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आवरण कथा
 
रुद्रपुर की रौरव कथा

केंद्र में भाजपा का शासन है। ^?kj वापसी^ और ^लव जेहाद^ जैसे मुद्दे गर्म हैं। कई संतों&साध्वियों की सनसनीखेज बातें एक खास वर्ग को गर्व से भर रही हैं तो एक समुदाय में पहले से व्याप्त भय को और विस्तार दे रही हैं। दंगों का मौसम लौटने की आशंका उस समुदाय का स्थायी भय बन गया है। ऐसे माहौल में ^दि संडे पोस्ट^ ने तीन साल पहले उत्तराखण्ड के रुद्रपुर में हुए दंगों की दहशत को जानने&समझने की कोशिश की। इस मकसद से चार सदस्यीय फैक्ट फाइंडिंग टीम ने वहां के दंगा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया। दंगों में मारे गए लोगों के परिजनों के सूरत&ए&हाल को नम आंखों से देखा। उस माहौल को गंभीरता से महसूसा जिसमें अब भी दहशत है। सियासत वोट के वास्ते फिर से दंगा&दंगा खेल सकती है। यह आप रुद्रपुर की इस रौरव कथा से जान सकते हैं

 

फैक्ट फाइंडिंग टीम

आकाश नागर % ^दि संडे पोस्ट^ के रोविंग एसोसिएट एडिटर। खोजी पत्रकारिता में दक्षता। पिछले १८ सालों से दिल्ली एनसीआर एवं उत्तराखण्ड में पत्रकारिता कर रहे हैं। ^उत्तराखण्ड गौरव^ सहित अन्य सम्मानों से सम्मानित।

सोनिया चावला % अधिवक्ता हाईकोर्ट नैनीताल। तराई में महिला मामलों की कानूनी विशेषज्ञ। महिला समाज कल्याण संस्थान की लीगल एडवाइजर। ^उत्कृष्ट महिला प्रतिभा^ सम्मान से सम्मानित।

प्रहलाद सिंह कार्की % केंद्रीय विद्यालय रानीखेत से शिक्षा। विधि स्नातक। तराई में तकनीकी शिक्षक के रूप में प्रतिष्ठित। अध्यक्ष तराई कंप्यूटर एजुकेशन साक्षरता मिशन। संपादक& ^लोक निर्माण^।

रूपेश कुमार सिंह % ^दि संडे पोस्ट^ से पत्रकारिता की शुरुआत। वर्ष २००६ में उमेश डोभाल पत्रकारिता पुरस्कार से सम्मानित। थिएटर ग्रुप शैलनट के सचिव। मासिक पत्रिका ^प्रेरणा अंशु^ के उप संपादक और ^इंडिया टुडे^ के कुमाऊं संवाददाता हैं।

 

रुद्रपुर की सरहद में कदम रखते ही सहसा भारत&पाकिस्तान विभाजन का इतिहास याद आया। देश में अब तक हुए दंगे और उनमें मारे गए इंसान एवं लहूलुहान इंसानियत याद आई। भागलपुर से लेकर हाशिमपुर&मुजफ्फरनगर तक। ऐसा इसलिए भी था कि हम इस क्षेत्र में तीन साल पहले हुए दंगों के जख्म को देखने&समझने के मकसद से जा रहे हैं। तारीख २५ नवंबर यानी ६ दिसंबर की ऐतिहासिक तारीख से एक पखवाड़ा पहले। रुद्रपुर की फिजाओं में अब भी तीन साल पहले हलाल कर दी गई इंसानियत की खामोश चीखें थीं। हवाओं में दंगों का दर्द ?kqyk हुआ था। पीड़ितों की आंखों में तैरती आंसुओं की नमी में तीन साल पहले के हौलनाक मंजर को महसूस किया जा सकता है।

 

तीन साल पहले गांधी जयंती यानी दो अक्टूबर २०११ की सुबह देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के समाधि स्थल jkt?kkV पर फूल समर्पित कर आए थे। देश भर में अहिंसा के इस दूत की स्मृति में शांति पाठ हो रहा था। ठीक उसी वक्त दिल्ली से दो सौ किलोमीटर दूर रुद्रपुर शहर में दंगे की पटकथा लिखी जा रही थी।

 

फिलहाल हम रामपुर के मजदूरों की जुम्मा कॉलोनी की तंग गली में हैं। इस गली में एक /kqVनदार कमरा जिसे मकान तो नहीं ही कहा जा सकता। कमरे की बदहाली उसमें बसर करने वालों की दर्दनाक दास्तान बयां कर रही है। हमारे सामने आयशा है। अपनों के असमय चले जाने का दर्द उसकी आंखों से छलक रहा है। इसके शौहर जकी को रुद्रपुर के दंगे में मार दिया गया। जकी रुद्रपुर में कबाड़े की दुकान पर मजदूरी करके परिवार के लिए रोटी का जुगाड़ कर रहा था। उसकी असमय मौत बल्कि हत्या कहना ज्यादा मुनासिब होगा] उसके बाद छह बच्चों को पालने की जिम्मेदारी आयशा के नाजुक कंधों पर आ गई। उसे टीबी हो गया है। जकी की मां बेटे का गम बर्दाश्त नहीं कर सकी। बेटे के साल भर बाद ही वह उसी जहान में चली गई जहां उसका बेटा था। आयशा एक बीड़ी कारखाने में काम कर ?kj चला रही है। दंगे के बाबत हमारे सवाल पर वह देर तक सिसकती है। सिसकियों पर काबू पाने के बाद उसकी आंखों में तीन साल पुराना मंजर एक बार फिर सामने आ जाता है] ^मेरे शौहर की हत्या गांधी कॉलोनी सिब्बल सिनेमा के पास की गई।^ इतना कहकर वह फफक पड़ती है। कंठ& अवरुद्ध शब्द दर्द में ?kqy गए। पुलिस ने इस मामले में जिस व्यक्ति को आरोपी बनाया है वह इरशाद अहमद है। इरशाद रुद्रपुर शहर के बाहरी क्षेत्र में नैनीताल&रामपुर रोड पर ट्रकों के लिए बहेती बनाने का काम करता है। इस काम में उनका पैर से विकलांग पुत्र हाथ बटाता है। इरशाद के अनुसार उस दिन वह कहीं नहीं गए थे अपने ?kj में थे। शाम को जब पांच बजे अखबार आया तो उसमें अपने आपको आरोपियों की लिस्ट में पाया। पूरा परिवार असमंजस की स्थिति में आ गया कि ?kj में होने के बावजूद भी उनका नाम जकी की हत्या में कैसे शामिल कर दिया गया।

 

आगे की बात इस हत्याकांड के चश्मदीद गवाह सुहेल अहमद बताते हैं] उस दिन ¼२ अक्टूबर २०११½ को मैं और जकी सिब्बल सिनेमा के पास खडे़ थे। सुबह साढ़े दस बजे का वक्त रहा होगा। जब दंगाइयों में हम पर हमला किया। वे ढाई सौ की तादाद में थे और गुरुद्वारे से निकले थे। स्थानीय निवासी पंकज कारला की दागी गोली मेरे बगल में लगी। जकी पर राजकुमार ठुकराल ने गोली चलाई। गोली लगते ही वह बेहोश होकर गिर पड़ा।

 

सुहेल अहमद वह शख्स है जिसने कोर्ट के माध्यम से २८ अप्रैल २०१२ को अपनी रिपोर्ट दर्ज कराई। इस रिपोर्ट में कुल ११ नाम हैं जिनमें राजकुमार ठुकराल का नाम पहले नंबर पर है। जबकि २ अक्टूबर २०११ को दर्ज हुई पुलिस की पहली रिपोर्ट में ठुकराल का नाम नहीं है। इसके अलावा ५ अक्टूबर २०१३ को सीबीसीआईडी ने भी रिपोर्ट दर्ज की। जिसके आधार पर उनकी गिरफ्तारी के आदेश न्यायालय ने दिए। लेकिन राजनीतिक पहुंच की बदौलत ठुकराल पूरे पांच महीने तक गिरफ्तारी से बचते रहे। २६ फरवरी २०१४ को उन्होंने अंततः जब आत्मसमर्पण किया भी तो मात्र तीन दिन में ही जमानत पर रिहा हो गए।

 

ठुकराल की राजनीतिक ठसक की बातें बाद में] पहले दंगे के जख्म को दिल में लिए पीड़ितों की दास्तान। हम एक गांव के कच्चे झोपड़ीनुमा मकान में हैं। यह उत्तर प्रदेश के विलासपुर टांडा रोड पर करीब छह किलोमीटर दूर है। इस झोपड़ी में शकीना रहती है। इनके शौहर अब्दुल रहमान की भी दंगाइयों ने गोली मार कर हत्या कर दी। पीछे बिलखते सिसकते रह गए चार बच्चे और उनकी जिम्मेदारियों के जाल में उलझी शकीना। अब्दुल रहमान सिडकुल की एक प्राइवेट कंपनी में काम करता था। तब रुदपुर के ही खेड़ा गांव में किराए की एक कोठरी में रहते थे। उस मनहूस दिन को याद कर शकीना बेहाल हो जाती है] ^काश^] उस दिन वह मेरी बात मान जाते। बाहर का माहौल देखकर मैंने नौकरी पर न जाने की जिद की। लेकिन वह नहीं माने और वे गए और मैं उनके पीछे थी। c/kbZiqjk के सात&आठ लोगों ने उनको ?ksj कर गोली मार दी। ^मैं अकेली ही उन्हें ?kk;y अवस्था में लेकर चल दी मगर रास्ते में ही किच्छा रोड पर लालपुर में उनकी मौत हो गई।^ शकीना गरीब विधवा है। लेकिन उसे राज्य सरकार की ओर से जारी विधवा पेंशन भी मयस्सर नहीं। पिछले तीन साल से वह पेंशन के लिए दर&दर की ठोकरें खा रही हैं। पुलिस ने इस मामले में जिस व्यक्ति गुड्डू बेग को आरोपी बनाया है वह सिरगोटिया में रहता है। गुड्डू बेग के अनुसार मुझे दो अक्टूबर २०११ को सुबह छह बजे थाने पर बुलाया गया था। इसके बाद मैं रामपुर में अपनी तारीख पर चला गया था। मेरी सफारी का ड्राइवर सोनू दुबे था। इसके साथ ही मेरे साथ मेरे इंजीनियर मित्र नीरज सिंह भी थे। दोनों इस बात के चश्मदीद गवाह है। जब हम जा रहे थे तब ¼बरेली½ अपनी ससुराल में रुक गए। अक्टूबर की २० तारीख के अखबार में हमें पता चला कि मेरे खिलाफ मामला दर्ज करा लिया गया। हमने लोगों से बात करते हुए इस बात को शिद्दत के साथ महसूस किया कि अल्पसंख्यकों में अब भी दहशत है। वे डरे हुए है। डर उनकी आंखों से सरक कर धमनियों से बह रहे लहू में ?kqy गया है। दंगे के बाद इधर&उधर छिटपुट ढंग से रह रहे मुस्लिम परिवार अपनी महफूजियत के लिए मुस्लिम बस्तियों में आ गए हैं।

 

हमारे सामने c/kbZiqjk है। यही वह जगह है जहां दंगे की बुनियाद पड़ी थी। थोड़ी ही दूर पर इंदिरा चौक। इस चौक पर दंगे के पहले गजब का सौहार्द का माहौल रहता था। इसी चौक पर हिंदू&मस्लिम मिलकर होलिका दहन किया करते थे। खुश रहते थे। गले मिलते थे। अब केवल आग बची है] राख अविश्वास और आक्रोश की।

 

हमें शेर सिंह यादव के परिवार से मिलना है। c/kbZiqjk मोहल्ले की मलिन बस्ती में वह एक कमरे का ठिकाना था। मृतकों में से सबसे कम उम्र का शेर सिंह यादव ही था। शेर सिंह उसी जगह रहता था जहां मंदिर में] फिर एक मुस्लिम व्यक्ति के ?kj के सामने कुरान की फटी आयतें और सुअर का मांस फेंका गया था। यहां हिंदू&मुस्लिम की बस्ती साथ&साथ है। मंदिर&मस्जिद भी करीब है। दिल भी करीब थे कि दंगे ने उनके बीच अचानक दूरियां बढ़ा दीं।

 

मंदिर के पश्चिमी छोर पर रह रही शेर सिंह की मां मीना देवी अपनी औलाद को याद कर आज भी सुबक पड़ती है। मीना देवी के सात बच्चे हैं। पति नहीं हैं। इतने बड़े कुनबे की जिम्मेदारी शेर सिंह पर थी। वह कुनबे में सबसे बड़ा होने के कारण मजदूरी कर परिवार का पेट पालता था। ?kVuk वाले दिन वह काम पर जाने के लिए ?kj से निकला ही था कि दंगे की भेंट चढ़ गया। शेर सिंह की हत्या का आरोप जिन पर लगा वह रुद्रपुर नगर निगम के सभासद हैं। तीन बार से लगातार सभासद बन रहे नूर मोहम्मद की दलील है] ^पुलिस ने रंजिशन मुझे आरोपी बनाया है] क्योंकि मैं तत्कालीन डीआईजी ¼कुमाऊं½ अमित सिन्हा से बात कर पुलिस की लापरवाहियों को लगातार बता रहा था जिससे पुलिस के कुछ लोग नाराज हो गए।^ पार्षद राजेश गंगवार के अनुसार २ अक्टूबर २०११ की सुबह १० बजे शेर सिंह को शिकार बनाया गया। शेर सिंह पर आरोप था कि उसने कुरान शरीफ की आयतें मंदिर और उसके आस&पास रखी थी। गंगवार जोर देकर कहते हैं कि रुद्रपुर दंगे में किच्छा के विधायक राजेश शुक्ला का हाथ है। उन्होंने रामलीला प्रकरण पर हुई अपनी हार का बदला लेने के लिए दंगे की साजिश रची थी। 

 

शहर की आदर्श कॉलोनी बस नाम की ही आदर्श है। इस कॉलोनी में अफजल अहमद रहता था जो कबाड़ का काम करता था। अब उसका परिवार यहां नहीं बल्कि यहां से ५० किलोमीटर दूर पीलीभीत ¼उत्तर प्रदेश½ के टोडरपुर गांव में रहता है। जब हमने उसके बारे में लोगों से पूछा तो जवाब मिलता है कि ^अच्छा आप उस अफजल के बारे में पूछ रहे हैं जो दंगे में मारा गया।^ बहुत अच्छा था बेचारा] उसी की कमाई से ?kj चलता था।^ दंगा जब किसी की पहचान बन जाए तो यह एक भयावह स्थिति gS खुद को सचेत कर हम जहां पहुंचते हैं] वह एक दड़बानुमा मकान नहीं] कोठरी है। अफजल के अब्बा शरीफ अहमद बीमार है। नम आंखो और लरजते होठों से बयान करते हैं] ^जिस दिन से बेटे की मौत हुई है] दिल बहुत ?kcjkrk है। रातों की नींद नहीं आती। सपने में दंगे] दंगों में बेटे की मौत। हम जिंदा होते हुए भी लाश में तब्दील हो गए हैं। अफजल की मां नसीब बानो बहुत बदनसीब है। उसे अपने बेटे के हत्यारों के बारे में कुछ नहीं मालूम। बोलती है] ^हमारे बेटे को किसने मारा यह हमें पता नहीं चला। पुलिस कहती है जांच चल रही है। लेकिन पुलिस हमसे आज तक पूछताछ करने नहीं आयी।^

 

अफजल के मामले में पुलिस ने कुछ हद तक सच बयान किया है क्योंकि उसकी मौत को खेड़ा गांव के सामने स्थित दुधिया पीपल मंदिर के पास दिखाया गया है। दंगे के चश्मदीद गवाह राजीव बग्गा बताते हैं कि जब अफजल को गोली लगी तब वह अकेला नहीं था] उसके साथ जकी और नसीम भी थे। अफजल के साथ ही जकी और नसीम को भी गोली लगी थी। इनमे से नसीम को छोड़कर बाकी दोनों लोगों की मौत हो गई थी। राजीव बग्गा बताते हैं तीनों की मृत्यु का ?kVuk स्थल एक ही था] लेकिन पुलिस ने राजनीतिक रंग देने के लिए जकी की मौत इंदिरा चौक पर दिखाई। जबकि अफजल की मौत का ?kVuk स्थल खेड़ा गांव के सामने ही दिखाया। नसीम उन खुशनसीब लोगों में है जो गोली लगाने के बावजूद बच गया। हालांकि इलाज में लाखों रुपये लग गए। बकौल नसीम] ^मेरी खेड़ा में शाही मंदिर के सामने रजा फर्नीचर के नाम से दुकान है जहां से ?kj जा रहा था। जब मैं दूधिया पीपल मंदिर के पास पहुंचा तो तीन&चार लोगों ने मुझे पीछे से ललकारा और गोली चलाई। गोली चलाने वालों को नहीं देख सका क्योंकि गोली पीछे से मारी गई थी। मुझे इतना ही सुनाई दिया&मारो] साले मुल्ला को।^ नसीम की दुकान दंगे की भेंट चढ़ गई। मुआवजे का सच यह है कि इलाज में दो लाख खर्च होने के बावजूद एक नया पैसा नहीं मिला। सरकार की तरफ से केवल साढ़े बारह हजार रुपये दुकान का मुआवजा मिला है। जबकि दुकान में ढाई लाख का फर्नीचर था जो स्वाहा हो गया।

 

नसीम को गोली मारने का आरोपी रुद्रपुर के पूर्व पार्षद सलीम को बनाया गया। इस बाबत सलीम का कहना है] ^मेरा नाम पहली एफआईआर में नहीं था। दंगे के २०&२५ दिनों बाद तफ्तीश में मेरा नाम डाला गया। तत्कालीन थाना अध्यक्ष आरएस असवाल भाजपा नेताओं की कठपुतली बने हुए थे। भाजपा नेताओं के कहने पर ही मेरा नाम नसीम को गोली मारने वालों की सूची में दर्ज किया गया। अगर समय रहते पुलिस के स्थानीय अधिकारियों को तबादले कर दिए जाते तो शहर में सांप्रदायिक दंगा नहीं भड़कता।^

 

दंगों का दर्द इसके बारे में लिखने या पढ़ने वालों से कहीं अधिक वे महसूस कर सकते जो इन दंगों में अपना बहुत कुछ खो देते हैं। जिनके दिलों पर यह ऐसे जख्म छोड़ जाते हैं जो जीवन भर नहीं भर पाते है। दंगा अक्सर सियासी होता है। सांप्रदायिकता पर पुस्तक और हाशिमपुरा दंगे पर ^पाखी^ पत्रिका में धारावाहिक लिखने वाले वरिष्ठ पुलिस अधिकारी और लेखक विभूति नारायण राय भी कहते हैं कि साम्प्रदायिक दंगे खासकर चुनावों से पहले कराए जाते हैं। इनकी नींव भी राजनीतिक दबाव में रखी जाती है। देखने में आया है कि दंगे जब भी हुए है उनका लाभ उठाने में भाजपा ही आगे रहती है] चाहे दंगा परिस्थितिजन्य रहा हो या सुनियोजित।

 

खास यह कि ये बातें रुदप्रुर दंगे से जुड़ती हैं। दंगों के कुछ ही महीनों बाद उत्तराखण्ड में विधानसभा चुनाव हुए जिसमें दंगा प्रभावित क्षेत्र में भाजपा को अप्रत्याशित कामयाबी मिली। इस क्षेत्र से उसकी सीटें तीन से बढ़कर सात हो गईं। दंगे के प्रमुख आरोपी राजकुमार ठुकराल ने कांग्रेस के दिग्गज नेता तिलकराज बेहड़ को पराजित कर सबको हैरत में डाल दिया। दंगे के दौरान रुद्रपुर में तैनात केंद्र सरकार के एक अधिकारी ने बताया] ^यह मामला राजनीतिक था। कुछ लोगों ने अपनी नेतागिरी चमकाने के लिए इस मामले को तूल दिया था। अगर नेता चाहते तो यह मामला गंभीर रूप धारण नहीं करता।^

 

दंगा पीड़ितों के परिजनों से मिलने के बाद जब हमने स्थानीय लोगों की कही&अनकही बातों को गहराई से समझने की कोशिश की तो पाया कि दहशत के दलदल में धंसे बहुत से लोग हकीकत बयान करने से भी खौफ खा रहे हैं। सच शब्दों में नहीं] उनकी आंखों में तैर रहा है। सहमी आंखों ने] सरगोशियों ने ही संकेत दे दिया कि दंगे के पीछे हिंदू&मुसलमान नहीं] वोट को हासिल करने के वास्ते की गई गंदी सियासत है] प्रशासनिक विफलता है और पुलिस की क्रूरता भरी लापरवाही भी। दंगे के वक्त तत्कालीन एसएसपी गणेश मर्तोलिया भी स्वीकारते हैं कि ^उस समय पुलिस से गलतियां हुई।^ लेकिन सियासत का लिवास पहने राजनेता नहीं स्वीकारेंगे कि दंगे के पीछे उनकी भूमिका थी भी या नहीं। उस समय रुद्रपुर में तैनात रहे एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया] ^इस मामले में राजनीतिक रंग भरने वाले तत्कालीन विधायक तिलक राज बेहड़ हैं जो दंगे से एक दिन पहले ही अल्पसंख्यकों के समूह का नेतृत्व करते थाने गए थे और पुलिस को धमकी दे डाली थी। तब अल्पसंख्यकों ने सोचा कि उनके पीछे क्षेत्र के विधायक तो हैं ही। इसके चलते ही वे अगले दिन पुलिस के खिलाफ उग्र रूप में सामने आ गए।^ मुआवजा एक मरहम भी माना जाता है जो शासन की ओर से मिलता है। लेकिन इस दंगे में जख्म तो मिले मगर मुआवजा का मरहम पीड़ित परिवारों को आज तक मयस्सर नहीं हो सका है। जबकि पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश ने इस मामले में मुआवजा देकर अपना हक हदा किया। यहां तक कि उत्तराखण्ड शासन ने मृतकों के साथ&साथ ?kk;yksa को भी मुआवजे से महरूम रखा। राजनीति संवेदना को कुचलती है] सौहार्द का गला ?kksaV देती है। रुद्रपुर दंगे में यही सब हुआ। सियासत ने इंसानियत और सामाजिक संबंधों की वोट के वास्ते हत्या कर दी।


^दंगों का राजनीतिक लाभ^

विभूति नारायण राय] पूर्व आईपीएस अधिकारी

कई दंगों में देखने को आया है कि पुलिस पर जब प्रदर्शनकारी पथराव करने लगते हैं तो वह अपने बचाव में दूसरे पक्ष को ले लेती है। यहां भी ऐसा ही हुआ होगा। जब मुस्लिम लोग रुद्रपुर के इंदिरा चौक पर इकट्ठा होकर प्रदर्शन कर रहे होंगे तो पुलिस ने उन्हें हटाने के लिए बल प्रयोग करना शुरू किया होगा। इसके चलते ही इकट्ठे हुए लोगों ने पुलिस पर पथराव कर दिया होगा। ऐसे समय पर दंगा रोकने में महारत हासिल किसी पुलिस अधिकारी को नियुक्त किया जाना चाहिए था।

 

पुलिस को इस मामले में बहुत सोच समझकर कदम रखने की जरूरत थी। सबसे पहले तो उसे कुरान की आयतें और मांस फेंकने वाले को गिरफ्तार कर लेना चाहिए था। जिससे संप्रदाय विशेष के लोगों में आक्रोश नहीं पनपता। उनमें आक्रोश का कारण यही था कि पुलिस न सचेत हुई और न सक्रिय हुई। इसी के साथ धार्मिक कर्मकाण्डों से जुड़े हुए लोगों की एक कमेटी पुलिस को बनानी चाहिए थी जो दोनों संप्रदायों के लोगों की होती। वह कमेटी दंगे से पूर्व की स्थितियों पर कंट्रोल करने और अवांछित लोगों पर नजर रखती। लेकिन पुलिस ने ऐसा न करके लापरवाही की।

 

जिस तरह से मुझे बताया जा रहा है कि कुरान की आयतें फाड़कर धार्मिक स्थल में फेंकी गईं और वह भी मंदिर में। एक बार नहीं दो&तीन बार। जब कुरान की आयतें खून में उबाल लाने में असर नहीं कर रही थी तो अंतिम हथियार सुअर के मांस के रूप में इस्तेमाल करना सिद्ध करता है कि पूरा मामला सुनियोजित था। ऐसा काम गरीब तबके का कोई भी व्यक्ति पैसा लेकर कर सकता है। पेट की भूख के आगे ऐसे लोगों को कुछ नहीं दिखता।

 

सांप्रदायिक दंगों में दोनों का हित होता है। जो कोई सुनियोजित दंगा कराने की साजिश करा रहा था] वह हिंदू भी हो सकता है और मुसलमान भी। दंगे से पूर्व फायदे का आकलन नहीं किया जा सकता। यह तो दंगे के दौरान पैदा हुई परिस्थितियां और मौके पर जाकर फायदा उठाने वाले की शातिर सोच पर निर्भर करता है कि वह किस तरफ खड़ा हो जाए। दंगा आरोपी की तरफ या दंगा भुक्तभोगी की तरफ।

 

ऐसे साम्प्रदायिक दंगे खासकर चुनावों से पहले कराए जाते हैं इनकी नींव भी पॉलिटिकल प्रेशर में ही रखी जाती है। संभव है कि दंगा दो सम्प्रदाय विशेष के अंदर होता जैसा कि दंगे की साजिश रखने वालों की योजना थी। योजना के अनुसार दंगे के बाद दो धर्मों के लोगों का ध्रुवीकरण होना तय था। हालांकि मुझे इस मामले में यह जानकारी नहीं है कि दंगे के बाद चुनाव थे या नहीं। अगर चुनाव थे और वह भी विधानसभा के तो निश्चित तौर पर भाजपा जीती होगी। देखने में यह आया है कि दंगे जब भी हुए हैं उसका फायदा उठाने में भाजपा ही आगे रहती है। चाहे दंगा परिस्थितिजन्य रहा हो या सुनियोजित। जबकि यहां तो दंगा प्रायोजित था। सो यह निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि रुद्रपुर का यह दंगा राजनीतिक फायदे के लिए किया गया। मुझे तो पता नहीं लेकिन आप लोग समझ सकते हैं कि राजनीतिक फायदा किसको हुआ।

 

मुझे नहीं लगता कि मुसलमान मुसलमान को मारेगा। अगर किसी की व्यक्तिगत रंजिश हो तो कहा नहीं जा सकता। दंगे की नींव जिस तरह से रखी गई और जो परिस्थितियां बनी या बनाई गईं] ऐसे में नहीं लगता कि एक मुस्लिम दूसरे मुस्लिम को मारेगा। ज्यादा संभावना हैं कि मुस्लिम को हिंदू ने ही मारा होगा।

 

पुलिस तब तक मामले में ढील बरतती है जब तक कोई उच्चाधिकारी उनसे तल्ख बात नहीं करता है] इस मामले में क्योंकि मरने वाले ज्यादातर लोग मजदूर और गरीब तबके के थे जो पुलिस पर जांच कार्य में तेजी लाने के लिए प्रेशर नहीं बना पाए होंगे। अगर कोई मामला हाई प्रोफाइल या मृत रसूखदार व्यक्ति होता तो साढ़े तीन साल क्या एक&दो साल में ही जांच कंपलीट हो गई होती। दंगे में सबकी दिलचस्पी राजनीतिक फायदे में रहती है। अगर उन्हें राजनीतिक फायदा दंगे को दबाने में हो रहा होगा तो दबाएंगे और अगर उजागर करने में होगा तो कराएंगे। उत्तराखण्ड में तो कांग्रेस की सरकार है] जहां तक मुझे लगता है कि कांग्रेस सरकार दंगे के सच को नहीं दबा सकती। सच तो सामने आना ही चाहिए। आखिर उन वजहों का पता लगाया जाना जरूरी है जिनके चलते दंगा हुआ।

¼आकाश नागर से बातचीत पर आधारित½


दंगे से पहले

 

  • पंद्रह सितंबर २०११ को उत्तराखण्ड की सीमा खासकर ऊधमसिंह नगर जिले से लगे हुए पीलीभीत ¼उप्र½ में सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने की कोशिश की गई थी। जिसमें पवित्र गुरु ग्रंथ साहब के पन्नों को जलाया गया था। उत्तराखण्ड पुलिस को उसी दौरान सचेत हो जाना चाहिए था। इसके बाद रुद्रपुर में भी दो बार ऐसी ही ?kटनाएं ?kटीं] लेकिन पुलिस ने मामले को गंभीरता से नहीं लिया।
  • चौदह मार्च २०१० को रुद्रपुर में इसी तरह की ?kटना ?kटी थी जिसमें शहर में सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने की कोशिश के तहत एक थैले में सुअर का मीट रखकर c/kbZiqjk के /kkर्मिक स्थल में फेंका गया था। इसके  चलते वहां खासा विवाद हुआ। दो संप्रदायों के लोग आमने&सामने आ गए थे। लेकिन पुलिस ने कभी भी मामले की जड़ में जाने का प्रयास नहीं किया। २९ सितंबर २०११ और २ अक्टूबर २०११ को भी ऐसी ही दो ?kटनाओं को अंजाम दिया गया। जिनकी रिपोर्ट भी दर्ज कराई गई। 
  • अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों ने प्रशासन को अपनी कमेटी की तरफ से एक पत्र लिखा था जिसमें २ अक्टूबर को बैठक और प्रदर्शन के बारे में सूचित कर दिया गया था। लेकिन बावजूद इसके पुलिस और प्रशासन ने कोई पुख्ता कदम नहीं उठाए।  दोनों समुदायों के लोगों में कोई शांतिवार्ता भी कराना उचित नहीं समझा। 
  • दो अक्टूबर २०११ के प्रदर्शन के लिए अल्पसंख्यक समुदाय ने बाकायदा लाउड स्पीकर से लोगों को इत्तला दी थी और प्रदर्शन में अf/kक से अधिक लोगों के जुटने की अपील की गई थी। इतना ही नहीं] रुद्रपुर के आस&पास के शहरों रामपुर] पीलीभीत] बरेली और मुरादाबाद तक के लोग एक दिन पहले से ही आने लगे थे। हजारों लोगों के प्रदर्शन में शामिल होने की खबर को भी पुलिस और प्रशासन ने हल्के में लिया। 

 


दंगे के दिन

 

  • दो अक्टूबर २०११ को अल्पसंख्यक समुदाय के लोग रुद्रपुर के इंदिरा चौक पर इकट्ठा होना शुरू हुए। तब पुलिस ने उन्हें समझाने की कोशिश करना तो दूर वहां जाना तक उचित नहीं समझा। इसके बाद उन्होंने दिल्ली नैनीताल हाइवे पर जाम लगाना शुरू कर दिया। लेकिन जब रोडवेज की बसों में पथराव होना शुरू हुआ तभी पुलिस वहां पहुंची। पुलिस ने जाते ही वहां लाठीचार्ज शुरू कर दिया। जबकि इससे पहले वार्ता के माध्यम से समाधान निकालने के प्रयास किए जाने चाहिए थे।
  • अल्पसंख्यकों का आक्रोश पहले से ही पुलिस के खिलाफ था। २ अक्टूबर २०११ की सुबह १० बजे तक दंगे का कोई अंदेशा नहीं था और हिंदू&मुस्लिम की लड़ाई तो दूर&दूर तक नहीं थी] लेकिन १० बजे के बाद अचानक पुलिस ने यू&टर्न लिया और c/kbZiqjk के मुस्लिम लोगों के सामने रमपुरा के हिंदुओं को ला खड़ा किया। 
  • पुलिस की रिपोर्ट के अनुसार इंदिरा चौक पर इकट्ठा हुए अल्पसंख्यक लोगों की भीड़ ४००० पार थी। ऐसे में पुलिस ने मामले को हल्के में ही लिया। उपद्रवियों से निपटने के लिए सुरक्षा के जरूरी कदम नहीं उठाए गए और न ही भारी जनसमूह को नियंत्रित करने के लिए विशेष पुलिस बल या दस्ता बुलाया गया।
  • रुद्रपुर में ही दो पीएसी बटालियन ¼४६ और ३१½ थी। लेकिन पुलिस और प्रशासन ने बल को समय रहते नहीं बुलाया। दो कंपनियों को ?kटना ?kटने के बाद बुलाया गया। देर से आने के बावजूद भी पीएसी कुछ नहीं कर सकी। बताया गया कि पीएसी को उच्चाf/kकारियों द्वारा लाठीचार्ज] आंसू गैस और रबड़ की गोलियां आदि चलाने की अनुमति नहीं दी गई।
  • दोपहर बाद स्थिति को नियंत्रण में करने की बिल्कुल भी कोशिश नहीं की गई। जिसके चलते एक पार्टी विशेष के लोगों ने चुन& चुनकर एक धर्म&संप्रदाय के लोगों के प्रतिष्ठानों और भवनों को निशाना बनाया। उन्हें आग के हवाले किया।
  • १२ बजे से लेकर शाम के पांच बजे तक रुद्रपुर बाजार में एक धर्म&संप्रदाय विशेष के नेताओं के नेतृत्व में अल्पसंख्यकों की दुकानों को जमकर लूटा गया। शटरों के ताले तोड़&तोड़कर बिक्री के लिए रखे कीमती समानों को ले जाने के लिए मारामारी मचती रही और पुलिस मूकदर्शक बनी रही।
  • दो अक्टूबर २०११ को सुबह ७ बजे से १२ बजे तक अल्पसंख्यकों और हिंदुओं में लुकाछिपी का खेल चलता रहा। अपने&अपने बाहुल्य क्षेत्रों में गुरिल्ला युद्ध की&सी स्थिति रही। इस दौरान दंगा इंदिरा चौक और नैनीताल दिल्ली हाइवे से शहर में भीतरी क्षेत्र में बढ़ता चला गया। लेकिन पुलिस और प्रशासन दंगा प्रभावित क्षेत्र में जाने के बजाय कोतवाली और कलक्ट्रेट में जम गए। लोग अपनी जान बचाने की गुहार लगाते हुए स्थानीय अधिकारियों को फोन करते रहे] लेकिन उनके फोन स्विच ऑफ आते रहे।

 


दंगे के बाद

 

  • तत्कालीन जिलाधिकारी वीवीआर पुरुषोत्तम एसएसपी गणेश मर्तोलिया का ?kटना के तीन दिनों के अंदर ही स्थानांतरण कर दिया गया] जबकि एएसपी अशोक भट्ट और कोतवाल आरएस असवाल का स्थानांतरण नहीं किया गया। अल्पसंख्यक समुदाय असवाल और भट्ट को ही जिम्मेदार ठहरा रहा था।
  • ज्यादातर मामलों में मुस्लिमों की हत्या में मुस्लिम ही आरोपी बनाए गए और गवाह भी मुस्लिम अधिकारी बने।
  • दो व्यक्ति नसीम अहमद और सुहेल अहमद प्रशासन के इस दावे को झूठा साबित करते हैं कि कोई ?kk;y नहीं हुआ। दोनों को गोलियां लगीं और वे महीनों तक अस्पतालों में इलाज कराते रहे। यहां तक कि उन्हें मुआवजा भी नहीं दिया गया। 
  • प्रशासन के मुआवजा वितरण में भी भेदभाव दिखाई दिया। इकराम मिया की ११ मोटर साइकिलें जला दी गई। जिसके एवज में उसे ४०]००० का मुआवजा दिया गया जबकि दूसरे संप्रदाय के एक व्यक्ति जिसकी केवल ४ मोटर साइकिलें जली उसे मुआवजे के तौर पर एक लाख ८०] ००० रुपये मिले। दंगे में १७६ मुस्लिमों और ३३ हिंदुओं की दुकानों जलीं। दोनों समुदायों के लोगों को महज ३६ लाख रुपये का मुआवजा देकर निपटा दिया गया। जबकि क्षति का आकलन इससे कहीं ज्यादा है। 
  • अल्पसंख्यकों की निष्पक्ष जांच की मंशा को झटका तब लगा जब पुलिस ने एसडीएम वीर सिंह बुf/kयाल पर हुए हमले का आरोपी शब्बीर परवेज को ही बना दिया। जबकि परवेज वह शख्स था जिसने न केवल बुf/kयाल को उपद्रवियों से बचाया बल्कि वह इन्हें दंगे के बीच से निकालकर ले गया। 
  • समाचार पत्र और वीडियो क्लिपिंग की तस्वीरों से साफ हो रहा है कि कुछ नेता ऐसे थे जो खुलेआम दंगाइयों को मुस्लिमों की दुकानें जलाने और उन पर हमले के लिए उकसाते दिख रहे हैं। वीडियो क्लिपिंग में उन्हें दुकानों के ताले तोड़ते हुए] आगजनी करते हुए और दुकानें लूटते हुए देखा जा सकता है। बावजूद इसके ऐसे आरोपियों पर मामले दर्ज नहीं किए गए। 
  • २ अक्टूबर २०११ को बधईपुरा में मंदिर परिसर के पास कुरान शरीफ के फटे पन्ने और सुअर के मांस को सबसे पहले देखने वाला व्यक्ति मुश्ताक अहमद हैं। उसने ही शोर मचाकर लोगों को इस बाबत बताया। लेकिन ?kटना के कुछ माह बाद ही मुश्ताक गायब हो गया है। वह जिस ?kर में रहता है उसको बहेड़ी ¼उप्र½ निवासी रामप्यारी ने खरीद लिया है। बधईपुरा मोहल्ले में किसी को नहीं पता कि मुश्ताक कहां गया? मुश्ताक के गायब होने के पीछे क्या कारण gS\

 


जांच पर आंच

रुद्रपुर में २ अक्टूबर २०११ को जिस दिन सांप्रदायिक दंगा हुआ उसी दिन से भाजपा और कांग्रेस में राजनीति जारी है। इस दंगे में बेकसूर मारे गए चार लोगों के परिवारों की सुध लेना तो दूर उल्टे एक&दूसरे पर दोषारोपण कर ^तुष्टिकरण^ का खेल खेला जा रहा है। 

 

भाजपा और खुद आरोपी विधायक राजकुमार ठुकराल इस मामले में कांग्रेस के एक पूर्व विधायक पर आरोप लगाकर अपना दामन साफ दिखाने की कोशिश में हैं। उनकी इस कोशिश को तराई के एक बड़े कांग्रेसी नेता का पूरा सहयोग मिल रहा है। रुद्रपुर के पूर्व विधायक तिलकराज बेहड़ और इस ने

 
         
 
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जोधपुर। यहां एक गांव में दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है। खबर है कि गांव में सरपंच और उसके आदमियों ने कथिततौर पर एक 20 साल की
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