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संवाद
 
^सोचूंगा गृहमंत्री रहूं या नहीं*

प्रीतम सिंह को राजनीति विरासत में मिली है। उनके पिता गुलाब सिंह उत्तर प्रदेश में मंत्री थे। प्रीतम उत्तराखण्ड की पहली निर्वाचित सरकार में मंत्री रहे और वर्तमान सरकार में ग्रामीण विकास एवं गृह मंत्रालय का दायित्व संभाल रहे हैं। उनका मानना है कि गांवों में विकास की योजनाएं बखूबी संचालित हो रही हैं। गृहमंत्री की भूमिका भी वह अच्छी तरह निभा रहे हैं। इसके बावजूद उन्हें लगता है कि गृहमंत्री के तौर पर उनके पास पूरी ताकत नहीं है। ^दि संडे पोस्ट* के रोविंग एसोसिएट एडिटर गुंजन कुमार की उनसे हुई विशेष बातचीत के मुख्य अंश%

 

प्रदेश के मैदानी इलाकों में अपराध किसी मेट्रो सिटी से कम नहीं हैं। इस पर अंकुश क्यों नहीं लग पा रहा है

अपराध को रोकने की जिम्मेदारी निश्चत रूप से गृहमंत्री गृह मंत्रालय की होती है। हमारा प्रयास है कि किसी तरह अपराध रूकें। परिस्थितिजन्य अपराध को कम करें। हमारी सरकार ने इसके लिए प्रदेश की पुलिसिंग को मजबूत करने की रणनीति बनाई है। पुलिस में राजनीतिक हस्तक्षेप न हो वह स्वतंत्र रूप से काम करें। इसे हमने प्राथमिकता में रखा है। 

 

पिछले नौ महीने में देहरादून से तीन दर्जन से ज्यादा बच्चे गुम हुए हैं। पुलिस 4-5 को ही ढूंढ़ पाई है। यह कैसी मजबूत पुलिसिंग व्यवस्था है

जो घटनाएं हुईं उन्हें हम नकार नहीं सकते हैं। इनका हमें दुख है। बच्चों की गुमशुदगी के मामले में कई बार ऐसा होता है कि बच्चे अपने मां-बाप से किसी बात से नाराज होकर घर छोड़कर चले जाते हैं। इसे भी गुमशुदगी में दर्ज किया जाता है। ऐसे मामले बढ़ने के कई कारण हैं। आज जो परिस्थितियां है उनमें बच्चों पर कई प्रकार के दबाव होते हैं। उस दबाव को बच्चे सहन नहीं कर पाते। इसी लिए घर छोड़कर कहीं चले जाते हैं। अभिभावको को भी ऐसी परिस्थितियों पर ध्यान देना होगा।

 

लापता बच्चांे को खोजने में पुलिस नाकाम क्यों हो रही है

ऐसा नहीं है कई मीसिंग बच्चों की रिकवरी भी हुई है।

 

जहां पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए प्रचार हो रहा है तो दूसरी तरफ टूरिस्टों के साथ बलात्कार और हत्या जैसी घटनाएं। ऐसे में टूरिस्ट कैसे आएंगे

यहां अन्य प्रदेशों की तुलना में कानून व्यवस्था संतोषजनक है। यहां पर्यटक आता भी इसीलिए है कि यह देवभूमि है। यहां की कानून व्यवस्था अच्छी है वातावरण अच्छा है। यहां धार्मिक पर्यटन के तहत चारधाम यात्रा पर बाहर से श्रद्धालु आते हैं और नैसर्गिक सुंदरता को निहारने भी बहुत लोग आते हैं। हम सभी को सुरक्षा देते हैं। पर्यटन स्थल पर पुलिस की व्यवस्था ज्यादा की जाती है। इन्हें प्रशिक्षिण दिया जाता है। बावजूद इसके यदा-कदा किसी टूरिस्ट के साथ कोई घटना घट जाती है। यह दुखद है। 

 

चकराता की घटना के बाद भी आप कहेंगे कि देवभूमि में पर्यटक सुरक्षित हैं

चकराता की घटना हमारे लिए चिंता का विषय है। उस घटना को गाड़ी के ड्राइवर ने अंजाम दिया। अब किसी व्यक्ति का कब कहां दिमाग खराब हो जाए क्या कहा जा सकता है। ऐसे मामले में पुलिस को भी दिक्कत होती है। भविष्य में हमारा प्रयास रहेगा कि ऐसी घटना न हो।

 

आमतौर पर पर्वतीय क्षेत्र शांत है मगर पिछले कुछ वर्षों से वहां भी क्राइम का ग्राफ बढ़ा है। क्यों

नहीं पहाड़ में अभी भी क्राइम न के बराबर है। यदा-कदा ही कोई घटना होती है। मैं कह सकता हूं कि वहां का वातावरण सुरक्षात्मक और सुखद है।

 

क्या आप इसके लिए वहां की पटवारी व्यवस्था की भूमिका को अहम मानते हैं या फिर वहां पुलिस नहीं है इसलिए क्राइम भी नहीं है

मैं इसकी वजह राजस्व पुलिस की भूमिका को नहीं बल्कि वहां के लोगों का संवेदनशील होना मानता हूं। पर्वतीय इलाके के लोग ज्यादा सीधे और सच्चे होते हैं। वे आपराधिक प्रवृत्ति के नहीं हैं।

 

आप गृह मंत्री हैं लेकिन मंत्रालय का पूरा अट्टिाकार आपको नहीं दिया गया है। क्या यह सही है

देखिए मुझे गृह मंत्रालय दिया गया है। जहां तक अधिकार भी बात है तो आईपीएस रैंक के अधिकारी मुख्यमंत्री के पास हैं। नागरिक सुरक्षा मेरे पास नहीं है।

 

लेकिन आईपीएस तो गृहमंत्री के अधीन रहना चाहिए

रहना चाहिए या नहीं रहना चाहिए यह चर्चा-योग्य प्रश्न है। मुख्यमंत्री जी ने जो अपने पास रखना उचित समझा अपने पास रखा। जो मुझे देना चाहा वह मेरे पास है। जहां तक गृहमंत्री का सवाल है यह सही है कि जो ताकत गृहमंत्री के रूप में मेरे पास रहनी चाहिए वह ताकत मेरे पास नहीं है। इसे स्वीकार करने में मुझे कोई दिक्कत नहीं है।

 

आपके पास पावर नहीं है। क्या इसीलिए पुलिस अधिकारी आपकी या कहें गृहमंत्री की नहीं सुनते

ऐसा तो नहीं है। इतना कमजोर मंत्री भी मैं नहीं हूं। लेकिन अधिकार रहने के बाद कोई काम करने में आसानी जरूर होती है और कुछ अधिकार स्वतः ही मंत्री बनने के बाद आ जाने चाहिए।

 

उत्तराखण्ड पुलिस कोई कार्यक्रम करे और उसमें गृहमंत्री को नहीं बुलाया जाए। क्या यह गृहमंत्री के पद की गरिमा को कम नहीं करता है

इसमें तो मैं स्पष्ट रूप से कहना चाहूंगा कि पुलिस के अधिकारियों ने प्रोटोकाॅल की अवहेलना की है। खासतौर से कहूं तो डीजीपी ने। मैंने इसकी शिकायत मुख्यमंत्री जी से कर दी है। भविष्य में यदि इसकी पुनरावृत्ति होती है तो मैं बर्दाश्त नहीं करूंगा।

 

मुख्यमंत्री ने भविष्य में पुनरावृत्ति नहीं होने की गारंटी दी है

मैंने अपनी बात और शिकायत दोनों उनके सामने रख दी है। 

 

यदि भविष्य में भी पुलिस गृहमंत्री के प्रोटोकाॅल का पालन नहीं करती है तो आप क्या करेंगे

मैंने कहा न मैं इसे बर्दाश्त नहीं करूंगा। भविष्य में ऐसा हुआ तो सोचूंगा कि गृहमंत्री रहूं या न रहूं।

 

प्रदेश में ग्रामीण विकास योजनाओं का लाभ अभी भी लोगों को नहीं मिल रहा है। आखिर कहां कमी है

ऐसा नहीं है। ग्रामीण विकास की सभी योजनाएं गांवों में चल रही हंै। लोगों को इनका लाभ भी मिल रहा है। पहले की तुलना में अब गांवों में ज्यादा काम हो रहा है। कारण योजनाओं का क्रियान्वयन गांव एवं ब्लाॅक स्तर पर ही हो रहा है। जिसमें आम लोगों की भी भागीदारी होती है।

 

इंदिरा आवास मनरेगा जैसी योजनाओं में रोज भ्रष्टाचार सामने आ रहे हैं। फिर आप कैसे कह रहे हैं कि इसका लाभ लोगों को मिल रहा है

जहां तक इंदिरा आवास योजना में भ्रष्टाचार की बात है तो इसके तहत बीपीएल या अंत्योदय के अंदर आने वाले लोगों का ही चयन होता है। इन्हें ही आवास दिया जाता है। इसलिए इसमें कहीं चूक का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता है। रही बात मनरेगा की तो यह मांग आधारित योजना है। इसमें जाॅब कार्ड धारक काम की मांग कर सकता है। कार्डधारक के काम मांगने के बाद उसे काम दिया जाता है। मनरेगा के तहत भी गांव का विकास हो रहा है। जहां कहीं भी भ्रष्टाचार की बात सामने आती है उसे रोकने का प्रयास किया जाता है। इसमें हम सफल भी हुए हैं।

 

मनरेगा में काम करने वाले कई लोगों को लंबे समय से मजदूरी नहीं मिली है। इंदिरा आवास में बीपीएल से बाहर के लोगों के नाम भी शामिल हैं।फिर भी कह रहे हैं कि भ्रष्टाचार रोकने में सफल हुए हैं

मनरेगा में भ्रष्टाचार को रोकने के लिए अब हम लोग ई मस्टरोल बनाकर काम करने वाले लोगों के खाते में सीधे पैसा डालने पर काम कर रहे हैं। प्रदेश में हम इसे जल्दी शुरू करने वाले हैं। भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने का यह हमारा प्रयास है। जहां तक इंदिरा आवास की सूची की बात है तो उसमें भी अब पंचायत के लोग पूरा सर्वे करते हैं। अलग-अलग चीजों के अंक दिए जाते हैं। इसके आधार पर सूची तैयार की जाती है। जैसे-जैसे पैसा आता है ऊपर से लोगों को लाभ दिया जाता है।

 

मगर यह प्रयास जमीन पर नहीं दिख रहा है

जब भ्रष्टाचार सामने आने लगा तो उस पर अंकुश लगाने के लिए ही ई मस्टरोल या फिर सीधे लोगों के खाते में पैसा जाना जैसी नीतियां बनाई गई। इसके बावजूद अगर कोई शिकायत आती है कि उस पर कार्यवाही भी होती है। 

 

आपके पास ऐसी शिकायतें आती हैं या नहीं

मैं ऐसा नहीं कहूंगा कि नहीं आती हं। जो शिकायतें मेरे संज्ञान में आती हंै उन पर तत्काल कार्यवाही करने का आदेश देता हूं।

 

मैं स्पष्ट रूप से कहना चाहूंगा कि पुलिस के अधिकारियों ने प्रोटोकाॅल की अवहेलना की है। खासतौर से कहूं तो डीजीपी ने। मैंने इसकी शिकायत मुख्यमंत्री जी से कर दी है। भविष्य में अगर इसकी पुनरावृत्ति होती है तो मैं बर्दाश्त नहीं करूंगा। ऐसा हुआ तो सोचूंगा कि गृहमंत्री रहूं या न रहूं।


 

हर सरकार पंचायतों की मजबूती की बात करती है। फिर भी पंचायत प्रतिनिधियों का रोना है कि उन्हें कोई अधिकार नहीं हैं ऐसा क्यों

मैं इससे इत्तेफाक नहीं रखता। पंचायतों की मजबूती के लिए समय-समय पर काम किया गया है। स्वर्गीय राजीव गांधी जी ने संविधान में संशोधन कर 29 विषयों को त्रिस्तरीय पंचायतों के अंदर लाने का काम किया। फिर 2002- 07 में जब केन्द्र में हमारी पार्टी की सरकार थी तो उस वक्त भी 14 विषयों को पंचायत के अंदर लाने का निर्णय लिया गया। जब हम ब्लाॅक प्रमुख हुआ करते थे उस समय तो ब्लाॅक मुख्यालय में भी पैसा नहीं होता था। कुल दो लाख रुपए पर्वतीय विकास और डेढ़ लाख रुपए अनुसूचित जाति पेयजल योजना के तहत आता था। यानि कुल साढ़े तीन लाख रुपए में ही विकास का काम करना होता था। आज तो पैसा सीधे पंचायतों के पास जाता है। हां यह जरूर है कि हमारी पूर्ववर्ती सरकार ने जिन 14 विषयों को पंचायतों में शामिल करने का निर्णय लिया था बीजेपी की सरकार बनने पर उसमें कटौती कर दी गई। हम फिर से पंचायतों को और विषय स्थानांतरित करने का काम कर रहे हैं।  

 

पंचायत चुनावों में राजनीतिक पार्टियों को प्रत्यक्ष रूप से भाग लेना चाहिए या फिर एकदम अलग रहना चाहिए

त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। फिर भी इन चुनावों में कहीं-कहीं राजनीतिक पार्टियां हस्तक्षेप करती हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है। पंचायत चुनाव में गांव के लोगों को स्वंतत्र रूप से यानी किसी पार्टी के विचार से हटकर प्रतिनिधि चुनने देना चाहिए। यह मेरा व्यक्तिगत विचार है।

 

प्रदेश के कई बड़े नेताओं के रिश्तेदार जिला पंचायतों में महत्वपूर्ण पदों पर हैं। क्या यह उचित है इस पर रोक लगनी चाहिए

राजनीति में कोई भी व्यक्ति खुद की मर्जी से नहीं आता। वह जनता से चुनकर आता है। अगर नाॅमिनेट होकर आता तब जरूर यह विचारणीय होता। आखिर संविधान में सबको चुनाव लड़ने की आजादी है।

 

दिल्ली में चर्चा चल रही है कि मनरेगा को खत्म किया जाए या फिर इसे कम किया जाए। क्या यह सही होगा

मैं मानता हूं कि मनरेगा देश में गांवों के ऐसे लोगों को रोजगार देने की गारंटी योजना है जहां गरीबी है रोजगार के कोई संसाधन नहीं हैं। इसलिए मेरा मानना है कि इसे समाप्त करना या किसी भी तरह से कम करना सही कदम नहीं है। अगर इस तरह की कोई चर्चा हो रही है तो यह गलत है। इसका हम विरोध करेंगे।

 

 

त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। फिर भी इन चुनावों में कहीं-कहीं राजनीतिक पार्टियां हस्तक्षेप करती हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है। पंचायत चुनाव में गांव के लोगों को स्वंतत्र रूप से यानी किसी पार्टी के विचार से हटकर प्रतिनिधि चुनने देना चाहिए। यह मेरा व्यक्तिगत विचार है।

 
         
 
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अमर सिंह नाम है उस शख्स का जो कुछ हलकों के शीर्ष पंक्ति पर व्याप्त हैं। आप इन्हें पॉलीटिकल मैनेजर या नेशनल लाइजनर कहकर इनको नापसंदगी के ?ksjss में डाल सकते हैं। लेकिन इनका एक दूसरा

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