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vad 41 02-04-2017
 
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देश
 
सियासी फांसी

इक्कीस नवंबर की सुबह देश ने ठीक से आंखें भी नहीं खोली थी और यह कोई ऐसा दिन भी नहीं था, जिसका किसी को इंतजार रहा हो। लेकिन अचानक से मीडिया ने एक ऐसा समाचार दिखाना और सुनाना शुरू किया, जिससे पूरा देश सकते में आ गया। बाल ठाकरे के गुणगान गा-गा कर थके न्यूज चैनल्स अभी आराम भी न कर सके थे कि खबर मिली कि सबेरे-सबेरे २६/११ के मुख्य आरोपी कसाब को फांसी के फंदे पर लटका दिया गया।

       २६ नवंबर २००८ को मुंबई में हुए हमले में १६६ लोग मारे गए थे। बताया गया कि २१ नवंबर की सुबह साढ़े सात बजे मुंबई की यरवदा जेल में अजमल आमिर कसाब को फांसी दे दी गई। दरअसल पांच नवंबर को ही राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कसाब की दया याचिका को ठुकरा दिया था। इसके बाद इतनी ही त्वरित गति से गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने इस फैसले पर हस्ताक्षर कर दिए। सूत्रों के अनुसार १२ नवंबर को कसाब को भी बता दिया गया था कि उसे फांसी होने वाली है। चूंकि फांसी देने की व्यवस्था आर्थर रोड जेल में नहीं थी इसके चलते उसे १९ नवंबर को यरवदा जेल में शिफ्ट कर दिया गया। ये सब इतने खुफिया तरीके से हुआ कि भारतीय मीडिया जो गणेश को दूध पिलाने और स्वर्ग की सीढ़ी तक खोजने में माहिर है उसे इसकी भनक तक नहीं लगी। 

          फांसी की खबर आम होते ही हर तरफ से बयानों की बौछार शुरू हो गई। शिंदे ने मीडिया से मुखातिब होते हुए बताया कि राष्ट्रपति महोदय की तरफ से कसाब की दया याचिका खारिज करने की सूचना मिलते ही हमने तय समय के अनुसार फांसी की सजा देने की प्रक्रिया पर कार्रवाई की। कसाब के मृत शरीर को अगर पाकिस्तान मांगता तो हम दे देते लेकिन उन्होंने इसकी मांग नहीं की। इसलिए उसे यहीं दफना दिया गया है। पाकिस्तान को इसकी इत्तला कर दी गई है। कांग्रेस इस पूरे प्रकरण में बड़ा संभल कर बयान देती हुई नजर आई। ज्यादातर कांग्रेसी नेता इसे सत्संगी अंदाज में न्याय की जीत और बुरे काम का बुरा नतीजा द्घोषित करते हुए दिखाई पड़े। बेमतलब शोहरती बयान देने के लिए मशहूर  कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह तक ने इस पर बड़ा संभल कर प्रतिक्रिया दी और संकेत भी दिया कि जल्द ही अफजल गुरू को भी नंबर पर लिया जाएगा। 

मुंबई हमले के दोषी कसाब को फांसी देकर कानून ने अपना काम किया है। लेकिन जिस तरह से उसको आनन-फानन और गुप-चुप ढंग से फांसी दी गई। और फांसी के बाद पूरा देश मर्दानगी के भाव से भर गया। इसे लेकर बहसें शुरू हो गईं और लोग-बाग इस फांसी में सियासत भी देख रहे हैं

          हिन्दुत्व भावनाओं की वाहक भाजपा एक बार फिर इस द्घटना के बाद कांग्रेस के दांव में फंसी हुई नजर आई। चूंकि एक कांग्रेसी राष्ट्रपति की त्वरित कार्रवाई से कसाब को जल्द से जल्द लटकाया गया तो भाजपा इसकी खुलकर तारीफ भी नहीं कर सकती थी और अपने वोट बैंक के चलते चुप रहने का तो सवाल ही नहीं उठता। मगर उसे एक चुनावी मुद्दा अपने हाथ से निकलता मालूम हुआ। ऐसे में भाजपा के अल्पसंख्यक चेहरे मुख्तार अब्बास नकवी  को मैदान में उतारा गया। उन्होंने कहा कि यह उन लोगों के लिए चेतावनी है जिन्होंने भारत में आतंक फैलाने की साजिश की है। इसके अलावा यह उन लोगों लिए अच्छी खबर है जो २६/११ के हमले से पीड़ित हुए। यह एक ऐसा बयान था जिसमें किसी को क्रेडिट देने से साफ बचा गया जो कि भाजपा के लिए बहुत जरूरी था। लेकिन इसके बाद ही शुरू हुआ असली खेल। जिसके लिए इस फैसले को इस तरह से अंजाम दिया गया था। सभी जानते हैं कि कसाब, आतंकवाद और पाकिस्तान कुछ ऐसे शब्द हैं जिनके जबान से निकलते ही भारतीयों खासकर शहरी मध्यवर्ग के भीतर का राष्ट्रवाद कुछ ही क्षणों में अपने चरम पर पहुंच जाता है। इसमें भारतीय मीडिया का योगदान भी हमेशा से अभूतपूर्व रहा है। बस कांग्रेस को अपनी सभी परेशानियों से उबरने के लिए चाहिए भी यही था। इसी के चलते सभी कुछ इतने खुफिया तरीके से अंजाम दिया गया। 

          कसाब की इस फांसी से कांग्रेस ने एक ही चाल में राष्ट्रावाद की भावना को अपने पक्ष में झुका लिया। इसके साथ ही उसके खिलाफ देश के मध्यवर्ग में व्याप्त नेगेटिव भावना को काफी हद तक काबू में कर लिया। कांग्र्रेस ने भी पहली बार सांप्रदायिक कार्ड नहीं चला है। १९८६ में अयोध्या में लटके ताले को खोलकर राजीव गांधी ने ही उग्र हिन्दुत्व का नया अध्याय खोला था। आंदोलन के चरम पर पहुंचने तक कैसे कांग्रेस खामोश रहकर सब देखती रही और विवादित ढांचा गिराकर भाजपा सत्ता में तो आ गई लेकिन अगले चुनावों में उसके पास चुनाव लड़ने का कोई मुद्दा ही नहीं बचा। अभी जल्दी ही २६ नवंबर को भाजपा फिर कसाब का नाम लेकर कांग्रेस को कोसने के लिए जी-जान से तैयार  हो रही थी लेकिन एक बार फिर कांग्रेस ने मुद्दा तो खत्म किया ही, इस पूरे प्रकरण और भावनात्मक उफान से कुछ नंबर भी हासिल कर लिए। हालांकि कांग्रेस के संकटमोचक से राष्ट्रपति बने प्रणब मुखर्जी ने एक बार फिर अपने इस फैसले से कांग्रेस के संकटमोचक की भूमिका निभाई है। साथ ही यह सवाल भी उठ रहा है कि क्यों अचानक कई दया यचिकाओं को होल्ड पर रख उन्होंने कसाब पर ही फैसला सुनाने की जहमत उठाई। अगर सब कुछ प्रक्रियागत ही था तो सरकार इतनी आसानी से मीडिया से सब छुपा कैसे ले गई या इसी फैसले को इतना स्पेशल ट्रीटमेंट क्यों दिया गया। भले ही कसाब को फांसी देकर कांग्रेस ने चुनावी दांव खेला है। मगर न तो इस फांसी से आतंकवाद का अध्याय समाप्त हुआ है, न राष्ट्रवाद की भावना से लबरेज लोग कांग्रेस के भक्त हो जाएंगे। सियासत अपनी ही राह चलेगी, यह तय है।

 

 

 

 

 

 
         
 
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