधे मां की महामंडलेश्वर की उपाधि पर उपजे विवाद का कारण उनका इस पद के लायक न होना है। नियम के तहत महामंडलेश्वर उसी को बनाया जा सकता है जो संन्यासी हो। लेकिन इस मामले में राधे मां पर उंगलियां उठ रही हैं। बताया जा रहा है कि वह इस शर्त को पूरा नहीं करती। राधे मां पर आरोप है कि संन्यासी जीवन में आने के बाद भी उनका अपने परिवार के सदस्यों और पति के साथ लगातार संपर्क बना हुआ है। किसी भी संत को महामंडलेश्वर की उपाधि देने से पूर्व उससे हलफनामा लिया जाता है। जिसमें वह अपने जीवन से जुड़ी सभी बातों को बताते हैं। इस हलफनामे में उसे यह भी स्पष्ट करना होता है कि क्या महामंडलेश्वर  पद धारण करने वाला संत सनातन परंपरा का अनुसरण कर रहा है या नहीं। इसके बाद उसे वेद पाठ का ज्ञान दिया जाता है। लेकिन राधे मां के मामले में जूना अखाड़े ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि राधे मां ने कब संन्यास धारण किया। इतना ही नहीं बल्कि राधे मां ने जूना अखाड़े  को हलफनामा दिया  है या नहीं यह भी स्पष्ट नहीं किया गया है। नियम है कि जब भी कोई महामंडलेश्वर की उपाधि से अलंकूत किया जाता है तो उसके हलफनामों को प्रमाणित किया जाता है। लेकिन यहां ऐसा नहीं है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि सिर्फ उन लोगों को ही महामंडलेश्वर बनाया जाता है जिनको जप, तप और अध्यात्म का गहरा ज्ञान हो। लेकिन अब तक जो बातें सामने आ रही हैं उसके अनुसार राधे मां न तो संन्यासी हैं जो इस पद हेतु जरूरी शर्त है और न ही वह शास्त्रों की विशेषज्ञ हैं। हाइप्रोफाइल राधे मां को रात में महामंडलेश्वर बनाने को लेकर भी जूना अखाड़ा सवालों के द्घेरे में है। अखाड़े में शिष्य बनने की विधि कठिन है। संन्यास धारण करने के इच्छुक लोगों को कई प्रकार की कठिन जांच से गुजरना पड़ता है। जिसके बाद शिष्य बनाया जाता है। गुरु अपने शिष्य को अवधूत कहते हैं। शिष्य बनने के बाद गुरु से शिक्षा- दीक्षा लेना पड़ती है। संस्कार प्राप्त होने के बाद शिष्य पदोन्नति पाकर महंत बनता है। महंत के बाद श्री महंत और फिर मंडलेश्वर। मंडलेश्वर बनने के बाद महामंडलेश्वर और सबसे ऊंची पदवी आचार्य महामंडलेश्वर की होती है। इस अखाड़े में महामंडलेश्वर एक से ज्यादा हैं, लेकिन आचार्य महामंडलेश्वर एक ही है। किसी भी साधु-संत को महामंडलेश्वर बनाने से पहले न केवल शुभ मुहूर्त निकाला जाता है बल्कि कुंभ में ही महामंडलेश्वर बनाए जाने की द्घोषणा की जाती है। लेकिन राधे मां के मामले में शुभ मुहूर्त तो देखना दूर रात्रि में ही उन्हें इस उपाधि से नवाजा गया। जूना अखाड़े के मठाधीशों को इस मामले में इतनी जल्दी थी कि उन्होंने इलाहाबाद  में आयोजित होने वाले कुंभ का भी इंतजार नहीं किया। जबकि अगस्त माह में जिस समय राधे मां को महामंडलेश्वर बनाया गया उस दौरान से इलाहाबाद कुंभ के बीच महज चार माह का समय था। जूना अखाड़े पर सवाल उठ रहे हैं कि राधे मां की पूरी तहकीकात किए बिना ही आनन-फानन में उन्हें हरिद्वार के एक आलीशान होटल में ही अर्द्धरात्रि के समय महामंडलेश्वर क्यों बनाया गया? अखाड़े को इतनी जल्दी क्या थी कि वह चार माह का इंतजार भी न कर सका। इतना ही नहीं बल्कि राधे मां के उपाधि कार्यक्रम को इतने गोपनीय तरीके से क्यों किया गया कि देवनगरी में उसकी किसी को कानों-कान खबर भी नहीं हुई? राधे मां को महामंडलेश्वर बनाये जाने का पता भी तब चला जब वह इस पदवी से सुशोभित होकर मुंबई  पहुंच चुकी थी।

राधे मां उर्फ सुखबिंदर कौर का जन्म तीन मार्च १९६९ को पंजाब के गुरुदासपुर जिले के एक सिख परिवार में हुआ। सुखबिंदर के पिता सरदार अजीत सिंह पंजाब इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड में इंजीनियर थे। १८ साल की उम्र में सुखबिंदर का ब्याह मोहन सिंह से हुआ। ४३ साल की राधे मां को बचपन में द्घर वाले गुड़िया नाम से पुकारते हैंे। शादी के बाद एक दिन इनकी मुलाकात शिव मंदिर के पास महंत रामदीनदास से हुई। उन्होंने इनकी धार्मिक प्रतिभा को पहचाना। महंत रामदीन के प्रभाव में आने के बाद राधे मां की ख्याति बढ़ी। कथित रूप से वह लोगों की व्यक्तिगत, व्यापारिक और पारिवारिक समस्याओं को दूर करने लगीं। आज राधे मां का जलवा देश-विदेश में फैला है। मुंबई में उनके लिए बड़े-बड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। लेकिन राधे मां अपने कार्यक्रमों में भी कुछ नहीं बोलती।

जिस अखाड़े ने राधे मां को महामंडलेश्वर बनाया वह सभी तेरह अखाड़ों में सबसे बड़ा माना जाता है। इसमें संन्यासियों की संख्या अन्य अखाड़ों की अपेक्षा ज्यादा है। अखाड़े के कई महंतों का कहना है कि इस अखाड़े के नागा संन्यासी धार्मिक कर्मकाण्डों में सबसे अव्वल रहते हैं। इस अखाड़े की गतिविधियों का संचलन दो अलग-अलग कार्यकारिणी करती हैं। एक को कार्यपालिका और दूसरी को न्यायपालिका कहा जाता है। कार्यपालिका की कार्यकारीणी में ५२ सदस्य होते हैं। वे सभी सदस्य अखाड़े के चारों मढ़ियों से चुनकर आते हैं। प्रत्येक मढ़ी से १३ सदस्य चुने जाते है। इस अखाड़े की आचार्य गद्दी हरिहर आश्रम हरिद्वार में है। इसके आचार्य महामंडलेश्वर अवधेशानंद गिरी हैं और ये हरिहर आश्रम में ही निवास करते हैं। आचार्य महामंडलेश्वर के अलावा ४६ अन्य महामंडलेश्वर हैं जिनमें पायलट बाबा, अर्जुन पुरी, डालसी मानस मंदिर के संस्थापक स्वामी यतीन्द्रानंद गिरी, स्वामी दिव्यानंद, गीता कुटीर के स्वामी अवधेशानंद और मैत्रेयी गिरी प्रमुख हैं।

 

जांच पर आंच

राधे मां पर लगे आरोपों की जांच के लिए गठित साधु-संतों की टीम ही सवालों के द्घेरे में है। सवाल उठ रहे हैं कि यदि अभी तक जांच पूरी नहीं हो सकती है तो फिर जांच की समयावधि क्यों नहीं बढ़ाई गई? सवाल यह भी है कि जब ५ नवंबर को ही जांच की समयावधि खत्म हो चुकी है तो उसके एक माह बाद तक भी अखाड़ा प्रशासन इस मामले पर चुप्पी क्यों साधे हुए हैं? आरोप है कि अखाड़े की ओर से जांच कमेटी के प्रभारी बनाए गए पटियाला निवासी महामंडलेश्वर पंचानंद गिरी ने राधे मां को जूना अखाड़े में महामंडलेश्वर की पदवी दिलवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसलिए उन्हें जांच कमेटी का प्रभारी बनाए जाने पर सवाल उठाते हुए कहा जा रहा है कि उनके नेतृत्व में जांच का कोई औचित्य नहीं। भूमा पीठाधीश्वर स्वामी अच्युतानंद पहले ही अखाड़े के स्तर से की जा रही जांच पर सवाल उठा चुके हैं। उनकी मांग है कि जांच जूना अखाड़े से इतर अन्य अखाड़ों के संतों से कराई जानी चाहिए। यह भी बताना जरूरी है कि हरिद्वार में २०१० में हुए कुंभ में फर्जी शंकराचार्य को लेकर हुए विवाद में पंचानंद गिरी पहली बार चर्चा में आए थे। चंडीगढ़ के बंगाली बाबा के शिष्य पंचानंद गिरी उर्फ संजीव हरि मूल रूप से पटियाला के निवासी हैं। पंजाब की धार्मिक सियासत में उनका गहरा दखल माना जाता है। कुंभ में फर्जी शंकराचार्यों के विवाद में उनकी भूमिका बताई गई थी। इसके बाद वे अखाड़ा परिषद के आंखों की किरकिरी बन गए थे। 

अखाड़े को सुरक्षित रखना हमारी प्राथमिकता

राधे मां को महामंडलेश्वर की पदवी देकर विवादों में आया पंचदशनाम जूना अखाड़ा इस मामले को लेकर दो फाड़ हो गया है। अखाड़े का एक वर्ग राधे मां के महामंडलेश्वर बनाने का समर्थन कर रहा है तो एक दूसरा वर्ग इसके विरोध में उतर गाया है। दि संडे पोस्ट की पंचदशनाम जूना अखाड़े के राष्ट्रीय महामंत्री स्वामी हरिगिरी महाराज से इस मुद्दे पर हुई बातचीत 

राधे मां को महामंडलेश्वर की उपाधि से जूना अखाड़े में दो गुट बन गए हैं। यहां कभी भी संतों के बीच स्थिति विस्फोटक हो सकती है?

इस मामले को लेकर हम बीच का रास्ता खोज रहे हैं। हमारी सबसे पहली प्राथमिकता अपने अखाड़े को सुरक्षित रखना है। दोनों पक्षों में सामंजस्य बिठाया जा रहा है।

पहली जांच रिपोर्ट में सिद्ध हो चुका है कि राधे मां संन्यासी नहीं बल्कि गृहस्थ महिला हैं। ऐसे में उन्हें महामंडलेश्वर बनाया जाना उचित है?

इस मामले में ज्यादातर लोग मानते हैं कि राधे मां की योग्यता ठीक नहीं है। इसके पक्ष में ज्यादातर पुलिस और नेता थे।

राधे मां के मामले में जांच पूरी भी नहीं हुई और समय सीमा समाप्त होने के बाद भी समयावआिँा क्यों नहीं बढ़ाई जा रही है?

इस पर अखाड़े में विचार चल रहा है। जल्द ही कोई निर्णय लिया जायेगा।

आपके अखाड़े पर आरोप है कि आपने दो करोड़ रुपये लेकर राधे मां को महामंडलेश्वर बनाया?

यह मीडिया ने अफवाह उड़ाई है। इसमें दम नहीं है। इसे कोई सही सिद्ध करके दिखाए तो हम मान जाएंगे।

फिर आपने राधे मां को महामंडलेश्वर की उपाधि से निलंबित क्यों किया?

सिर्फ मीडिया के कहने पर। हमने उसका सम्मान रखा और  राधे मां का निलंबन किया।

पिछले दिनों आपको अखाड़े के महामंत्री पद से क्यों हटाया गया था?

मुझे इसलिए हटाया गया था कि मैं भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी से हरिद्वार में चिन्यमानंद को टिकट दिलाने की पैरवी करने गया था। एक संत को राजनीतिक हस्तक्षेप करने के चलते पद से हटाया गया था।

 
         
 
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