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आवरण कथा
 
अधिकार की आड़ में---

गुंजन कुमार

gunjan@thesundaypost-in

 

उत्तराखण्ड में लोगों को सूचना आयोग से जानकारियां हासिल करने में पसीने छूट जाते हैं। तंग आकर वे राज्यपाल से शिकायत करने को विवश हैं। एक पत्रकार ने तो राज्यपाल को दिए अपने शिकायती पत्र में सूचना आयुक्त अनिल शर्मा पर बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं। उनके मुताबिक सूचना के अधिकार की आड़ में आयुक्त ^सूचना माफिया^ को बढ़ावा दे रहे हैं जो लोग वास्तव में जानकारी चाहते हैं] उन्हें डराते&धमकाते हैं

 

सूचना का अधिकार कानून के अस्तित्व में आने पर उम्मीदें जगी थीं कि अब जनता के हाथ में भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए एक अच्छा हथियार आ गया है। इस कानून का उपयोग करने के लिए लोगों में बड़ा उत्साह भी देखा गया। लेकिन जैसे&जैसे लोग जागरूक हो रहे हैं] वैसे&वैसे ही इस कानून की धार को कुंद करने या इसके दुरुपयोग के प्रयास भी होने लगे हैं। उत्तराखण्ड राज्य में भी इस तरह की शिकायतें सामने आ रही हैं। राज्य सूचना आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। यहां तक कि आयोग से सूचना न मिलने और राज्य सूचना आयुक्त की कार्यप्रणाली से नाराज लोग राज्यपाल के सम्मुख गुहार लगाने को विवश हैं।

 

प्रदेश के राज्यपाल को लिखे एक शिकायती पत्र में वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार ने तो यहां तक आरोप लगाया है कि राज्य के सूचना आयुक्त अनिल शर्मा सूचना माफिया को बढ़ावा दे रहे हैं। आयुक्त ने एक मामले में उन्हें सूचना उपलब्ध कराने के बजाए डांटने और धमकी देने का रवैया अपनाया। उन्हें हतोत्साहित भी किया गया। अरविंद के मुताबिक उन्होंने सूचना का अधिकार कानून २००५ के तहत उत्तराखण्ड पुलिस से कुछ जानकारियां मांगी थीं। दो बिंदुओं पर संतोषजनक सूचना न मिलने पर उन्होंने प्रथम अपील की। उसमें भी सफल नहीं हुए तो अंततः राज्य सूचना आयोग के समक्ष द्वितीय अपील की। बकौल ^अरविंद मामले की सुनवाई के लिए सूचना आयुक्त के समक्ष उपस्थित हुआ तो वह मुझे डांटने और धमकाने लगे। पुलिस का पक्ष लेने लगे और मुझे चले जाने का आदेश दे दिया। मेरा पक्ष न तो जानने का प्रयास किया गया और न ही कुछ बोलने दिया गया। इस सुनवाई के दो हफ्ते बाद सूचना आयोग से पत्र के माध्यम से मुझे जवाब मिला कि अपीलकर्ता को लोक सूचनाधिकारी ने समस्त अभिलेखीय सूचना उपलब्ध करा दी है। कोई और सूचना उपलब्ध कराया जाना वांछित न पाते हुए द्वितीय अपील का निस्तारण किया जाता है।^

 

पत्रकार अरविंद कुमार कहते हैं कि सूचना आयुक्त के आदेश पत्र में लिखा है कि यह आदेश ^खुले में द्घोषित] हस्ताक्षरित एवं दिनांकित^  है] जबकि सुनवाई के दिन मेरे सामने कोई आदेश नहीं लिखा गया। मुझे तो डांट कर भगा दिया गया था। ऐसे में आयुक्त गलत आदेश लिखकर गुमराह कर रहे हैं। यदि मुझे लोक सूचनाधिकारी से सूचना उपलब्ध करा दी गई होती तो फिर मैं द्वितीय अपील क्यों करता और आयोग मेरी अपील स्वीकार ही क्यों करता\ अरविंद का आरोप है कि आयुक्त सूचना मांगने वाले आम नागरिक को इसी तरह हतोत्साहित करते हैं।

 

राज्यपाल को सूचना आयुक्त अनिल शर्मा के खिलाफ दिए शिकायती पत्र में अरविंद ने उन पर एक और गंभीर आरोप लगाया है। पत्र में कहा है कि सूचना आयुक्त अनिल शर्मा स्वयं प्रदेश में ^सूचना माफिया^ को बढ़ावा दे रहे हैं। उन्होंने दो तथाकथित ऐसे आरटीआई कार्यकर्ताओं का उल्लेख किया है] जिन्हें आयुक्त का संरक्षण है। इसमें एक हरिद्वार तो दूसरा देहरादून का निवासी है। शिकायत की गई है कि दोनों तथाकथित आरटीआई कार्यकर्ताओं ने पिछले कुछ वर्षों में एक हजार से अधिक सूचना आवेदन विभिन्न सरकारी विभागों में किए हैं। इनमें से करीब तीन सौ में द्वितीय अपील की गई। ये सारी द्वितीय अपील इन्हीं दोनों तथाकथित आरटीआई कार्यकर्ताओं द्वारा की गईं। एक ने कुल १३२ तो दूसरे ने कुल १४८ अपील की हैं। एक ही कार्यकर्ता का इतना ज्यादा द्वितीय अपील करना कई सवाल खड़े करता है। इसे प्रदेश के एक आरटीआई कार्यकर्ता के बयान से समझा जा सकता है। हल्द्वानी निवासी आरटीआई कार्यकर्ता गुरविंदर सिंह चड्ढा कहते हैं] ^यदि हम दस आरटीआई आवेदन करते हैं तो उनमें से एक या दो में ही हमें द्वितीय अपील में जाना पड़ता है क्योंकि अधिकतर मामलों में हमें वांछित सूचना मिल जाती है।^ 

 

आरटीआई कार्यकर्ता चड्ढा की मानें तो अस्सी से नब्बे फीसदी की सूचना लोक सूचनाधिकारी से मिल जाती है। दस से बीस फीसदी मामलों में ही द्वितीय अपील की नौबत आती है। ऐसे में यदि तथाकथित दो आरटीआई कार्यकर्ताओं की द्वितीय अपील की संख्या देखें तो बहुत ही ज्यादा हो जाती है। अरविंद ने अपने शिकायती पत्र में एक और मुद्दे को उठाया है कि इन दोनों तथाकथित आरटीआई कार्यकर्ताओं की द्वितीय अपील में से ९० फीसदी से अधिक का सूचना आयुक्त अनिल शर्मा की पीठ में सुनवाई एवं निर्णय के लिए पहुंचना आश्चर्यजनक है। इससे भी बड़ा आश्चर्य अरविंद को इस बात का है कि जहां उनकी अपील पर गौर नहीं किया जाता] वहीं तथाकथित आरटीआई कार्यकर्ताओं की अपील को प्राथमिकता दी जाती है। वह सवाल उठाते हैं कि एक ही आरटीआई कार्यकर्ता की अपीलों पर लगातार सुनवाई करना और दूसरों को हतोत्साहित करना] कहां तक जायज है। एक तथाकथित कार्यकर्ता की लगातार २८ अपीलों पर सुनवाई हुईं। एक ही व्यक्ति को लगातार अपील संख्या जारी हो जाना आश्चर्यजनक ही नहीं संदेहास्पद है। लगातार चार अपीलीय संख्या तो इस व्यक्ति को कई बार मिल चुकी है। अरविंद ने राज्यपाल से इसकी जांच की मांग की है।

 

अरविंद ने राज्यपाल का ध्यान इस ओर भी दिलाया है कि  सूचना आयुक्त का काम अपीलकर्ताओं को सूचना उपलब्ध कराने तक ही सीमित है। द्वितीय अपील में आयुक्त किसी जांच का निर्देश नहीं दे सकते] जबकि आयुक्त अनिल शर्मा ने कई बार अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर सुनवाई की है और अपना आदेश दिया है। ऐसा वह तथाकथित रूप से अपने संरक्षण प्राप्त तथाकथित आरटीआई कार्यकर्ताओं की अपील पर ही करते हैं। प्रदेश में एक ऐसा मामला तो काफी चर्चा में भी रहा है। एनआरएचएम में कथित ?kksVkys से संबंधित द्वितीय अपील की सुनवाई दो वर्षों तक चली। शायद यह सूचना आयोग में चली अब तक की सबसे लंबी सुनवाई है। इसमें आयुक्त ने अपने अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़कर कई बार स्वास्थ्य] चिकित्सा एवं परिवार कल्याण विभाग को विभागीय जांच के आदेश दिए। आयुक्त इसमें यहीं नहीं रुके। उन्होंने एक कदम और आगे बढ़ते हुए इस मामले की जांच सीबीआई से कराने की सिफारिश तक कर दी। बीजेपी शासन में हुए इस कथित ?kksVkys पर जब तक प्रदेश में भाजपा की सरकार रही तब तक कुछ नहीं हुआ। मगर जैसे ही प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हुआ और विजय बहुगुणा के बाद हरीश रावत मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने इस सिफारिश को मान लिया। इस पर पत्रकार अरविंद कुमार कहते हैं कि ^आयुक्त प्रदेश में ^सूचना माफिया^ बने हुए हैं। प्रदेश में यह कानून भ्रष्टाचार को उजागर करने के लिए नहीं] बल्कि ^ब्लैक मेलिंग^ करने के रूप में प्रसारित हो रहा है। यदि इस पर तत्काल रोक नहीं लगाई गई तो एक अच्छा कानून प्रदेश में दम तोड़ देगा।^

 

बात अपनी&अपनी

सूचना आयुक्त सूचना मांगने के लिए आदेश देता है। सूचना नहीं मिलने पर संबंधित कर्मी पर कार्यवाही करने का आदेश दे सकते हैं। आयुक्त किसी ?kksVkys या फिर भ्रष्टाचार की जांच की सिफारिश नहीं कर सकते।

सुषमा सिंह] पूर्व केंद्रीय मुख्य सूचना आयुक्त 


आयुक्त को किसी जांच की सिफारिश करने का अधिकार नहीं है] चाहे वह विभागीय हो या सीबीआई। एनएचआरएम मामले में भी प्रदेश के महाधिवक्ता ने सीबीआई जांच की आयुक्त की सिफारिश को निरस्त कर दिया था। उन्होंने कहा था कि सूचना आयुक्त को ऐसी सिफारिश का कोई अधिकार नहीं है] यह गलत है। कुछ दिनों पहले मेरे पास एक अन्य आयुक्त की शिकायत आई थी।

विनोद नौटियाल] पूर्व सूचना आयुक्त


सूचना आयुक्त को किसी मामले में जांच की सिफारिश करने का अधिकार नहीं है। वह केवल वांछित सूचना उपलब्ध कराने तक ही सीमित है। हां] सूचना मांगने के लिए वह विभाग को किसी भी प्रकार का आदेश दे सकता है। राज्यपाल के पास शिकायत पहुंचने का मतलब है कि कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ी अवश्य हुई है।

गुरविंदर सिंह चड्ढा] आरटीआई कार्यकर्ता

 

जिस व्यक्ति ने मेरे खिलाफ राज्यपाल से शिकायत की है उसे मैं नहीं जानता। मैंने एनआरएचएम में हुए भ्रष्टाचार की सूचना नहीं मिलने पर सीबीआई जांच की सिफारिश की थी। जिस पर मुख्यमंत्री रावत जी ने भी सहमति दी। इससे भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों में खलबली मची है। मुझे धमकी भी मिली है। शिकायतकर्ता इसी का हिस्सा हो सकता है। कौन कहता है कि सूचना आयुक्त को जांच की सिफारिश करने का अधिकार नहीं है] जो कहता उसे कानून की कोई जानकारी नहीं है।

अनिल शर्मा] सूचना आयुक्त

 
         
 
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