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स्मृति शेष
 
ठसक वाले ठाकरे

"हाँ, मैं तानाशाह हूं, इतने शासकों की हमें क्या जरूरत है? आज भारत को तो हिटलर की जरूरत है...भारत में लोकतंत्र क्यों होना चाहिए? यहां तो हमें हिटलर चाहिए?''

''जब भी मैं दुविधा में फंसता, तो सोचता हूं कि शिवाजी ने इस समस्या पर कैसे विचार किया होगा, उनकी क्या सोच बनी होगी और उन्होंने इस पर क्या कदम उठाया होगा। तभी मैं स्पष्ट निर्णय ले पाता हूं''

''सभी लुंगी वाले अपराधी, जुआरी-अवैध शराब पीने वाले, दलाल, गुंडे, भिखारी और कम्युनिस्ट हैं- मैं चाहता हूं कि शराब पीने वाले महाराष्ट्रीय हो, गुंडा भी महाराष्ट्रीय हो, और मवाली भी महाराष्ट्रीय हो।''

             ये तमाम बातें जिस एक शख्स ने की हैं उसका नाम है बाल केशव ठाकरे जिनका पिछले १७ नवंबर को निधन हो गया। उनके निधन से मुंबई ठप रही। ये वही ठाकरे हैं जिन्होंने राजनेताओं के कत्लेआम की भविष्यवाणी की, मराठीवाद और हिन्दुत्व का जोड़ तैयार किया। महाराष्ट्रियों को शिव सैनिकों में बदला। यही नहीं शिवाजी और हिटलर का संश्लेषण भी किया। विवादों की बदौलत अपनी छवि गढ़ी। कट्टरता की तलवार भांजते हुए लोगों के दिलों में राज किया। एक कार्टूनिस्ट से सरकार के दामन में कील ठोंकने और सत्ता गढ़ने वाले बाल ठाकरे का अपना मैनरिज्म और कल्ट था जिसे किसी भी सूरत में जायज नहीं ठहराया जा सकता। उनसे असहमत हुआ जा सकता है मगर पिछले चार-पांच दशकों में मुंबई के इतिहास और राजनीति में इनको नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। क्योंकि इतिहास में महानता के साथ-साथ कट्टरता और उस कट्टरता से उपजी हिंसक द्घटनाओं की तारीखें भी दर्ज होती हैं। बाल ठाकरे पर सोचते हुए कई बार लगता है कि क्या वे उन लोगों में शुमार नहीं हैं जिन्होंने नायक और खलनायक का भेद मिटा दिया। शायद हम जिस दौर में जी रहे हैं उसने ही नायक और खलनायक के अंतर को कम कर दिया है। बाल ठाकरे खलनायक हैं, अधिनायक हैं मगर इस बात को भी पूरी तरह झुठलाया नहीं जा सकता है कि खास किस्म की मानसिकता वालों के वे नायक भी हैं। 

            बाल ठाकरे के पिता प्रबोधकर ठाकरे अपने जमाने के मशहूर पत्रकार और समाज सुधारक थे। प्रबोधकर उनका मूल नाम नहीं था। अलबत्ता अपनी पत्रिका 'प्रबोधन' के कारण ही प्रबोधकर के नाम से विख्यात हो गए। बाल केशव ठाकरे का जन्म २३ जनवरी १९२७ को हुआ और इन्होंने भी पत्रकारिता को ही अपना पेशा चुना। मगर लिखने के बजाय वे कार्टून बनाते थे। इस बात को बहुत कम लोग जानते हैं कि एक कार्टूनिस्ट के रूप में ठाकरे ने आरके लक्ष्मण जैसे महान कार्टूनिस्ट के साथ भी काम किया। दोनों 'फ्री प्रेस जर्नल' में साथ थे। ठाकरे की रेखाएं काफी स्पष्टता लिए हुए होती थी और लक्ष्मण की तरह वे अपने पात्रों के चेहरे पर विशिष्ट भाव दर्ज करने में सफल होते थे। ठाकरे को राजनीति से इस बात की शिकायत रही कि उसने उनसे कलाकार का जीवन छीन लिया जबकि अपने कलाकार व्यक्तित्व के प्रति ठाकरे बहुत संवेदनशील रहे और वे खुद को राजनेता की बजाय कार्टूनिस्ट कहलाना ही पसंद करते थे।

            बाल ठाकरे ने कभी चुनाव नहीं लड़ा कभी मंत्री-मुख्यमंत्री नहीं बने। वे केवल मुंबई में एक संगठन के प्रमुख रहे। विवादों को हवा देते रहे और एक संगठन प्रमुख बनकर सियासत में पूरी मजबूती के साथ खम्म ठोंक दिया। इन्होंने हमेशा ही लोकतंत्र का मजाक उड़ाया और हिटलर की तानाशाही को जायज ठहराया। उसी राह पर खुद चले भी बेशक भाजपा १९९० के बाद हिन्दू भावनाओं को भड़काकर देश की सत्ता तक पहुंची। लेकिन इससे पहले यह काम बाल ठाकरे ६० के दशक में ही कर चुके थे। नेहरू की नीतियों के प्रति ६० के दशक में महाराष्ट्र के भीतर जो नाराजगी उभरी थी उसे राजनीतिक रूप से बाल ठाकरे ने कैश कराया। उन्होंने साठ के दशक में जब अपना राजनीतिक जीवन शुरू किया तो उनके पास कोई राजनीतिक पार्टी नहीं थी, केवल एक मराठी साप्ताहिक 'मार्मिक' था और थोड़े से विचार थे वे भी ऐसे जिनमें स्पष्टता नहीं थी। अपनी बातों को जनता तक पहुंचाने के लिए उन्होंने 'मार्मिक' को जरिया बनाया। बड़े ही सुनियोजित ढंग से उन्होंने मध्यवर्गीय महाराष्ट्रियों में 

            उत्पीड़ित मनोवृत्ति भड़कानी शुरू कर दी। एक साप्ताहिक माध्यम से उन्होंने ऐसा माहौल रचा कि मराठीभाषियों को गैर महाराष्ट्रीय अपने विरुद्ध साजिश करते नजर आने लगे। उनका संगठन संभवतः दुनिया का एकमात्र ऐसा संगठन था जो अपने अनुयायियों के लिए एक कार्टून साप्ताहिक के पाठकों पर निर्भर था और जो रोजगारशुदा लोगों को संगठित करने से भी ज्यादा बेरोजगारों को संगठित करने में दिलचस्पी रखता था। शुरुआत में ही ठाकरे और उनकी सेना को आशातीत सफलता मिली। वर्ष १९६६ में संगठन की स्थापना की और १९६७ में हुए संसदीय आम चुनावों में उसने जबरदस्त हस्तक्षेप किया। वर्ष ६८ में मुंबई नगर निगम का चुनाव लड़कर सबसे ज्यादा वोट हासिल किए। इससे पूरा देश हतप्रभ रह गया। शिवसेना की भूमिका को महाराष्ट्र में टे्रड यूनियनों के खात्मे के रूप में भी देखा जाता है। वामपंथ का द्घोषित विरोध करते हुए शिवसेना ने टे्रड यूनियन मसले पर कम्युनिस्टों और समाजवादियों को कड़ी टक्कर दी और उन्हें खत्म कर ही दम लिया।

            बाल ठाकरे खलनायक की राह पर चलने वाले नेता थे जिन्हें उनके लोगों ने हमेशा ही नायक माना। उन्होंने नकारात्मक राजनीति की राह पकड़ी। उसी ने उनको ख्याति और ताकत दिलायी। लोकतंत्र को वह नहीं मानते थे। उनका कहना था-मतपेटी के माध्यम से हमेशा जनतंत्र का सही रूप प्रकट नहीं होता-यही कारण था कि आपातकाल में जो जनतंत्र विरोधी कदम था उसमें बाला साहेब ने इंदिरा गांधी का साथ दिया। लेकिन १९७७ में जनता पार्टी सरकार के साथ हो गए। यह उनकी राजनीतिक अवसरवादिता थी। स्वतंत्र टे्रड यूनियन आंदोलन के आक्रामक नेता दत्ता सामंत के उभार ने भी ठाकरे की लोकप्रियता को कड़ी चुनौती दी। मगर जब ऐतिहासिक सूत मिल हड़ताल की असफलता के बाद सामंत का सूर्य अस्त हो गया तो ठाकरे ने मराठीवाद के दायरे से निकल कर अपनी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं को विस्तार देने का कार्यक्रम बनाया। ८० के दशक में इस योजना के तहत भारतीय जनता पार्टी से गठजोड़ किया और वर्ष १९९८ तक आते-आते वे इस गठजोड़ के माध्यम से महाराष्ट्र की राजनीति में नंबर एक की ताकत बन गए।

           फ्रांसीसी समाजशास्त्री गेर्राड ह्यूज ने शिव सेना के चरित्र को कुछ इस तरह बयां किया है- 'शिवसेना शांति व्यवस्था के नाम पर आंदोलनों को बढ़ावा देती है। वह एक साथ 'संपूर्ण क्रांति' की बात करती है और फौजी शासन की भी। वह राजनीति में लिप्त है, लेकिन राजनेताओं से द्घृणा करने का दिखावा करती है।' महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर जोशी के शब्दों में 'बाला साहेब के जीवन का पहला चरण मराठीभाषियों के अधिकारों के लिए उनका संद्घर्ष था। दूसरे चरण में उन्होंने हिन्दुत्व पर गौर किया। इसकी शुरुआत उन्होंने १९८५ से की इसके बाद डॉ रमेश प्रभु का चुनाव हिन्दुत्व के मुद्दे पर लड़ा गया पहला चुनाव था। आगे के सभी चुनावों में हिन्दुत्व का सवाल अधिकारिक महत्व लेता गया। तीसरा चरण सरकार चलाने का है।'

           अब जब ठाकरे नहीं रहे, न उसकी ठसक। सवाल है शिव सेना का भविष्य क्या होगा? उद्धव या राज ठाकरे उनकी लकीर पर तो चल रहे हैं मगर उनकी तरह नई लकीर नहीं खींच पा रहे हैं। 

           हिन्दी सिनेमा में बाल ठाकरे की एक खास पहचान रही। वे बॉलीवुड के सितारों को हड़काते-फटकारते भी थे और उन्हें अपने द्घर मातोश्री में बुलाकर साथ शराब भी पीते थे। शुरू में उन्होंने दिलीप कुमार यानी युसुफ खान पर निशाना साधा लेकिन बाद में वे उनके मुरीद बन गए। बॉलीवुड के कई सितारे उनके दरबार में लगातार हाजिरी लगाते थे-यह सब प्रेमवश कम, भयवश ज्यादा होता था।

           इस तरह पेशे से कार्टूनिस्ट और पत्रकार, मिजाज से हिटलर, व्यवहार में शालीन लेकिन भड़काऊ तथा जहर बुझे भाषणों में पारंगत और संसदीय लोकतंत्र के प्रति युवा भाव से भरे बाल ठाकरे ने अपनी बदौलत सफलता हासिल की। वे भारतीय राजनीति में एक परिद्घटना बन गए। खास बात यह कि उनके विरोधी जिन बातों के लिए उनकी निंदा करते थे, वे उन्हीं को अपनी खूबियां मान लगातार आगे बढ़ते रहे। बगैर किसी कुर्सी पर बैठे कुर्सियों पर लोगों को बिठाते-उठाते रहे, कुर्सियों को हिलाते रहे।

 

 
         
 
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