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आवरण कथा
 
कागज के फल

रवि जोशी

ravi@thesundaypost.in

 

हिमालयी राज्यों में उद्यानीकरण को बढ़ावा देने के लिए चल रही केंद्र की महत्वाकांक्षी योजना एचएमएनईएच उत्तराखण्ड में कागजों तक सीमित है। पिछले १० वर्षों के दौरान योजना के तहत आम] अखरोट] सेब] पुलम आदि फलदार वृक्ष लगाने के नाम पर करोड़ों रुपए खर्च हो चुके हैं। लेकिन लोग फलों के स्वाद से वंचित हैं। राज्य में उद्यानीकरण की हकीकत बयां करती ^दि संडे पोस्ट^ की किश्तवार रिपोर्ट की पहली कड़ी

 

हॉर्टीकल्चर मिशन फॉर नार्थ ईस्टर्न एंड हिमालयन स्टेट्स ¼एचएमएनईएच½ केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक है। उत्तराखण्ड में उद्यानीकरण को बढ़ावा देने के लिए यह योजना वर्ष २००३&०४ में लागू की गई। वर्ष २०१३&१४ की समाप्ति पर दस साल के अपने सफर में कहने को योजना ने प्रदेश के एक बड़े भाग को फलदार वृक्षों से आच्छादित कर दिया] लेकिन महज कागजों पर। ^दि संडे पोस्ट^ ने जब योजना को लेकर अल्मोड़ा जिले में जमीनी पड़ताल की तो हकीकत कुछ और ही दिखाई दी। आलम यह है कि जिले में योजना को लागू करने की जिम्मेदारी जिस अधिकारी पर है] उन्हें अपने जिले में अच्छा काम कर रहे एक काश्तकार का नाम बताने के लिए पन्नों में झांकने की जरूरत महसूस होती है। आम] सेब] अखरोट] पुलम आदि के विस्तार के लिए करोड़ों रुपए खर्च हो चुके हैं] लेकिन जिला उद्यान अधिकारी यह बता पाने में अक्षम हैं कि इतने खर्च के बाद क्या जिले में कोई उद्यानपति आत्मनिर्भर बन पाया है या नहीं। पॉली हाउस बनाने] ड्रिप इरिगेशन सिस्टम लगाने और दूसरी योजनाओं में ठेकेदारों और अधिकारियों के बीच बंदरबांट के कारण काश्तकारों को समय पर योजना का लाभ नहीं मिल रहा है। इसके बावजूद अधिकारी संतुष्ट हैं। जिला उद्यान अधिकारी तो यहां तक कहते हैं कि मैं जमीनी समस्याओं को समझता हूं और मीटिंग में उन्हें प्रस्तुत भी करता हूं। लेकिन बड़े अधिकारी इन पर गौर नहीं करते। 

 

अल्मोड़ा जिले में आरटीआई से मिली जानकारी चौंका देने वाली है। जिले में प्रतिवर्ष औसतन ३६ लाख ५५ हजार ८८१ रुपए आम के पेड़ लगाने और जीर्णोद्धार पर खर्च कर दिए जाते हैं। पिछले आठ सालों के आंकड़े बताते हैं कि जिले में आम लगाने पर कुल ३ करोड़ २९ लाख २९३७ रुपए खर्च किए गए। एक आम के पेड़ को लगाने में विभाग औसतन १७६ &८४ रुपए खर्च कर रहा है। इसके अनुसार आज जिले में आम के १ लाख ८६ हजार ६० पेड़ होने चाहिए। यानी एक परिवार के हिस्से एक पेड़ आना चाहिए। लेकिन जब जिला उद्यान अधिकारी से पूछा गया कि क्या इतना पैसा खर्च होने के बाद अल्मोड़ावासियों को उनके जिले में पैदा हुआ आम खाने को मिलता है तो अधिकारी स्पष्ट जवाब नहीं दे पाए। यही स्थिति सेब की भी है। पिछले आठ&नौ सालों में ३ लाख ८७ लाख ४७ हजार १० रुपए खर्च होने के बाद जिले में ४ लाख से ज्यादा सेब के पेड़ होने चाहिए। अगर इनमें से आधे भी फल देने की स्थिति में होते तो अल्मोड़ा सेब उत्पाादन में अव्वल होता। जिले के सैकड़ों काश्तकार आत्मनिर्भर होते। जिला उद्यान अधिकारी को बेहतरीन काश्तकार कागजों पर ढूंढ़ने की जरूरत नहीं होती। 

 

देश में अखरोट उत्पादन में खुद को दूसरे नंबर पर बताने वाले प्रदेश के इस जिले में पिछले आठ सालों में इस योजना के नाकामयाब क्षेत्रफल विस्तार और जीर्णोद्धार में ८३ लाख ७५० हजार ९७ रुपए खर्च किए जा चुके हैं। इसके बावजूद अधिकारी इनके उत्पादन को लेकर आश्वस्त नहीं हैं। 

 

पॉली हाउस और ड्रिप इरिगेशन जैसी आधुनिक तकनीकों को काश्तकारों तक पहुंचाने में भी विभाग विफल रहा है। विभाग काश्तकारों को इसके लिए जागरूक तो नहीं कर पाया उल्टा जिन काश्तकारों ने इसके लिए आवेदन किए उन्हें विभागीय संस्तुति के बाद भी साल भर से ज्यादा इंतजार करना पड़ा। 

 

विभाग हर वर्ष करोड़ों रुपए तो खर्च कर रहा है] लेकिन उस पर निगरानी रखने के लिए कोई नहीं है। जांच के लिए दो श्रेणियों में सचल दल टीम के पास इंस्पेक्टर का प्रावधान तो है] लेकिन स्टॉफ की कमी है। ऐसे में जांच के लिए यदा&कदा ही एसएचआई दौरे पर आते हैं। बातचीत के दौरान उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग के निदेशक आईए खान ने बताया कि पिछले कई सालों से विभाग में भर्ती की प्रक्रिया ही नहीं हुई] मैंने शुरू की है। अब आने वाले दो सालों में इसका असर दिखना शुरू होगा। 

 

कई काश्तकारों ने ^दि संडे पोस्ट^ से बातचीत के दौरान बताया कि कभी भी सही समय पर पौधे और बीज नहीं प्राप्त हो पाते। इस समस्या को निदेशक भी स्वीकारते हैं। वह टेंडरिंग की लंबी प्रक्रिया और अधिकारियों की आपसी खींचतान को इसका कारण बताते हैं। नतीजा यह होता है कि मौसम के चले जाने के बाद बीज के दाम दोगुने या इससे भी ज्यादा हो जाते हैं और सरकारी खजाने से प्राइवेट कंपनियों की झोली में ज्याादा मुनाफा भर दिया जाता है। 

 

इस प्रकार के तथ्य विभाग के अंदर अधिकारियों और ठेकेदारों के बीच बड़ी सांठ&गांठ की ओर इशारा कर रहे हैं। इसका एक उदाहरण अल्मोड़ा जिले में करोड़ों रुपए खर्च होने के बाद भी उद्यानीकरण के नाम पर कुछ न दिखाई देना है। पॉलीहाउस और ड्रिप इरिगेशन सिस्टम में ठेकेदारों की मनमानी और बीजों के क्रय में देहरादून बैठे अधिकारियों द्वारा जानबूझ कर की जा रही देरी इस शक को और पुख्ता करती है। काम करने की इस प्रवृत्ति के कारण करोड़ों रुपए खर्च होने के बाद भी यहां उद्यानीकरण हिमाचल जैसा विस्तृत रूप नहीं ले पाया।

 

प्रत्येक वर्ष जिले के काश्तकारों को मिले पौधों की संख्या के पैटर्न को देखकर पौधों और पैसों की बंदरबांट खुद समझ में आ जाती है। उदाहरण के लिए वर्ष २००७&०८ में पाले से प्रभावित आम के जीर्णोद्धार के लिए जिले में डेढ़ करोड़ रुपए खर्च किए गए। विभाग से मिली जानकारी के अनुसार विकासखंड धौलादेवी में दन्या सचल दल केंद्र से ९० काश्तकारों में से १२ को एक हेक्टेयर भूमि पर जीर्णोद्धार के लिए राज्य सहायता दी गई। चार को ० &२५ हेक्टेयर के लिए सहायता दी गई और बाकी सभी को आधा हेक्टेयर भूमि के लिए दी गई। यहां सवाल उठना लाजिमी है कि क्या पाले ने प्रत्येक काश्तकार को बराबर&बराबर प्रभावित किया था जो कि विभाग ने आंख मूंदकर सबको एक जैसी सहायता दी। 

 

^हमारा काम सिर्फ पेड़ देने का^

अल्मोड़ा के जिला उद्यान अधिकारी दयालु राम आर्या से बातचीत 

एचएनएमईएच योजना ने दस साल पूरे कर लिए हैं। इन वर्षों में सब्जियों और फल के उत्पादन में अल्मोड़ा में कितने प्रतिशत का इजाफा हुआ है

मैं रानीखेत के लिए मीटिंग में आया हूं। आखिर यहां आंकड़े लेकर तो नहीं आया हूंगा।

आखिर कोई अंदाजा तो होगा। पिछले कई सालों से आप इस योजना से जुड़े हैं 

देखिए] उत्पादन बढ़ा तो है। लगभग तो मैं कुछ भी बता नहीं पाऊंगा] सब्जी में तो काश्तकारों को लाभ मिला है] लेकिन फलों में देर से लाभ होता है। इसलिए उतनी सफलता नहीं मिली है। 

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि पिछले दस सालों में आम के पेड़ लगाने पर करोड़ों खर्च किए गए। क्या जिले में इतने आम पैदा होते हैं कि लोगों को खाने को मिल जाए 

चौखुटिया] स्याल्दे] लमगड़ा] नौगांव और दनिया की तरफ आम बढ़ा है। इसमें एक बात और है कि आम के पेड़ तो लगे हैं] अब उसमें कितने प्रतिशत जीवित हैं] यह देखना है। जीवित पेड़ों की संख्या भी तो कम है ना। 

आम के अलावा सेब और अखरोट की भी यही स्थिति है। पैसा बहुत खर्च किया गया लेकिन जमीन पर कुछ नहीं दिखता

नहीं] सेब तो नहीं आम खाने को मिलते हैं। 

करोड़ों रुपए खर्च कर लाखों पौधे लगाए गए मगर जिले में उसके एक तिहाई भी पेड़ जिंदा नहीं है क्यों 

हमारा काम तो पेड़ दे देने का है। काश्तकारों को डंडा मारकर तो उसकी देखरेख नहीं करा सकते। वे पौधे ले जाने के बाद उनकी देख&रेख नहीं करते तो हम क्या कर सकते हैं। 

पॉलीहाउस और ड्रिप इरिगेशन सिस्टम स्वीकृत होने के बाद सालों लग जाता है इसको बनने में। क्यों

अल्मोड़ा जनपद में ऐसा कोई ठेकेदार नहीं आया जो यहां काम करे। इसमें हमने काश्तकार को छूट दे रखी है कि वह जिससे मर्जी उससे पॉलीहाउस और ड्रिप इरिगेशन का काम करा ले। 

पूरे कुमाऊं और आधे गढ़वाल में एक ही फर्म इसे लगा रहा है। क्या उत्तराखण्ड के काश्तकार एक ही फर्म को फोन करके बुलाते हैं 

हमें पूरे प्रदेश का नहीं पता। हमारे जिले में तो दो संस्थाएं काम कर रही हैं। एक बड़े पॉली हाउस लगा रही है और दूसरी छोटे। इन कंपनियों ने हमसे कहा] हम लगाएं तो हमने कहा] लगा लो। इसका ये मतलब नहीं है कि काश्तकार को बाध्य किया है। वह किसी से भी लगवा सकता है। 

उद्यानीकरण के नाम पर हो रहे करोड़ों के खर्च पर नजर रखने के लिए क्या कोई संस्था है

कोई संस्था नहीं है] लेकिन विभागीय जांच होती रहती है।

 

एचएमएनईएच की जानकारी मेरे पास नहीं आती है। इसके निदेशक देहरादून में बैठते हैं। इस योजना के क्रियान्वयन के लिए वह सीधे जिला उद्यान अधिकारियों के संपर्क में रहते हैं। वैसे ग्रीन हाउस] फ्लोरीकल्चर में देहरादून] ऊधमसिंहनगर] काशीपुर में काम हुआ है। पर्वतीय क्षेत्रों में उतना लाभ नहीं हुआ जितना होना चाहिए। 

आईए खान] निदेशक उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण

 
         
 
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