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आवरण कथा
 
ढाई करोड़ की लूट

आयुर्वेदिक दवाओं का निर्माण करने वाली उत्तराखण्ड सरकार की दो सहकारी संस्थाओं ने इन दवाओं की जबरदस्त मार्केटिंग के दम पर बड़ा टर्नओवर हासिल कर सभी की वाहवाही लूटने का काम किया। इसकी आड़ में इन संस्थाओं के आला अफसरों ने खुद के लिए भी खासा माल बटोरा। 'दि संडे पोस्ट' के पास उपलब्आँा दस्तावेज इस षड्यंत्र का पर्दाफाश करने में सक्षम हैं कि किस प्रकार अकेले राजस्थान सरकार से मिले तकरीबन आठ करोड़ की दवा खरीद के ऑर्डर में ढाई करोड़ की राशि का गबन किया गया। पूरी आशंका है कि इन संस्थाओं को मिले अन्य ऑर्डरों में भी इसी तर्ज पर घोटाला किया गया हो

 

पता भी निकला फर्जी

दि संडे पोस्ट को मिले दस्तावेजों में मैसर्स ड्रग डिपो के बिल भी है। इन बिलों पर जो पता अंकित है वह यूसीएफ प्लाजा काम्पलेक्स, बरेली रोड हल्द्वानी (नैनीताल) का है। यह काम्पलेक्स खुद उत्तराखण्ड सहकारी विपणन संद्घ का है। इसे सहकारी संद्घ के अधिकारी गोदाम भी कहते है। यहां सहकारी संद्घ का बरेली रोड के एक तरफ कार्यालय है जबकि दूसरी तरफ काम्पलेक्स है। इस काम्पलेक्स में रोड के समाने दुकाने बनी हुई है। इसी में बनी दुकानों को ड्रग डिपो ने अपना कार्यालय दर्शाया है। 'दि संडे पोस्ट' ने इस बाबत उत्तराखण्ड सहकारी विपणन संद्घ के अधिकारियों से बात की तो वे चौक गए। उन्होंने अनभिज्ञता प्रकट करते हुए कहा कि काम्पलेक्स परिसर को संद्घ के कर्मचारी हरीश जोशी देखते है। श्री जोशी ने 'दि संडे पोस्ट' को समस्त परिसर का दौरा कराया और बताया कि यहां ड्रग डिपो नाम की कंपनी का कार्यालय कभी नहीं रहा।


 

उत्तराखण्ड सरकार के सहकारिता विभाग की दो संस्थाएं हल्दूचौड़ (नैनीताल स्थित मेडिसीन एंड फॉर्मासूटिकल लिमिटेड तथा को-ऑपरेटिव ड्रग फैक्ट्री, रानीखेत अपनी उत्कूष्ट क्वालिटी की आयुर्वेदिक दवा निर्माण के लिए जानी जाती हैं। रानीखेत की को-ऑपरेटिव ड्रग फैक्ट्री तो पिछले कई दशकों से दवा निर्माण के कार्य में लगी है। यह दोनों संस्थाएं राज्य सरकार के उत्तराखण्ड सहकारी विपणन संद्घ के अधीन कार्य करती हैं। इनकी दवाओं को मुख्य रूप से विभिन्न राज्यों की सरकारें ही खरीदती हैं। निजी संस्थाओं को यहां से दवाओं की आपूर्ति नहीं की जाती है। कोई निजी फर्म केवल इतना भर कर सकती है कि कमीशन एजेंट के रूप में वह दूसरे राज्यों से दवा खरीद का ऑर्डर ला ट्रेड डिस्काउंट कमा ले। उत्तराखण्ड और उत्तर प्रदेश में यह डिस्काउंट (कमीशन) ऑर्डर की कीमत का ३३ प्रतिशत है। इसी ट्रेड डिस्काउंट की आड़ ले इन दो दवा बनाने वाली सहकारी संस्थाओं के आला अफसरों ने एक फर्जी बिचौलिया बना लगभग ढाई करोड़ की लूट को अंजाम दिया है। घोटाले की पटकथा शुरू होती है राजस्थान सरकार के आयुर्वेद विभाग की अति आवश्यक औषधियों की सप्लाई ऑर्डर संख्या सीएसएस २००७-०८/११८५२-५९ से। सवा दो करोड़ के इस ऑर्डर को निदेशालय आयुर्वेद विभाग अजमेर राजस्थान द्वारा सीधे उत्तराखण्ड स्टेट मेडिसीन एंड फार्मासूटिकल लिमिटेड के नाम जारी किया गया। इस परचेज ऑर्डर (जिसकी एक प्रति 'दि संडे पोस्ट' के पास उपलब्ध है) में भी किसी एजेंट के होने की बात नहीं कही गई है। नियमानुसार यदि कोई एजेंट के माध्यम से ऑर्डर दिया गया हो तो उसका नाम परचेज ऑर्डर में होना आवश्यक होता है। इसी प्रकार राजस्थान सरकार के आयुर्वेद निदेशालय ने एक अन्य ऑर्डर सीएसएस/ २००८-०९/१०७२-८२ के जरिए को-ऑपरेटिव ड्रग फैक्ट्री, रानीखेत के नाम लगभग पांच करोड़ चालीस लाख का परचेज ऑर्डर जारी किया। इसमें भी किसी भी कमीशन एजेंट का जिक्र नहीं है। उत्तराखण्ड सरकार की इन दोनों संस्था के आला अधिकारियों ने इतनी बड़ी खरीद में अपनी हिस्सेदारी पाने की नीयत से फर्जी कमीशन एजेंट बना डाला।

            दि संडे पोस्ट के पास मौजूद साक्ष्यों के अनुसार राजस्थान सरकार के आयुर्वेद विभाग निदेशालय अजमेर ने को-ऑपरेटिव ड्रग फैक्ट्री के प्रबंधक को जो ऑर्डर दिया था जिसमें स्पष्ट तौर पर लिखा गया कि सप्लाई की गई औषधियों के बिल तीन प्रतियों में निदेशक निदेशालय आयुर्वेद विभाग राजस्थान अजमेर के नाम बनाए जाएं। इसी के साथ बिल की तीन प्रतियां अजमेर, भरतपुर, जोधपुर के राजकीय आयुर्वेदिक रसायनशाला के संबंधित प्रभारी अधिकारियों को भी देने की बात कही। लेकिन २ फरवरी २००९ को निदेशालय आयुर्वेद विभाग राजस्थान अजमेर को जब बिल भेजे गए तो चौंकाने वाली बात सामने आई। बिल में इस ऑर्डर का टे्रड कमीशन एजेंट मैसर्स ड्रग डिपो (सीडीएफ शौरूम) यूसीएफ प्लाजा काम्प्लेक्स बरेली रोड हल्द्वानी (नैनीताल) को बना दिया गया। जबकि यूसीएफ प्लाजा उत्तराखण्ड सहकारी विपणन संद्घ की संपत्ति है, उसका उपयोग किसी भी निजी कंपनी द्वारा नहीं किया जा सकता। अकेले वर्ष २००९ में राजस्थान सरकार के आयुर्वेद निदेशालय ने ५ करोड़ ४० लाख की दवाइयों की खरीद का आदेश दिया था। इसी वर्ष टे्रड डिस्काउंट और ड्रग डिपो के नाम ८१ लाख, ५१ लाख, ५६ लाख और ५४ लाख की रकम अलग-अलग तिथियों को अदा की गई, यह पेमेंट ऐसी संस्था को अदा की गई। जिसका अपना कोई पता ठिकाना ही नहीं था। इस संवाददाता ने बिल में दिए गए बिचौलिए के पते की जब तहकीकात की तो वहां उत्तराखण्ड को-ऑपरेटिव फेडरेशन का बोर्ड पाया। इस फेडरेशन के कर्मचारी हरीश जोशी ने पूछने पर बताया कि मैसर्स ड्रग डिपो नामक कोई भी कंपनी कभी नहीं रही है। यह सरकारी दफ्तर है। इसमें किसी प्राइवेट कंपनी का कार्यालय हो ही नहीं सकता। इस तरह जो ४५ प्रतिशत धनराशि फैक्ट्री के खाते में जाती, वह पैसा श्रमिकों में बंटते लेकिन वह द्घोटाले बाजी और कमीशन खोरी की भेंट चढ़ गया।  इसी प्रकार हल्दूचौड़ (नैनीताल) स्थित संस्था को मिले सवा दो करोड़ के ऑर्डर में भी इसी मैसर्स ड्रग डिपो कंपनी को ेंेंेंकमीशन एजेंट बना लगभग सत्तर लाख के द्घोटाले को अंजाम तक पहुंचाया गया।

             राज्य सहकारी संघ के विशेष कार्याधिकारी पीसी दुमका ने इस मामले की जांच की है। जिसमें उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा है कि बिचौलिए के साथ एग्रीमेंट तभी हो सकता है जबकि सप्लाई ऑर्डर मैसर्स ड्रग डिपो के नाम आते। लेकिन जब राजस्थान सरकार ने सीधे को-ऑपरेटिव ड्रग फैक्टरी रानीखेत को सप्लाई का आदेश दिया तो इसमें कमीशन की आवश्यकता कहां से पड़ती है। जब ड्रग डिपो के साथ एग्रीमेंट खत्म हो चुका था फिर भी कमीशन कैसे दिया जाता रहा। निस्संदेह संस्था को भारी आर्थिक हानि पहुंचाई गई है।

             उत्तराखण्ड राज्य सहकारी संघ की ऑडिट रिपोर्ट की आपत्ति संख्या ३४ कहती है कि ४५ प्रतिशत का कमीशन मेसर्स ड्रग डिपो को प्रदान किया गया है उसका औचित्य स्पष्ट नहीं है। जबकि उत्पादक (को-ऑपरेटिव ड्रग फैक्ट्री रानीखेत और खरीददार (राजस्थान सरकार के बीच में सीधा एग्रीमेंट था और वर्क ऑर्डर फैक्ट्री के नाम पर आया तो बिचौलिए की भूमिका नगन्य हैं। एक अन्य जांच इस रहस्यमय कंपनी मैसर्स ड्रग डिपो की बाबत भी की गई। इस जांच में कहा गया है कि यूसीएफ प्लाजा में मैसर्स ड्रग डिपो नाम से जो एजेंसी कार्य कर रही है वह किस आधार पर है जबकि यह राज्य सहकारिता संद्घ की संपत्ति है। बाहरी प्राइवेट संस्था यदि इसका प्रयोग कर रही है तो इसकी जांच होनी चाहिए। यह जांच तत्कालीन अपर जिला सहकारिता अधिकारी पीएल शाह एवं लेखाकार निबंधक सहकारी समिति उत्तराखण्ड केसी चतुर्वेदी ने की। २७ जुलाई २०११ को यह जांच रिपोर्ट तैयार करके को ऑपरेटिव सोसाइटी के रजिस्ट्रार को भेज दी गई लेकिन जांच रिपोर्ट को भी रहस्यमय तरीके से दबा दिया गया।

 

बात अपनी-अपनी

ये दोनों कंपनियां सहकारी संद्घ के अंतर्गत आती हैं। अगर इनमें कमीशन के नाम पर कोई द्घोटाला हुआ है तो इसकी जांच कराई जायेगी।

यशपाल आर्य मंत्री सहकारिता विभाग

दवा फैक्ट्री से हमारा कोई तालमेल नहीं है। हमारा काम किसी भी दवा फैक्ट्री को लाइसेंस देने तक ही सिमटा है। दवा कहां जा रही है, इसकी जानकारी हम नहीं रखते।

पूजा भारद्वाज निदेशक आयुर्वेद एवं यूनानी सेवाएं

हमारी सारी पॉलिसी हेड ऑफिस से डिसाइड होती है हमारा इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं होता। मार्केटिंग की पॉलिसी १९९१ से चल रही है। इसी के तहत कमीशन दिया जाता है।

सी.एम. अरोड़ा, महाप्रबंधक सीडीएफ रानीखेत एवं यूएसएमएफएल हल्दूचौड़

इस मामले का मुझे पता नहीं है। हम इस मामले को दिखवाते है। 

सुवर्धन सचिव सहकारिता विभाग

एक-डेढ़ साल पहले हमने हल्दुचौड़ स्थित दवाई फैक्ट्री में छापा मारा था जिसमें कई अनियमितताएं सामने आई थीं। हमने तत्काल जांच के आदेश दे दिए थे। लेकिन जांच कंप्लीट हुई या दबा दी गई यह मेरी जानकारी में नहीं है।

बंशीधर भगत, विधायक कालाढूंगी एवं पूर्व मंत्री

इस द्घोटाले का पर्दाफाश समाजसेवी मधु चौहान की मदद से हमने किया है। सूचना के अधिकार से मिले दस्तावेज साफ तौर पर इस लूट के तार उच्च स्तर तक जाने की ओर इशारा कर रहे हैं। यदि पूरे प्रकरण की जांच हो तो वर्ष २००५ से २००१२ तक की खरीद में ऐसे ही फर्जी कमीशनखोरी का पर्दाफाश हो जाएगा। इस पूरे प्रकरण पर एक वरिष्ठ अधिकारी की भूमिका संदेहास्पद है जो वर्षों से आयुर्वेद निदेशालय में कुंडली मार कर बैठी हैं।

दुष्यंत मैनाली अधिवक्ता एवं आरटीआई कार्यकर्ता

 

 
         
 
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