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स्मृति शेष
 
तेवर वाले शालीन शख्स

राजनितिक जीवन

  •  कॉलेज से छात्र राजनीति की शुरुआत, पढ़ाई खत्म  होते-होते कम्युनिस्ट पार्टी के कार्ड होल्डिंग सदस्य बन गए। 
  • १९५४-६४ दिल्लीे नगर परिषद के उपाध्यक्ष रहे। 
  • १९६४-७६ दो बार राज्यसभा के सदस्य रहे।
  • १९६७-६९ संसदीय मामलों के राज्य मंत्री। 
  • १९६९-७१ सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री। 
  • १९७६-८० रूस में भारत के राजदूत रहे।
  • १९८९-९० केंद्र सरकार में विदेश मंत्री।
  • १९९६ जल संसाधन मंत्रालय संभाला।
  • १९९७ देश के प्रधानमंत्री बने।
  • १९९९ सक्रिय राजनीति से संन्यास लिया।

 

वर्ष १९७५ यानी इमरजेंसी का वह दौर जिसे भारतीय राजनीति का काला अध्याय कहा जाता है। उस दौर की एक महत्वपूर्ण द्घटना, तब इंदिरा गांधी सरकार में इंद्र कुमार गुजराल सूचना प्रसारण मंत्री थे। उसी वक्त यह बात सामने आई थी कि १९७२ के चुनाव में इंदिरा गांधी ने चुनाव जीतने के लिए असंवैधानिक तरीकों का इस्तेमाल किया है। इंदिरा के पुत्र संजय गांधी ने उत्तर प्रदेश से ट्रकों में भरकर अपनी मां के समर्थन में प्रदर्शन करने के लिए दिल्ली में लोगों को एकत्रित किया और गुजराल साहब को दूरदर्शन द्वारा कवरेज करवाने को कहा। गुजराल को यह अनैतिक लगा और उन्होंने इसे मानने से इंकार कर दिया। याद कीजिए इमरजेंसी के उस दौर को जब इंदिरा की कम, संजय गांधी की तूती ज्यादा बोलती थी और उनके हुक्म को न मानने की नाफरमानी एक महाअपराध मान ली जाती थी। एक मुख्यमंत्री के एयरपोर्ट पर देर से पहुंचने पर संजय ने उन्हें थप्पड़ रसीद कर दिया था, ऐसी भी चर्चाएं थीं। लिहाजा गुजराल साहब को हुक्म न मानने के आरोप में मंत्री पद से हटाकर वहां 'यस मैन' विद्याचरण शुक्ल को बैठा दिया गया जो संजय के साथी थे।

          एक दूसरी घटना। गुजराल वर्ष १९८० में बतौर भारत की राजदूत मास्को में थे। तब उन्होंने सोवियत संद्घ द्वारा अफगानिस्तान में हस्तक्षेप का विरोध किया था। उस समय इसे भारतीय विदेश नीति में एक बड़े बदलाव के तौर पर देखा गया। इसके बाद ही भारत के हंगरी और चेकोस्लोवाकिया में राजनीतिक हस्तक्षेप का विरोध किया था।

          ऐसे थे हिन्दी उर्दू पंजाबी भाषा के निपुण और दुनिया के कई भाषाओं के जानकार इंद्र कुमार गुजराल जिनका लंबी बीमारी के बाद पिछले १९ नवंबर २०१२ को गुड़गांव के वेदांता अस्पताल में निधन हो गया। स्वभाव से खिन्न आकर एक खास तेवर रखने वाले गुजराल का प्रधानमंत्री बनना भी एक तत्कालीन राजनीतिक समीकरणों और स्थितियों की उपज थी। कहा जाता है कि देश के १२वें प्रधानमंत्री पर इंद्र कुमार गुजराल शायद नहीं बन पाते अगर ऐन वक्त पर तब राजनीति का केंद्र बिन्दु बने हरकिशन सिंह सुरजीत को मास्को न जाना पड़ता। २० अप्रैल १९९७ को सुरजीत ने नए प्रधानमंत्री के रूप में मुलायम सिंह यादव पर आम सहमति संयुक्त मोर्चा में बना ली थी। लेकिन अगले दिन उनका मास्को जाने से पासे पलट गए और गुजराल नए प्रधानमंत्री चुन लिए गए। प्रधानमंत्री बनने के बाद भी वे विवादों में द्घिरे रहे। उनकी सरकार ने १९९७ में उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन की अनुशंसा की जो विवादों में द्घिर गई। तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन ने सरकार की इस आशय की अनुशंसा पर दस्तख्त करने की बजाय पुनर्विचार के लिए वापस सरकार के पास भेज दिया।

          पाकिस्तान के झेलम शहर में चार दिसंबर १९१९ को जन्मे इंद्र कुमार गुजराल का परिवार भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय था। छोटी सी उम्र में ये भी स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े और १९४२ में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जेल गए। इन्होंने डीएवी कॉलेज, हेली कॉलेज ऑफ कॉमर्स और फोरमैन क्रिश्चियन कॉलेज लाहौर (वर्तमान में पाकिस्तान में) से शिक्षा प्राप्त की। 

          राजनीति में गुजराल अपने कॉलेज के दौर से ही सक्रिय हो गए थे। वह छात्र संद्घ के अध्यक्ष रहे और साथ-साथ कम्युनिस्ट पार्टी से भी जुड़ गए। वह राजनीति में इतने कुशल थे कि पढ़ाई करते-करते कम्युनिस्ट पार्टी के कार्ड होल्डिंग सदस्य बन चुके थे। इसके बाद गुजराल देश की राजनीति में दाखिल हुए। लेकिन वे पूरे देश की नजर में तब आए जब विषम परिस्थितियों में अपने कुशल व्यवहार के दम पर देश के १२वें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। उनका प्रधानमंत्री काल अप्रैल १९९७ से मार्च १९९८ तक था। 

          गुजराल अपने कार्यकाल के दौरान विदेश नीति में लाए गए परिवर्तनों के लिए भी जाने जाएंगे। विदेश नीति में लाए गए परिवर्तनों को अब 'गुजराल सिद्धांत' के नाम से जाना जाता है। इस सिद्धांत में पांच बिन्दु थे जो 'सार्क' देशों के आपसी सहयोग को मजबूत बनाने को लेकर थे। 

          प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने से पहले उन्होंने राजनीति को बहुत जांचा और परखा था। एक लंबे राजनीतिक जीवन की शुरुआत कॉलेज के दौर में ही हो गई थी। मुख्यधारा की राजनीति में इनका पर्दापण १९५९ से माना जा सकता है। १९५९ से ६४ तक वह दिल्ली नगर परिषद के उपाध्यक्ष रहे। इसके बाद वह १९६४ से १९७६ तक दो बार राज्यसभा के सदस्य बनाए गए। इसी बीच (१९६७-६९) उन्होंने संसदीय मामलों के राज्य मंत्री का पदभार भी संभाला। इसके बाद वह सूचना एवं प्रसारण मंत्री बनाए गए। वर्ष १९७६ में इंदिरा गांधी ने इन्हें रूस में भारत का राजदूत बना कर भेजा। इंदिरा और रूस के बीच तारतम्य बनाना एक चुनौतीपूर्ण कार्य था जिसे गुजराल ने बखूबी निभाया। इसी दौरान इनकी करीबी गांधी परिवार से हुई। केंद्र सरकार में यह पहली बार १९८९-९० में कैबिनेट मंत्री बने। उन्हें विदेश मंत्री बनाया गया। फिर १९९६ में इन्होंने जल संसाधन मंत्रालय संभाला। इतने लंबे राजनीतिक सफर के बाद वह १९९७ में देश के प्रधानमंत्री बने। इसके बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया। 

गुजराल एक राजनीतिज्ञ के साथ साथ एक पत्रकार भी थे। उन्होंने अपनी आत्मकथा 'मैटर्स ऑफ डिस्क्रेशन' लिखी, जो काफी चर्चा में रही। उन्होंने सियासी गलियारों की कई सच्चाइयों का खुलासा किया जिस पर पर्दादारी रही। वे साफगो थे, विनम्र थे, ज्ञानी थे, शालीन थे, यह देश उनको इसी रूप में याद रखेगा।

 

परिचय

जन्म  ४ दिसंबर १९१९ को पाकिस्ताीन के झेलम शहर में।

राजनीति  एक लंबे राजनीतिक सफर के बाद अप्रैल १९९७ में प्रधानमंत्री बने।

शर-ओ  दोस्त बताते हैं कि पढ़ने-लिखने के शौकीन गुजराल शेरों-शायरी का शौक रखते थे। 

परिवार  पत्नी शीला गुजराल का निधन पिछले वर्ष २०११ में हो चुका था। अब दो बेटे नरेश और विशाल गुजराल हैं जो राजनीति में सक्रिय हैं। 

कुछ खास  राजनीति के साथ इन्होंने पत्रकारिता में भी हाथ आजमाया। वे बीबीसी की हिन्दी सेवा में कुछ दिनों तक कार्यरत रहे। इन्होंने अपने जीवन के संद्घर्ष को एक पुस्तक का रूप दिया जिसको 'मैटर्स ऑफ डिस्क्रेशन नाम दिया। 

 

 
         
 
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