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vad 2 02-07-2017
 
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जनपदों से 
 
फिर अनशन पर जायेंगे शिवानंद!

गंगा में खनन को लेकर एक बार फिर बड़े आंदोलन की आहट सुनाई दे रही है। मातृसदन के प्रमुख स्वामी शिवानंद बेहद खफा हैं कि निगमानंद की मौत पर द्घड़ियाली आंसू बहाने वाली कांग्रेस प्रदेश में अपनी सरकार बनते ही खनन माफिया के सामने झुक गई है। लिहाजा शिवानंद फिर से अनशन करने की तैयारी में हैं

 

हरिद्वार। धर्मनगरी हरिद्वार में खनन और गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए मातृसदन वर्षों से लड़ाई लड़ रही है। धरना प्रदर्शन, अनशन और कोर्ट की लड़ाई के बीच शासन कुछ समय के लिए गंगा में खनन पर रोक लगाता है। इनका विरोध खत्म होते ही खनन माफियाओं के दबाव में खनन फिर से खोल दिया जाता है। यह सभी सरकारों में एकसमान हुआ है। वर्षों की इस लड़ाई में मातृसदन ने अपने दो संतों को खोया है। पिछले साल गंगा में खनन रोकने के लिए स्वामी निगमानंद अनशन पर थे। कई दिनों बाद प्रशासन ने उन्हें उठाकर अस्पताल ले गया, जहां उनकी मौत (मातृ सदन के मुताबिक अस्पताल में उनकी हत्या की गई) हो गई। तब प्रदेश में भाजपा की सरकार थी और निगमानंद को श्रद्धाजंलि देने आए तमाम कांग्रेसी नेताओं ने वादा किया था कि कांग्रेस गंगा में खनन नहीं होने देगी। प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बने आठ-नौ महीना ही हुआ कि बहुगुणा सरकार ने हरिद्वार में खनन खोलने की बात कह दी। इससे मातृसदन के महात्मा क्षुब्ध हैं। एक बार फिर से वे अनशन पर जाने को तैयार हैं।

            हरिद्वार में बिशनपुर और भोगपुर में खनन लॉट खोले जाने के शासन के आदेश पर मातृसदन के महात्माओं ने असंतोष व्यक्त किया है। मातृसदन ने सरकार को अगाह किया है कि इस फैसले को वापस लें, नहीं तो फिर से आंदोलन छेड़ा जायेगा। मातृसदन के संस्थापक एवं अध्यक्ष स्वामी शिवानंद महाराज ने एक सप्ताह में फैसला वापस न लिए जाने पर अनशन का ऐलान कर दिया है। स्वामी शिवानंद ने कहा कि दिसंबर २०११ में सरकार ने खनन के पर्यावरणीय आकलन का प्रभाव जांचने के लिए आदेश दिए थे। अब तक आकलन पूरा नहीं हो पाया है। इससे पहले ही सरकार ने बिशनपुर और भोगपुर में दो खनन लॉट खोलने की अनुमति दे दी है। गंगा में खनन को किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाएगा। इस संबंध में मातृसदन ने तीन दिसंबर को मुख्यमंत्री के नाम एक पत्र लिखा है। स्वामी शिवानंद ने सरकार को निशाने पर लेते हुए कहा कि कांग्रेस पार्टी वादाखिलाफी कर रही है। जिस पार्टी ने हरिद्वार में खनन की अनुमति नहीं देने का वादा किया था। सरकार बनते ही कांगेस नित सरकार ने वादा को भुलाकर खनन की अनुमति दे दी। 

            दरअसल गंगा में  खनन वर्षों से हो रहा है। इसका विरोध भी होता रहा है। उत्तराखण्ड में सिर्फ गंगा ही नहीं बल्कि लगभग सभी नदियों में खनन का खुला खेल चलता है। जिसमें सरकार का हस्तक्षेप कम, खनन माफिया का ज्यादा रहता है। बेशक सरकार खनन की अनुमति देने के पीछे राजस्व बढ़ाने की बात कह रही हो लेकिन प्रदेश सरकार को ५ से १० फीसदी से ज्यादा राजस्व नहीं मिलता। माफिया ९० से ९५ फीसदी पत्थर और बजरी का द्घोटाला करते हैं। खनन माफिया नदियों से चोरी-छिपे बहुतायत में पत्थर एवं उपखनिज का दोहन करते हैं। जिससे पर्यावरण को भारी क्षति पहुंचती है। इसी लिहाज से हरिद्वार स्थित मातृसदन के महात्मा शुरू से ही गंगा को खनन मुक्त करने की लड़ाई लड़ रहे हैं। ताकि गंगा को प्रदूषण मुक्त किया जा सके। मातृसदन के संस्थापक और अध्यक्ष स्वामी शिवानंद महाराज सहित अन्य महात्माओं ने लगातार अनशन किए हैं। इस दबाव में कुछ समय के लिए खनन रोक दिया जाता है लेकिन थोड़े समय बाद ही उसे फिर अनुमति दे दी जाती है।

            पिछले साल मातृसदन के एक संन्यासी निगमानंद सरस्वती खनन के विरोध में अनशन पर थे। एक महिना से भी अधिक दिनों तक अनशन पर वे रहे। प्रशासन ने उनकी तबीयत बिगड़ने के डर से उन्हें जबरन अस्पताल में भर्ती करवाया। वहां भी उन्होंने कुछ भी लेने से साफ मना कर दिया था। फिर अस्पताल में ही संदिग्ध स्थितियों में उनकी मौत हो गई। उनको श्रद्धांजलि देने आए कैबिनेट मंत्री हरीश रावत सहित अन्य कांग्रेसी नेताओं ने गंगा में खनन का विरोध किया था। लेकिन उस समय की भजापा सरकार ने कुछ ही महीनों बाद गंगा के बिशनपुर और भोगपुर खनन लॉट में खनन खोलने का आदेश दे दिया। जिसके बाद शिवानंद महाराज ने अनशन किया। खण्डूड़ी के बागडोर संभालते ही फिर से खनन पर रोक लगाई गई। जिसके बाद उन्होंने अनशन खत्म किया था। ज्ञात हो कि ५ दिसंबर २०११ को सरकार ने एक शासनादेश जारी किया था। जिसमें कहा गया था कि बिशनपुर और भोगपुर में पर्यावरण प्रभाव आंकलन होने तक खनन एवं क्रशिंग कार्य पर रोक लगाई जाए। इस आकलन में मातृसदन का पक्ष भी रखने की बात थी। अभी तक इसके लिए मातृसदन को नहीं सुना गया है । वहीं पर्यावरण प्रभाव आकलन भी नहीं हुआ है। फिर भी खनन की अनुमति देना समझ से परे है।

            पर्यावरण आकलन प्रभाव के अलावा हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट ने भी कई बार हरिद्वार कुंभ क्षेत्र में खनन पर रोक लगा चुकी है। लेकिन प्रदेश में सरकार किसी की भी हो, खनन माफिया का जरूर चलता है। बिना पर्यावरण आकलन का प्रभाव सामने आए खनन की अनुमति देने से साबित है कि सरकार खनन माफिया के दबाव में काम कर रही है। केंद्रीय मंत्री हरीश रावत और मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के सुर अलग-अलग रहते हैं, लेकिन खनन के मामले में वे एक जैसी बात कह रहे हैं। मातृसदन के ब्रह्मचारी दयानंद कहते हैं गंगा में खनन से पर्यावरण को नुकसान पहुंच रहा है। मातृसदन इसे बर्दाश्त नहीं करेगा। खनन बंद कराने के लिए जो बलिदान देना पड़े, वह दिया जाएगा। मातृसदन गंगा रक्षा और पर्यावरण के लिए अपने संकल्प पर अडिग है।

साधु-संतों का आक्रोश इसलिए भी भड़क रहा है कि गंगा को खनन मुक्त रखने की मांग को लेकर अपने प्राणों की बाजी लगाने वाले मातृसदन के संत स्वामी निगमानंद की मौत पर कांग्रेस के नेताओं ने सियासी लाभ उठाने के लिए तब भाजपा को खूब कोसा था। संतों के मुताबिक अब साफ हो चुका है कि तब कांग्रेसी नेताओं ने सिर्फ द्घड़ियाली आंसू बहाए थे। राजनेताओं की नीयत एक सी है। खनन माफिया के सामने सभी राजनीतिक दल बौने हो चुके हैं।

 

 

एक था प्रेम प्रकाश

पिथौरागढ़। एक फोटो जर्नलिस्ट जिसने एक दुर्द्घटना के बाद पत्रकारिता से अलविदा कह दिया था। पिछले दिनों वह जौलजीवी से ४ किमी दूर एक खाई में मृत पाया गया। यह फोटो जर्नलिस्ट  प्रेम प्रकाश जोशी उर्फ पीपी था। प्रेम के परिवार वालों का मानना है कि यह हत्या का मामला है, लेकिन पुलिस इसे दुर्द्घटना बता रही है। पुलिस ने इस बाबत खबर लिखे जाने तक कोई रिपोर्ट भी नहीं लिखी थी। उनका कहना था कि प्रेम प्रकाश नशे में धुत्त था। इस कारण वह गहरी खाईं में गिर गया। लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट से यह साफ हो गया कि पीपी की मौत चोट लगने के कारण हुई है। साथ ही उसके नशे में न होने पर भी इस पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने मुहर लगाई गई है। लेकिन पुलिस ने अभी भी कोई रिपोर्ट नहीं लिखी है। 

इस बाबत जब दि संडे पोस्ट ने जौलजीवी के पुलिस अधिकारियों से बात की तो वह गोल-मोल जवाब देते रहे। थानाध्यक्ष जी एल शाह ने इस मामले की जांच की जिम्मेदारी श्याम कुमार दरोगा को देने की बात कही, लेकिन श्याम कुमार ने ऐसी किसी भी जांच से इंकार किया। उनका कहना था कि जब रिपोर्ट ही नहीं लिखी गई है तो फिर जांच कैसी। 

इस पूर्व पत्रकार की मृत्यु का मामला लगातार उलझता दिखाई दे रहा है। पुलिस इस मामले पर गंभीर होती नहीं दिख रही है। चोरी के लिए हत्या का मामला नहीं दिखता क्योंकि कैश और कार्ड दोनों सुरक्षित मिले। परिवार वाले हत्या बता रहे हैं। पीपी को जानने वाले किसी से उसकी दुश्मनी की बात नहीं मानते। पुलिस इसे नशे के कारण हुआ हादसा बता रही है लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट कुछ दूसरे इशारे कर रही है। ठीक से कार्यवाही न होने के कारण मामला उलझता जा रहा है। 

ज्ञात हो कि पीपी उर्फ प्रेम प्रकाश जोशी आज-तक न्यूज चैनल के वरिष्ठ पत्रकार गोपाल बिष्ट के साथ काम करते थे। ३० सितंबर २००१ को पूर्व केंद्रीय मंत्री माधवराव सिंधिया के साथ हवाई यात्रा में शामिल चार पत्रकारों में से एक गोपाल बिष्ट भी हवाई दुर्द्घटना में सिंधिया और अन्य पत्रकारों के साथ मारे गए थे। इसके बाद चैनल ने जोशी की तरफ से भी मुह मोड़ लिया। इससे दुखी होकर जोशी ने पत्रकारिता से अलविदा कह दिया और बंगलौर में एक प्राइवेट कंपनी में काम करने लगे। इसके बाद वह हर वर्ष जौलजीवी मेले में शिरकत करने यहां आया करते थे। इस बार भी वह उसी उद्देश्य से आए थे। लेकिन रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मौत हो गई।

 
         
 
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आईआईटी-जेईई रिजल्ट आने के बाद राजस्थान के भिलवारा जिले में रहने वाला एक बेहद गरीब जाट परिवार भी खुशियां मना रहा है। क्योंकि उनके बेटे भैरुलाल का आईआईटी-जेईई में सेलेक्शन हो गया है।

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