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खेल-सिनेमा
 
सानिया की सान

साल के अंत में डब्ल्यूटीए टूर्नामेंट में जीत के साथ सानिया ने देश का माथा ऊंचा किया। सानिया और जिम्बाब्वे की कारा ब्लैक की जोड़ी ने सीधे सेटों में गत चैम्पियन पेंग शुआई और सीह सू वेई को एक तरफा ६-११ ६-० से इस मुकाबले में मात देकर टूर्नामेंट अपने नाम कर लिया। इसके साथ ही सानिया कि झोली में खिताब शामिल हो गया। सानिया की इस ऐतिहासिक जीत की बधाइयों का तांता लग गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न सिर्फ उन्हें बधाई दी बल्कि उनके नाम एक ट्वीट कर लिखा सानिया को डब्ल्यूटीए फाइनल्स खिताब जीतने पर हमारी ओर से बधाई। आपने एक बार फिर हमें गौरवान्वित किया है। प्रधानमंत्री के अलावा राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने उनकी सफलता पर शुभकामनाएं दीं और उनके अच्छे भविष्य की कामना की। इस तरह सानिया के प्रदर्शन और कॅरियर में अब 'सान' चढ़ गया लगता है।

 

भारतीय खिलाड़ी के रूप में सानिया का डब्ल्यूटीए फाइनल्स में जहां यह पहला और ११वीं बार इस टूर्नामेंट में खेल रही कारा का यह तीसरा खिताब है। कारा ने यहां २००० से लेकर २००९ तक लगातार १० बार शिरकत की थी और लिजेल ह्यूबर के साथ २००७ और २००८ में खिताब जीते थे। फाइनल्स से पहले उनका इस टूर्नामेंट में १२-० का बेहतरीन रिकॉर्ड था। लेकिन खिताबी मुकाबले में गत चौंपियन जोड़ी आश्चर्यजनक रूप से द्घुटने टेक गई। सीह और शुआई के खिलाफ सानिया और कारा का कॅरियर रिकार्ड अब ३-०३  का हो गया है। एक तरह से कहा जाए तो इससे पहले सेमी फाइनल में उनकी राह आसान था फिर भी इस जोड़ी ने चेक गणराज्य की क्वेता पेश्के और स्लोवेनिया की कैटरीना स्रेबोट्निक को ९-४ ९-११ ६-४ से हराया। तीसरे सेट में एक समय ९-६ से पिछड़ चुकी इस जोड़ी ने आखिरी लम्हों में शानदार वापसी की और खिताब जीतने की अपनी उम्मीद को बरकरार रखा था। पहला सेट जीत चुकी क्वेटा और स्रेबोटनिक कि जोड़ी दूसरे सेट में ४-३ से पिछड़ने के बाद वापसी करने में कामयाब रही थी और सेट का फाइनल टाई ब्रेक में हुआ था। फाइनल में दोनों ने अपनी प्रतिद्वंद्वी जोड़ी को मात्र  मिनट में पस्त कर दिया और अपनी जोड़ी और उस पल को यादगार बना दिया।

 

यह इत्तेफाक है कि सानिया मिर्जा इस टूर्नामेंट को खेलने के लिए इंचियोन में हुए एशियाई खेलों में भाग नहीं लेना चाहती थीं ताकि उनकी विश्व रैंकिंग पर असर नहीं पड़े। लेकिन सानिया युगल रैंकिंग में अपने छठे स्थान को बरकरार रखने में कामयाब हुईं। टूर्नामेंट से पहले सानिया काफी नर्वस थीं। सानिया के पिता इमरान मिर्जा के मुताबिक जब दूसरे बड़े खिलाड़ियों ने एशियाई खेलों में नहीं जाने का फैसला किया तो उनकी बेटी ने देश के लिए खेलने का फैसला किया। इस तरह वह देश को स्वर्ण पदक दिलाने में कामयाब हुई हैं।

 

टेनिस कोर्ट पर उनके और कारा के इस ऐतिहासिक जीत का एक दुखद पहलू यह भी है कि आगे से दोनों कि यह जोड़ी एक दूसरे के साथ नहीं खेलेंगी। इन तरह दोनों का यह अंतिम टूर्नामेंट रहा। आने वाले सीजन में सानिया ने चीनी ताइपे कि सु वे हेश के साथ जोड़ी बनाने का फैसला किया है वहीं कारा ब्लैक का अब ज्यादातर समय अपने परिवार के साथ बीतेगा। साल भर आए लगातार सुधार के कारण सानिया काफी उत्साहित है। उनकी अगली प्रतियोगिता इंटरनेशनल प्रीमियर टेनिस लीग (आईपीटीएल) के लिए होगा जिसमें वह स्विस चैम्पियन रोजर फेडरर की टीम में होंगी। आईपीटीएल में भारत सहित चार फ्रेंचाइजी अगले माह होने वाली इस प्रतियोगिता में भाग ले रही हैं। प्रतियोगिता में रोजर फेडरर के अलावा नोवाक जोकोविच एंडी मरे और पीट सम्प्रास आदि बड़े खिलाड़ी शामिल होंगे।

 

सानिया के लगातार परफॉर्मेंस में लगातार आ रहे सुधार से उत्साहित होना लाजिमी है। एक तरह से यह सत्र उनके लिए काफी अच्छा रहा। असल में एक टेनिस खिलड़ी के रूप इस साल जो एक खिलाड़ी हासिल करना चाहता है उन्होंने इस दौरान हासिल किया। आने वाले वक्त में भी सुधार होने की संभावनाएं बढ़ गई हैं। हालांकि उन्हें विश्व में सर्वश्रेष्ठ बनने में वक्त् लगेगा।

हबीब उर रहमान

 


खलनायक नहीं नायक था वो

 

फिल्मी दुनिया में खलनायकी के हर आयाम को छूने वाले सदाशिव अमरापुरकर अब दुनिया को अलविदा कह चुके हैं। बीते ३ नवंबर को फेफड़ों में फैल चुके इंफेक्शन की वजह से उन्होंने मुंबई के कोकिला बेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल में अंतिम सांसें लीं। महाराष्ट्र में जन्मे सदाशिव आखिरी बार किसी खलनायकी के रोल के लिए नहीं बल्कि समाज के हित में उठाए गए एक बेहद सराहनीय कदम के कारण मीडिया की सुर्खियों में आए थे। वर्ष २०१३ में होली के दिन कुछ मुंबईकरों से तब उनकी तीखी बहस हो गई जब रेन डांस कर रहे उन लोगों से अमरापुराकर ने पानी बचाने के लिए इस तरह के कार्यक्रमों को बंद करने का अनुरोध किया। मामले ने इतना तूल पकड़ा कि बात हाथा-पाई तक पहुंच गई। इस झगड़े को कवर करने पहुंची मीडिया से वह इसी दौरान रू-ब-रू हुए थे। यह एक छोटा सा वाकया है जीवन भर रील लाइफ में खलनायकी करने वाले सदाशिव अपनी रियल लाइफ में एक समाज सेवक थे। वह कई सामाजिक संस्थाओं से जुड़कर महाराष्ट्र में कई सामाजिक कार्यों में अपना सहयोग दिया करते थे। 

 

अमरापुराकर ने अभिनय की शुरुआत मराठी थिएटर से की। थिएटर में अपनी अभिनय की कला को तराशने के बाद मराठी फिल्म '२२ जून १८९७' में बाल गंगाधर तिलक के किरदार के साथ फिल्मी दुनिया में कदम रखा। बॉलीवुड में धर्मेंद्र इन्हें अपने लिए बहुत लकी मानते थे क्योंकि इनके साथ की गई एक के बाद एक फिल्में हिट हुईं। इनके सटीक अभिनय का अंदाजा इस बात से ही हो जाता है कि इनकी पहली हिंदी फिल्म 'अर्धसत्य' में ही इन्हें फिल्मफेयर मिल गया। अपने फिल्मी कॅरियर में इन्होंने ३०० से भी ज्यादा फिल्मों में काम किया। जिनमें अधिकतर फिल्में हिंदी थी। इसके अलावा इन्होंने मराठी हरियाणवी बंगाली और उड़िया फिल्मों में भी काम किया। सभी अभिनेता अपने जीवन में एक न एक ऐसा किरदार कर जाता है जो शायद उसी के लिए गढ़ा गया होता है। महेश भट्ट निर्देशित 'सड़क' में महारानी का किरदार अमरापुराकर के अभिनय का ऐसा मील का पत्थर है जिस तक पहुंचना सबके बस की बात नहीं होगी। एक ऐसे विलेन के रोल ने जो पुरुष और महिला के बीच की कोई कड़ी था फिल्म फेयर की ज्यूरी को इतना प्रभावित किया कि उन्हें वर्ष १९९३ में इनके लिए बेस्ट एक्टर इन ए निगेटिव रोल की एक अलग कैटेगरी ही बनानी पड़ी। 

 

अपने फिल्मी कॅरियर के अंतिम पड़ाव में सदाशिव ने खलनायकी छोड़ कर कॉमेडी की ओर रुख किया। एक कॉमेडियन के रूप में उन्हें याद करें तो सबसे पहले जहन में 'इश्क' का वह बाप नजर आता है जो अपने बेटे की शादी अमीर लड़की से कराने के लिए दुनिया भर के पापड़ बेलता है। इसके अलावा 'कुली नंबर वन' 'आंटी नंबर वन' और 'आंखें' जैसी सुपरहिट फिल्मों के लिए भी इन्हें हमेशा याद किया जाएगा। बॉलीवुड में इनका आखिरी बार वर्ष २०१२ में आई फिल्म 'बॉम्बे टाकीज' में दिखाई दिए। 

 

सामाजिक कूत्या दन्यता समिति अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति स्नेहलया लोकशाही प्रबोधन व्यासपीठ अहमद नगर ऐतिहासिक वास्तु संग्रहालय  य़े सदाशिव की फिल्में नहीं बल्कि वे सामाजिक संस्थाएं है जिनके साथ मिल कर वह समाज सुधार के कई कामों में लगे रहते थे। पर्दे पर विलेन पर्दे के गिरते ही कैसे हीरो बन जाता है सदाशिव इसका एक उदाहरण हैं। कई सिने हस्तियों ने इनको समाज के प्रति अपने दायित्वों को निभाते देख कर प्रेरणा ली और ऐसे कार्यों से खुद को जोड़ा। लंबी बीमारी के बाद इस दुनिया को छोड़ कर चले जाना जितना बड़ा नुकसान बॉलीवुड के लिए है उतना ही बड़ा नुकसान समाज के लिए भी है। सदाशिव एक अभिनेता के तौर पर तो हमेशा लोगों को याद रहेंगे ही साथ ही एक समाज सुधारक के रूप में भी इन्हें लोग याद करेंगे।

रवि जोशी

 
         
 
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