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आवरण कथा
 
इस तरह दो बार जन्मे नामधारी

उत्तराखण्ड अल्पसंख्यक आयोग के बर्खास्त अध्यक्ष सुखदेव सिंह नामधारी बड़े अवतारी भी हैं। चार साल के अंतराल में वह दो बार पैदा हुए मगर कागजों पर। स्कूली प्रमाण पत्रों के अनुसार वह सन्‌ १९६८ में ऊधमसिंहनगर के बाजपुर में जन्मे और उन्होंने इंटर तक पढ़ाई की जबकि उनका पासपोर्ट बताता है कि इससे पहले वह १९६४ में पंजाब के जालंधर में भी पैदा हो चुके थे और शिक्षा के नाम पर सिर्फ हस्ताक्षर करना भर जानते हैं। दरअसल, यह कोई चमत्कार नहीं बल्कि देश के जिम्मेदार विभागों की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह है। कितनी हैरानी की बात है कि बाजपुर में इंटर तक पढ़े नामधारी पासपोर्ट बनवाते वक्त मंडी समिति के सदस्य थे। उन पर उत्तराखण्ड में आपराधिक मामले दर्ज थे, लेकिन पंजाब की एलआईयू ने इस संबंध में जरा भी तहकीकात करने की कोशिश नहीं की.

 

चड्ढा बंधु हत्याकांड मामले में गवाह से गुनहगार बने उत्तराखण्ड अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष सुखदेव सिंह नामधारी का पासपोर्ट फर्जी तरीके से बनाया गया है। पासपोर्ट अधिनियम के तहत दी जाने वाली जानकारियों में काफी फर्जीवाड़ा किया गया है। सत्यता को जाने तो लगेगा कि आनन-फानन में ही बिना कोई जांच किए पासपोर्ट जारी कर दिया गया। इस मामले में नामधारी ने दो राज्यों की नागरिकता का बेजा इस्तेमाल किया। इसके चलते ही वह पंजाब के जालंधर से पासपोर्ट बनवाने में कामयाब हो गये। पंजाब पुलिस ने पासपोर्ट बनाने से पूर्व की जाने वाली जांच को सिर्फ वहीं तक केन्द्रित कर दिया जबकि उसने उनके स्थाई निवास बाजपुर ऊधमसिंहनगर को जांच के दायरे से मुक्त रखा। यही वजह रही कि पंजाब पुलिस पासपोर्ट अधिकारियों के समक्ष नामधारी के वे कारनामें नहीं रख सकी जिनका खुलासा होना जरूरी था। फिलहाल दिल्ली की क्राइम ब्रांच उन जानकारियों को जुटाने में जुट गई है जो कि नामधारी ने पासपोर्ट का प्रारूप पूरा करते समय दी थी।

 

गत १७ नवंबर को दिल्ली के महरौली स्थित फार्म हाउस पर पॉन्टी चड्ढा और हरजीत चड्ढा के बीच पनपे संपत्ति विवाद ने इन दो भाइयों को असमय मौत के मुंह में पहुंचा दिया। दोनों भाइयों की मौत के गवाह बने उत्तराखण्ड अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष सुखदेव सिंह नामधारी पर दिल्ली पुलिस का फंदा दिन पर दिन कसता जा रहा है। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल (क्राइम ब्रांच) हर पहलू की बारीकी से जांच कर रही है। वहीं दूसरी तरफ नामधारी के पासपोर्ट को लेकर भी उंगलियां उठाई जाने लगी हैं। जिस तरह से पासपोर्ट के फार्म में जानकारी दी गई है उसकी गहनता से जांच की जाय तो नामधारी का पासपोर्ट रद्द होना तय है।

 

          'दि संडे पोस्ट' के पास मौजूद दस्तावेज जो कहानी कह रहे हैं वे सुखेदव सिंह नामधारी को झूठ के दायरे में खड़ा कर रहे हैं। सवाल यह है कि आखिर नामधारी के सामने ऐसी क्या नौबत आई कि उन्होंने अपने निवास स्थान बाजपुर की जानकारी पासपोर्ट के आवेदन फार्म में नहीं दी? नामधारी को दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच कठद्घरे में खड़ा कर सकती है कि क्यों उन्होंने इंटर तक शिक्षा ग्रहण करने के बावजूद अपने आपको अनपढ़ (केवल हस्ताक्षर करने वाला साक्षर) बताया। यही नहीं बल्कि पासपोर्ट के लिए आवेदन करते समय उन पर कई अपराधिक मामले दर्ज थे तो क्यों उन्होंने प्रारूप फार्म में इनका जिक्र नहीं किया? पासपोर्ट बनवाते वक्त नामधारी मंडी समिति बाजपुर के सदस्य थे तो उन्होंने यह जानकारी क्यों छिपाए रखी? इन सवालों के जवाब तलाशने के लिए दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच पंजाब के जालंधर में जाकर तमाम दस्तावेजों का अवलोकन कर मामले की सच्चाई उजागर कर सकती है।

 

सुखदेव सिंह नामधारी ने ८ मार्च २००६ को पासपोर्ट के लिए आवेदन किया था और मई २००६ को उसे पासपोर्ट प्राप्त हुआ था। आवेदक संख्या ६०८५३१ के तहत उनकी फाइल नंबर पी ़ १३५१९ बनी। इसमें उनका मोबाइल नंबर ८००१३५१९०६ अंकित है। पासपोर्ट एप्लीकेशन फार्म नंबर एक में सुखेदव सिंह नामधारी के बाकायदा हिंदी में हस्ताक्षर हैं। उनका फार्म में नाम सुखेदव सिंह अंकित है। जबकि जन्मतिथि १६ फरवरी १९६४ दर्शाई गई है। गांव का नाम जनिया, जालंधर (पंजाब) है। फार्म में नामधारी के पिता का नाम रूढ़ सिंह जबकि माता का नाम मोहिंदर कौर है। यही नहीं उन्होंने अपनी पत्नी का नाम हरजिंदर कौर लिखा हुआ है। पूरा पता इस प्रकार है- ग्राम जनिया, पोस्ट केंग खुर्द, तहसील शाहकुई, पुलिस स्टेशन-लोहियान खास, जिला जालंधर (पंजाब)। नामधारी ने ही अपने पासपोर्ट फार्म में बिंदु संख्या १२ में पूछी गई शिक्षा संबंधी जानकारी में लिखा है कि वह केवल हस्ताक्षर करने भर तक शिक्षित है। एक तरह से नामधारी ने अपने आपको अनपढ़ सिद्ध किया है। लेकिन 'दि संडे पोस्ट' के पास मौजूद दस्तावेजों से पता चलता है कि वे इंटरमीडिएट तक पढ़े हैं। इंटरमीडिएट कॉलेज बाजपुर से नामधारी ने कक्षा नौ, दस, ग्यारह और बारहवीं तक शिक्षा ग्रहण की है। छात्र पंजिका में उनको जन्म से बाजपुर में दर्शाया गया है। जबकि पासपोर्ट के लिए भरे फार्म में उन्होंने अपना जन्म स्थान जालंधर (पंजाब) बताया है। अब सवाल यह है कि एक ही व्यक्ति दो अलग-अलग जगह कैसे जन्म ले सकता है? नामधारी के स्कूली प्रमाण पत्रों के अनुसार उनकी जन्मतिथि ६ जनवरी १९६८ की है जबकि जालंधर में हुए जन्म के अनुसार उसकी जन्मतिथि १६ फरवरी १९६४ है। दोनों ही जन्मतिथिओं में चार साल का अंतर है। प्रमाण पत्रों के अनुसार नामधारी पंजाब में जन्म लेने के चार साल बाद उत्तराखण्ड के बाजपुर में जन्मे। इंटर कॉलेज बाजपुर की छात्र पंजिका संख्या ४९८० में अंकित शैक्षिक स्थिति के अनुसार २२ जुलाई १९८० को उन्होंने यहां कक्षा ९ में प्रवेश लिया। जबकि इससे पूर्व की पढ़ाई सरस्वती विद्या मंदिर बाजपुर में की। १९८० में कक्षा ९ में अनुर्तीण हो जाने के बाद १९८१ में वह इसी कक्षा में पुनः पढ़े और उर्त्तीण हो गए। १९८२ में कक्षा दस पास की तो १९८३ में कक्षा ११ में उत्तीर्ण रहे। इसी तरह नामधारी ने ८ जुलाई १९८४ को कक्षा बारह में इसी विद्यालय में प्रवेश लिया। लेकिन इस बार वे १२वीं कक्षा में अनुतीर्ण हो गए। ३० जून १९८५ को नामधारी का कक्षा में पुनः उपस्थित न होने पर नाम काट दिया गया। इस तरह जिस व्यक्ति ने पासपोर्ट प्रारूप में अपने आपको अनपढ़ द्घोषित किया था वह इंटर की पढ़ाई करने वाला निकला। यह झूठ सामने आने के बाद अगले झूठ का पर्दाफाश उनके द्वारा इस मामले में भी असत्य का सहारा लिया है। जिसमें पासपोर्ट फार्म भरते समय उनसे बिन्दु संख्या १४ में पूछा गया है कि क्या वे केन्द्र सरकार, राज्य सरकार सहित किसी संस्था या समिति के सदस्य या पदाधिकारी हैं। इसके जवाब में भी उन्होंने गलत जानकारी दी है। जबकि इस दौरान नामधारी कूषि उत्पादन मंडी समिति बाजपुर के उत्पादक निर्वाचन क्षेत्र मुडिया कला से समिति में सदस्य के पद पर कार्यरत रहे हैं। कूषि उत्पादन मंडी समिति के सदस्य पद पर नामधारी २३ नवंबर २००५ से २६ नवंबर २०१० तक रहे जबकि पासपोर्ट के लिए नामधारी द्वारा आवेदन करने की समय सीमा ८ मार्च २००६ तक चली। इससे स्पष्ट है कि सुखदेव सिंह का जिस समय पासपोर्ट बनने की प्रक्रिया में था उस समय भी वह बाजपुर में मंडी समिति के सदस्य थे। इस तरह नामधारी ने पासपोर्ट अधिनियम की इस शर्त पर भी अपने झूठ का पर्दा डाल दिया।

 

साफ है कि नामधारी ने बड़ी चालाकी से अपने अपराधिक रिकॉर्ड को छिपाया। पासपोर्ट फार्म के प्रारूप में अपने जन्म, शिक्षा संबंधी गलत जानकारियां दी। मंडी समिति का सदस्य होने की जानकारी भी छिपाई। पासपोर्ट प्रारूप फार्म भरते समय उसकी बिन्दु संख्या २०, २१ और २२ में सफेद झूठ का सहारा लिया गया है। बिन्दु संख्या २० में पूछा गया है कि अगर आवेदन करने से ५ साल पूर्व तक भारत में कहीं भी आप पर कोई आपराधिक मामला दर्ज हुआ है तो स्पष्ट करें। इसके जवाब में नामधारी ने 'नहीं' कहकर अपना स्पष्टीकरण दिया है। यानी की २००१ से लेकर ८ मार्च २००६ को आवेदन करने की तिथि तक उन पर कोई मामला दर्ज नहीं हुआ है। लेकिन 'दि संडे पोस्ट' के पास मौजूद साक्ष्य इस झूठ का पर्दाफाश करते दिख रहे हैं। साक्ष्यों के अनुसार वर्ष २००२ से पूर्व उन पर कई मामले दर्ज हो चुके थे। वर्ष २००२ की बात करें तो इस वर्ष बाजपुर में ही नामधारी के विरुद्ध एससी/ एसटी एक्ट तथा बलवे की धाराओं में मु ़अ ़सं ़३९१/०२ दर्ज किया गया तो वर्ष २००३ में हत्या का प्रयास करने तथा बलवे की धाराओं  में मु ़अ ़सं ़ ४८/०३ थाना बाजपुर में दर्ज किया गया। वर्ष २००६ में थाना बाजपुर में एक बार फिर नामधारी के विरुद्ध मु ़अ ़सं ़१३/०२/०६ गुण्डा एक्ट के अंतर्गत अभियोग पंजीकृत किया गया। इस तरह अपने ऊपर दर्ज दर्जनों मामलों को छुपाकर नामधारी जालंधर पंजाब से पासपोर्ट बनवाने में सफल हो गये। पंजाब में नामधारी का कोई आपराधिक इतिहास नहीं था। इसको देखते हुए वहां से उनका पासपोर्ट बना दिया गया। इस मामले पर पंजाब की एलआईयू (स्थानीय जांच शाखा) भी कठद्घरे में है। उस पर सवालिया निशान लग रहे हैं कि उसने नामधारी के वर्तमान निवास स्थान बाजपुर और उसके आस-पास अपनी जांच का दायरा क्यों नहीं फैलाया। क्या एलआईयू को भी किसी दबाव में लेकर जांच रिपोर्ट लिखवाई गई या उसको उत्तराखण्ड के मामले में अंधेरे में रखा गया?

 
         
 
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