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गढ़वाल एक नज़र
 
ललित केशवान को सम्मान

 

देहरादून। गढ़वाली भाषा के कवि ललित केशवान को गांधी पीस फाउंडेशन नई दिल्ली में ११ नवंबर को दिल्ली पैरामेडिकल इंस्टीट्यूट की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में 'कन्हैया लाल डंडरियाल स्मृति साहित्य सम्मान' से नवाजा गया। पुरस्कार के तौर पर केशवान को प्रशस्ति पत्र, शॉल और २१ हजार रुपए प्रदान किए गए। गौरतलब है कि दिल्ली पैरामेडिकल इंस्टीट्यूट ने प्रख्यात गढ़वाली कवि कन्हैया लाल डंडरियाल की स्मृति में इस पुरस्कार समारोह की शुरुआत की है। कार्यक्रम की अध्यक्षता गढ़वाली के जाने-माने कवि प्रेमलाल भट्ट ने की। केशवान को पुरस्कार की राशि और प्रशस्ति पत्र मुख्य अतिथि लोकगायक नरेन्द्र सिंह नेगी ने प्रदान किए। केशवान मूलतः पौड़ी के रहने वाले हैं। केशवान की गढ़वाली भाषा में अब तक कई कूतियां प्रकाशित हो चुकी हैं। इस कार्यक्रम में लोकगायक चन्द्र सिंह राही, वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र धस्माना, दिल्ली पैरामेडिकल इंस्टीट्यूट के निदेशक विनोद बछेती और डंडरियाल जी की पत्नी भी मौजूद रहीं। इस अवसर पर कई कवियों ने अपनी रचनाएं भी लोगों के सामने प्रस्तुत की।

 

पटाखों की दुकान में आग  

टिहरी गढ़वाल। सुमन मार्केट में दीपावली के लिए पटाखों से सजी तीन दुकानों में १२ नवंबर को आग लग गई। तीनों दुकानों के करीब साढ़े तीन लाख रुपये तक का नुकसान आंका जा रहा है। द्घटना में किसी को चोटें नहीं आई हैं। सूत्रों के अनुसार शाम करीब चार बजे सुमन मार्केट के प्रांगण में विजयपाल राणा, यशपाल चौहान व शेखरानंद सकलानी ने आतिशबाजी की दुकानें लगा रखी थीं। अचानक कहीं से एक दुकान में जलता हुआ रॉकेट पहुंचा, जिससे देखते ही देखते पहले एक दुकान में रखे पटाखों में आग लगी फिर दूसरी और फिर तीसरी पटाखों की दुकान में आग के हवाले हो गई। लगभग १५ मिनट में तीनों दुकानें जलकर पूरी तरह से राख में तब्दील हो गईं। द्घटना के दौरान आलम यह रहा कि पटाखों की दुकानें जलती रहीं, लेकिन महज पांच सौ मीटर की दूरी पर स्थित फायर सर्विस की गाड़ी और कर्मी जब तक मौके पर पहुंचे तब तक तीनों दुकानें जलकर राख हो गई थीं। उल्लेखनीय है कि दीपावली पर्व से पूर्व आतिशबाजी की दुकानों के लिए प्रशासन जहां दुकानदारों को लाइसेंस जारी करता है, वहीं सुरक्षा व्यवस्थाओं का जिम्मा अग्निशमन विभाग का रहता है। सुमन मार्केट में लगी आग के दौरान न तो दुकानों में ही सुरक्षा के कोई इंतजाम किए गए थे और न ही विभाग के स्तर से इस क्षेत्र में किसी वाहन आदि की व्यवस्था ही की गई थी। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि विभाग अपने कार्यों के प्रति किस कदर लापरवाह है। 

 

चारधाम के कपाट बंद 

उत्तरकाशी। गंगोत्री धाम के कपाट १४ नबंबर को शीतकाल तक के लिए बंद कर दिए गए। उधर यमुनोत्री और रुद्रप्रयाग जिले में केदारनाथ के कपाट १५ नवंबर को भैयादूज के दिन शीतकाल के दौरान बंद कर दिए गए हैं। इसी तरह चमोली जिले में बदरीनाथ के कपाट भी १८ नवंबर को बंदद्ध हो रहे हैं। गंगोत्री में दीपावली अगले दिन सुबह दस बजे से दोपहर बारह बजे तक श्रद्धालुओं ने गंगा की निर्वाण दर्शन किए। इस दौरान तीर्थ पुरोहितों ने विशेष पूजा व गंगा लहरी पाठ किया। इसके बाद गंगा की भोगमूर्ति को गर्भगृह से बाहर निकाला गया और कपाट बंद कर दिए गए। इस मौके पर पांचवीं गढ़वाल रेजीमेंट के बैंड की धुन और परंपरागत ढोल दमाऊं की थाप के साथ तीर्थ पुरोहित गंगा के शीतकालीलन प्रवास मुखबा गांव की ओर पैदल रवाना हुए। यमुनोत्री मंदिर के कपाट भी भैया दूज के दिन दोपहर बाद अनुराधा नक्षत्र में बंद कर दिए गए। समिति के सचिव पं  . खिलानंद उनियाल ने बताया है कि यमुना के मायके खरसाली गांव से शनिदेव की डोली के साथ श्रद्धालु सुबह आठ बजे यमुनोत्री धाम के लिए रवाना हुए। अब शीतकाल में छह माह तक यमुना के दर्शन उनके मायके खरसाली गांव में श्रद्धालु कर सकेंगे। रुद्रप्रयाग जिले में स्थित ग्यारहवें ज्योर्तिलिंग केदारनाथ के कपाट भी शीतकाल के लिए बंद कर दिए गए।

 

गंगनहर के लिए बजट नहीं 

रुड़की। गंगनहर के वार्षिक अनुरक्षण के नाम पर २२ अक्टूबर से ही गंगनहर को उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग ने बंद किया हुआ है। इस बार गंगनहर आधुनिकीकरण परियोजना के अन्तर्गत बनाई गयी पुल जटवाड़ा से रुड़की तक की नहर के लिए विभाग ने कोई बजट जारी नहीं किया है। अलबत्ता पुरानी गंगनहर की मरम्मत के लिए केवल १७ लाख का बजट जारी हुआ है। इसमें भी गंगनहर की सफाई नहीं बल्कि नहर के किनारों, द्घाटों, पुलों और सड़कों की मरम्मत किया जाना शामिल है। इस नहर क्लोजिंग में तीन जेसीबी मशीनों ने केवल गंगनहर और इसके किनारों पर बेतरतीब पड़े गर्डरों को ही व्यवस्थित किया है। नहर सफाई के लिए कोई बजट न मिलने पर सिंचाई विभाग उत्तर प्रदेश के अधिकारियों ने नहर की सिल्ट निकालकर उसकी क्षमता को बढ़वाने के लिए क्षेत्रीय किसानों को रेत उठाने की अनुमति दी थी। उनका मानना था कि रेत निकाले जाने से बिना पैसे ही नहर की क्षमता को ठीक करा लिया जाएगा। इस विभागीय निर्णय के बाद बंद पड़ी गंगनहर से खनन माफियाओं की पौबारह हो गयी है। रुड़की से बाहर निकलते ही कई जगहों से रेत खनन कर ले जाया जा रहा है।

 

 
         
 
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  • रवि जोशी

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