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खास खबर 
 
आवासों में तब्दील संग्रह केंद्र

कागज के फल@भाग&3

रवि जोशी

ravi@thesundaypost.in

 

उद्यान विभाग की योजनाएं खुद ही उसकी कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती हैं। विभाग ने छह साल पहले फल एवं सब्जी संग्रह की जो योजना चलाई उसकी अधिकारियों को ठीक से जानकारी तक नहीं। योजना के तहत उन गांवों में संग्रह केंद्र बना दिए गए जहां उत्पादन होता ही नहीं। यह देखने के बावजूद जब पानी नहीं तो बागवानी और खेती कहां से होगी, एक ही गांव में दो&दो केंद्र बना दिए गए। नतीजा है कि आज फल एवं सब्जी संग्रह केंद्र किसी काम के नहीं रहे। लोग इनका इस्तेमाल आवासीय भवनों के तौर पर अवश्य कर रहे हैं


र्ष २००७&०८ में उद्यान विभाग ने अल्मोड़ा जिले के १२ गांवों में हॉर्टीकल्चर टेक्नोलॉजी मिशन के तहत फल&सब्जी संग्रह केंद्र बनवाए। इस योजना का उद्देश्य क्षेत्र में हो रहे फल&सब्जी उत्पादन को सुरक्षित जगह मुहैया कराना था। लेकिन मात्र छह साल में ही सभी संग्रह केंद्र आवासीय द्घरों में तब्दील हो गए। इस योजना की कुल लागत २१,१६,३४१ रुपए बताई गई। इसमें सरकार ने छह लाख रुपए राज सहायता के रूप दिए और बाकी राशि कृषकों ने स्वयं कृषक अंश के रूप में लगाई। 

संग्रह केंद्रों की पड़ताल करने पर उद्यान विभाग की कार्यशैली का ऐसा रूप दिखाई दिया जो हैरान कर देने वाला है। पड़ताल के दौरान जब संबंधित सचल दल केंद्रों के अधिकारियों से बात की गई तो मालूम हुआ कि उन्हें योजना के उद्देश्य के बारे में ठीक से पता ही नहीं। कुछ ने कहा कि उन काश्तकारों को राज सहायता दी गई जिनके अपने फल&सब्जी संग्रह केंद्र थे। कुछ अधिकारियों का मानना है कि यह सहायता उस क्षेत्र के लोगों के लिए भी है, जो फल&सब्जी को तोड़ने के बाद शाम को इन केंद्रों में रखकर अगले दिन बाजार में ले जा सकते हैं। इसके बदले में केंद्र का मालिक उनसे किराया ले सकता है। फल&सब्जी के विपणन को सुगम बनाने के उद्देश्य से यह शर्त भी रखी गई थी कि केंद्र का निर्माण सड़क के किनारे हो। वर्तमान हालत यह है कि इन सभी संग्रह केंद्रों को काश्तकारों ने अपना ?kj बना लिया है। कई केंद्र तो ऐसे गांवों में हैं जहां इतना उत्पाद ही नहीं होता कि उन्हें बाजार ले जाने की जरूरत पड़े। 


'दि संडे पोस्ट' ने पड़ताल की शुरुआत भिकियासैंण के गैरगांव में बनाए गए फल एवं सब्जी केंद्र से की। यह केंद्र दान सिंह नाम के काश्तकार की जमीन पर बना है, इसमें अब वह सपरिवार रहते हैं। दान सिंह ने बताया कि मैं पशुपालन का काम करता था। सड़क से लगती अपनी जमीन पर मैं गौशाला बनाने की तैयारी कर रहा था। इसी दौरान मुझे सचल दल केंद्र से इस योजना के बारे में पता चला। मुझे बताया गया कि फल एवं सब्जी संग्रह केंद्र बनाने पर सरकार मुझे ५० हजार की सहायता देगी। मैंने दो कमरे बनवाए और सहायता प्राप्त कर ली। लेकिन यहां उतना उत्पादन ही नहीं होता था कि लोग अपना सामान यहां रखें और मैं उनसे किराया वसूल कर सकूं। काफी दिनों तक कमरा खाली रहा और बोर्ड भी लगा रहा। मुझे लगा मैंने ५० हजार के प्रलोभन में अपने एक लाख से ज्यादा खर्च किए और इसका कोई उपयोग भी नहीं कर सका। इसके बाद मैं पूरे परिवार के साथ यहां रहने लगा। दान सिंह कहते हैं कि योजना गांव की जरूरत को ध्यान में रखकर तैयार की गई होती तो आज मैं ठगा महसूस नहीं करता। लोगों को लगता है कि मैंने पैसों के लिए सरकारी योजना का दुरुपयोग किया है। लेकिन सरकारी योजना को मुझ पर थोपा गया और इसके कारण मेरे दुगने पैसे खर्च हो गए।  


ऐसा ही कुछ नजारा कुनालाखेत, तुनिया और सिवाली में बने फल एवं सब्जी संग्रह केंद्रों पर दिखाई दिया। नियमों को ताक पर रखकर कुनालाखेत और तुनिया के फल एवं सब्जी संग्रह केंद्र एकदम सटे हुए बनवाए गए। लगभग ३०० जनसंख्या वाले कुनालाखेत गांव में जहां पानी की गंभीर समस्या पैर पसारे है, वहां बागवानी और खेती से कुछ ही लोग जुड़े हैं। ऐसी जगह पर दो फल एवं सब्जी संग्रह केंद्र बने हैं और दस्तावेजों में इनमें से एक को तुनिया में दिखाया गया है। निःसंदेह यह दोनों केंद्र भी द्घरों में तब्दील हो चुके हैं। पड़ताल के दौरान जब 'दि संडे पोस्ट' की टीम वहां पहुंची तो दोनों केंद्रों में ताला जड़ा था। पूछने पर पता चला कि इनमें से भुवन चंद्र के केंद्र का इस्तेमाल होता ही नहीं है। लोगों को यह भी नहीं पता था कि उसका दरवाजा किधर है जबकि दूसरा केंद्र जिनकी जमीन पर बनाया गया था उनकी मृत्यु हो चुकी है। गांव के लोगों ने कहा कि यदि हमें कोई सामान रखना होता है तो उनकी पत्नी हमें बाहर आंगन पर रखने को कहती हैं। इसके बाद जब उस आंगन को देखा गया जिसका इस्तेमाल फल एवं सब्जी संग्रह के लिए हो रहा है तो वहां सोफे और सेंटर टेबल इस तरह सजा कर रखे गए थे मानो कोई ड्राइंग रूम हो। कुनालाखेत से ४ किमी की दूरी पर सिवाली गांव में एक केंद्र तारा देवी ने भी बनवाया है। यह केंद्र तो अब बेहतरीन किचन में तब्दीहल हो चुका है। गांव के लोगों ने बताया कि बनने के कुछ समय तक दीवार में फल एवं सब्जी केंद्र लिखा हुआ था, लेकिन अब उसे मिटा दिया गया। इसका पहले से ही कोई इस्तेमाल नहीं हुआ और न ही गांव में इतना फल उत्पादन है। हम थोड़ी सब्जियां उगाते हैं तो वो खुद ही खाने के लिए पूरी नहीं होती, यह बेचने का तो सवाल ही नहीं उठता। इस सबके बारे में जब सचल दल केंद्र के अधिकारी से बात की गई तो उन्होंने सबसे पहले यह कहा कि वर्ष २००७&०८ में मैं यहां नहीं था। इसके बाद उनसे इन केंद्रों की वर्तमान स्थिति के बारे में जानकारी मांगी तो उन्होंने दो दिन की अपनी पड़ताल के बाद कहा कि ये केंद्र योजनानुसार कार्य कर रहे हैं। इन केंद्रों के मकानों में तब्दील होने की बात पर सचल दल केंद्र के अधिकारी बताते है कि नहीं काश्तकार अपने ?kj में रहते हैं। कोई संग्रह केंद्रों में नहीं रहता सबके पास नीचे गांव में अपना मकान है, लेकिन हमारी पड़ताल में उनकी कही बातों और वर्तमान स्थिति में जमीन आसमान का अंतर दिखा। 


इसके बाद dkdM+h?kkV सचल दल केंद्र के अधिकारी से उनके क्षेत्र में बने दो संग्रह केंद्रों की जानकारी प्राप्त की गई। उन्होंने फल एवं सब्जी संग्रह केंद्रों के सही इस्तेमाल के बारे में बताते हुए कहा कि हां, इस्तेमाल तो हो रहा है काश्तकार वहां स्वयं रहते हैं। वह अपनी जमीन में प्याज, आलू और दूसरी सब्जी उगाते हैं और वहीं रखते हैं। इस बात को उन्होंने इस प्रकार समझाया कि जैसे पॉली हाउस व्यक्ति विशेष का होता है, पॉवर ट्रिलर व्यक्ति विशेष का होता है वैसे ही यह फल एवं सब्जी संग्रह केंद्र भी व्यक्ति विशेष से संबंधित होते हैं, इसका क्षेत्र के अन्य काश्तकारों से कोई संबंध नहीं होता। यह जवाब हास्यास्पद होने के साथ ही इन केंद्रों की वर्तमान स्थिति बयां कर रहा था। पड़ताल के दौरान ?kj में तब्दील हुए पाए गए। जैसे आम काश्तकार अपने उत्पाद को अपने द्घरों में संभाल कर रखते हैं, इससे अलग इन केंद्रों की स्थिति नहीं है। 


शहर फाटक सचल दल केंद्र ने भी इस योजना के नियमों को ताक पर रख दिया। एक ही गांव डोल में दो फल एवं सब्जीे संग्रह केंद्रों की संस्तुति कर दी गई। इस गांव के निवासी रणजीत सिंह और दिवान सिंह को सचल दल केंद्र ने संग्रह फल एवं सब्जी संग्रह केंद्र बनाने की अनुमति दे दी। जोकि बनने के साथ ही निजी द्घरों की तरह इस्तेमाल किए जाने लगे। ऐसे ही केंद्र लमगड़ा सचल दल केंद्र के अंतर्गत उज्यौनला, nU;k?k सचल दल केंद्र के दौला, सोमेश्वर सचल दल केंद्र के गुरुड़ा और ताकुला सचल दल केंद्र के भकुना में बनवाए गए। जिनकी तस्वीर भी बाकी से अलग नहीं है। 


लगभग ६ साल पहले की ये योजना और उसके क्रियान्वयन का तरीका विभाग की कार्यप्रणाली को बयां करता है। योजनाएं थोपे जाने का सिलसिला बदस्तूर जारी है। ऐसी योजनाएं लगातार आती हैं जिनकी जरूरत नहीं होती। 

 
         
 
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  • दीपक जोशी

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