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लोकवाणी
 
पहली चुनाव पार्टी की यात्रा

आजादी के छह दशक बाद भी भारत के सीमांत गांवों के हालात दयनीय बने हुए हैं। विधानसभा चुनाव २०१२ के लिए पिथौरागढ़ जनपद के चीन सीमा पर स्थित धारचूला के सुमदुम गांव में पहली बार पोलिंग बूथ बनाया गया। मेरी नियुक्ति बतौर पीठासीन अधिकारी ५३ राजकीय प्राथमिक विद्यालय सुमदुम नामक पोलिंग बूथ में हुई। २७ जनवरी २०१२ को दो चरणों की ट्रेनिंग प्राप्त करने के बाद १२ बजे पोलिंग पार्टी संख्या ७७ सुमदुम के लिए रवाना हुई। मेरे साथ सुभाष सिंह लीलाधर जोशी विपिन चन्द्र बडौला एवं पुलिसकर्मी तुलसी प्रसाद होम गार्ड सुरेंद्र सिंह एवं आईटीबीपी के जवान दिपेंद्र सिंह थे। जीप में १२ बजे दिन में धारचूला से प्रस्थान किया ३६ किमी सोबला पहुंचे। इस बीच दो बार जीप गिरते-गिरते बच गई तत्पश्चात १६ किमी सोबला के लिए पैदल प्रस्थान किया। ८ किमी तक रास्ते एक से डेढ़ फिट बर्फ से ढके थे। रास्ता नजर ही नहीं आ रहा था इसी बीच पोलिंग पार्टी  दो भाग में बंट चुकी थी। हमारे साथ आईटीबीपी के जवान दिपेंद्र सिंह चल रहे थे पुलिस एवं होम गार्ड के सिपाही पीछे मजदूर जो बिस्तर ला रहे थे उनके साथ थे। रास्ते में तीजम में पहला पुल क्षतिग्रस्त था उसके पार करते ही रास्ता बर्फ से पटा था रास्ता नजर ही नहीं आ रहा था। ३ कच्चे पुल क्षतिग्रस्त थे। बडे़-बडे़ पत्थरों से चढ़ते हुए आगे बढ़ते जा रहे थे। सायं ६ बजे ग्राम परहरी कूष्ण सिंह ने कहा साहब पीछे की पार्टी राह भटक जाएगी। मैं यहीं उनका इंतजार करता हूं। आप नदी के साथ-साथ बने कच्चे रास्ते से आगे चलते चले जाएं।

 

चारों लोग आगे बढ़ते चले गए सायं साढ़े छह बजे आगे बढ़ते चले गए तो बर्फ से रास्ता ही नहीं दिखा। इसी बीच भालू के गुर्राने की आवाज सुनाई दी। आईटीबीपी के जवान ने कहा साहब देखो भालू के पांव के निशान के साथ ही रास्ते में खून ही खून दिखाई दे रहा है। शायद कुछ दूर भयानक भालू है। कुछ पल रूकने के बाद हम आगे बढ़ने लगे। तभी मैं सोचने लगा हमारी सुरक्षा के लिए सरकार ने जो सुरक्षाकर्मी दी है उनके पास कोई हथियार भी नही हैं हथियार तो छोड़ों एक डंडा भी नहीं हैं। जबकि अधिकारी वर्ग के टे्रनिंग के समय बड़ी-बड़ी सुरक्षा की बातें की गई थीं।

 

हम आगे बढ़ते चले गए अब तृतीय अधिकारी ने कहा साहब! मुझे कम दिखाई देता है। अब हमारे सामने और अधिक परेशानी थी। तेजी से कदम बढ़ाने को मैंने कहा। अब रात के साढ़े सात बज चुके थे बर्फ की चमक से आंखें भी दर्द करने लगी थीं। अनुमान के सहारे आगे बढ़ने लगे। तभी मेरा पांव किनारे रास्ते चला गया द्घुटने से ऊपर तक बर्फ में धस चुका था किसी तरह पांव निकालकर आगे बढ़ने लगे। एक टिन की छत वाला भवन मिला। हम सभी खुश थे चलो पहुंच गए। लेकिन आगे कोई मकान नहीं था हम आगे २ किमी और आगे चलते गए। किसी तरह ८ ़३५ बजे हम राप्रावि सुमदुम पहुंचे। स्कूल की छत में एक फिट से अधिक बर्फ जमी थी चारों तरफ बर्फ ही बर्फ था। सुमदुम गांव के लोगों के लिए हम सभी सरकारी बडे़ अधिकारी थे बच्चे महिला युवा वर्ग सभी हमें देखने आ गए। सुमदुम गांव में पहली बार चुनाव पार्टी पहुंची थी। कई लोग कह रहे थे अब हमारे गांव का विकास होगा जरूर साहब लोग जो आ गए।

 

ग्राम प्रहरी हमारे खाने का प्रबंध करने लगा। एक द्घंटे बाद पीछे चल रहे हमारे सभी टीम के सदस्य आ चुके थे। ठंड के कारण हमारे हाथ-पांव सुन पड़ गए थे। किसी तरह रात्रि के ११ बजे खाना खा कर सोने का प्रबंध ग्रामीणों ने किया। सभी सदस्य थक कर चूर थे। पांव दर्द काफी होने लगा। हम सामान्य जूतों में वहां पहुंचे थे जिस कारण जूते बर्फ को सहन न कर सके और शहीद होने को तैयार थे।

 

प्रातः काल का नजारा देखते बना था सूर्य भगवान गर्मी के साथ प्रकट हुए। देखा चारों ओर बर्फ पड़ी है। ठंडी हवा चल रही थी। गांव के लोगों के लिए हम कौतूहल का विषय थे। अब गांव के बुजुर्ग हाथ जोड़ कर कहने लगे साहब चलो सरकार ने अच्छा किया जो बूथ यहां बना दिया। आज पहली बार हमारी कई महिलाएं वोट डालेंगी। इन्हें कैसे वोट डालते हैं बता देना साहब।

 

कुछ युवाओं में आनंद सिंह बिष्ट एवं दुर्गा सिंह ने कहा साहब एक सैटेलाइट फोन लगा दो सड़क बना दो बिजली के खम्बे पांच साल पहले लगे थे उनमें तार लगाकर लाइट लगा दो। साहब हमारा कूषि के खेत खलियान भालू सब चौपट कर देता है। कूष्ण सिंह कहते हैं कि पिछले सप्ताह तीन बैल एवं दौलत सिंह के एक गाय को भालू ने मार डाला था। साहब हमारे गांव के १५-२० बच्चे हाईस्कूल पास हैं इन्हें नौकरी में लगा दो साहब। हमारे गांव में एक ही सरकारी नौकरी में है जो आंगनबाड़ी कूति है। साहब गांव में ३५ परिवार हैं सभी बीपीएल कार्डधारक हैं। राजकीय प्राथमिक विद्यालय सुुमदुम में ३५ बच्चे एवं मात्र एक पैराटीचर के सहारे स्कूल लम्बे समय से संचालन हो रहा है। भारत के अंतिम गांव सुमदुम के स्कूल की दशा बहुत ही दयनीय बनी हुई है। कब सुधरेगी कहा नहीं जा सकता।

 

साहब यारसागम्बू (कीड़ा जड़ी) जो सामने के हिमालयी पहाड़ हमारे वन पंचायत हरदैयलोताल से मई-जून के माह में गांव के युवाओं द्वारा हिमालय के पर्वत से मेहनत कर लाते हैं और इसको बिक्रीकर परिवार का पालन पोषण करते हैं यह युवाओं के मुख्य आय का साधन बना है। सरकार भी इसमें प्रतिबंध लगा देते हैं। हमें यारसागम्बू का उचित दाम नहीं मिल पाता है। साहब सुमदुम गांव में २९ परिवार दानू एव ६ परिवार बिष्ट हैं यहां २८० मतदाता हैं। साहब भूस्खलन से पिछले साल तीन महीने तक रास्ता बंद था कभी-कभी भूखे रहने की नौबत आ जाती है। साहब आप तो बडे़ अधिकारी ठहरे हमारे बच्चों के लिए कुछ तो कर ही देना। चुनाव के दिन प्रातः ८ बजे से ही बड़ी संख्या में पुरुष एवं महिलाओं ने पहली बार अपने बूथ में मत का प्रयोग किया। कुल १९२ मतदान ६८ प्रतिशत रहा। दूसरे दिन जनता ने मतदान कर्मचारियों को विदाई दी मानो दुल्हन विदा हो रही हो। साथ ही ग्रामीणों का कहना था साहब एक सेटेलाइट फोन एवं बिजली जरूर लगा देना आगे भी जरूर आना। शायद यही हिन्दुस्तान का गांव है।

 

राजेश मोहन उप्रेती

राजकीय इंटर कॉलेज गुरंगचड़ पिथौरागढ़

 

अभावों का राज्य मिजोरम

भारत का एक छोटा-सा पहाड़ी राज्य है मिजोरम। मिजोरम का मतलब होता है-पहाड़ी लोगों की जमीन जो कि इस प्रदेश के नाम के साथ सही भी है। लेकिन पूर्वोत्तर में धर्मांतरण बहुत हुआ। आदिवासी समाज को अंग्रेजों ने धर्मांतरित किया। यही कारण है कि जहां-जहां आदिवासी समाज है उनको अंग्रेजों ने इसाई  बहुल समाज बना दिया है। अंग्रेजों ने जब इस देश पर अधिकार किया तो यह उनका सबसे बड़ा हथियार था कि कमजोर समाज की नस को पकड़ो और अपने साथ जोड़ो। अंग्रेजों के आने से पहले यहां डेढ़ सौ-दो सौ गांव के आदिवासी प्रमुख यहां की सत्ता पर काबिज थे। अंग्रेजों ने उनका धर्म बदला और अपना  काम साधा। मिजोरम की जनसंख्या लगभग दस लाख होगी लेकिन हिन्दू समाज की संख्या मात्र कुछ ही हजार है। ८५ प्रतिशत से भी अधिक आदिवासी समाज का धर्मांतरण कर दिया गया। सुखद बात यह है कि यह छोटा राज्य शिक्षा की दृष्टि से केरल के बाद दूसरा स्थान देश में पाता है और इसमें निःसंदेह भूमिका  इसाई मिशिनरियों की है जिन्होंने यहां शिक्षा का प्रसार किया। उत्तराखण्ड में जहां साक्षरता का प्रतिशत ७९ है वहीं मिजोरम में ९४ प्रतिशत है। मेरे गृह जनपद पौड़ी से कुछ ही बड़ा होगा। इसमें आठ जिले हैं यहां फिर भी अभावों का राज्य कहा जा सकता है। पूर्वोत्तर का सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण राज्य है मिजोरम। यहां का विकास किया जाना जरूरी है और जनता को राष्ट्रीय धारा में सम्मिलित किया जाना जरूरी भी है।

मोहन सिंह रावत गांववासी

पौड़ी गढ़वाल

 

 

 

महापर्व

लोकतंत्र का महापर्व है।

नेताओं पर हमें गर्व है।

 

हम सब का मतदान फर्ज है।

नेताओं पर यही कर्ज है।

 

हमसे रूठो गर हिम्मत है।

हमारे हाथों में ताकत है।

 

मतदाता हैं हमें गर्व है।

लोकतंत्र का महापर्व है।

 

मंगलमय अति यह दंगल है। 

इससे ही भारत का कल है।

 

भारतीय हैं हमें गर्व है।

लोकतंत्र का महापर्व है।   

लक्ष्मी दत्त पंत 

बलुवाकोट पिथौरागढ़

 

सबसे फिसड्डी शिक्षा विभाग

उत्तराखण्ड में रमसा एवं सर्व शिक्षा अभियान में नियुक्ति करना शिक्षा महकमे के लिए डेढ़ी खीर साबित हो रहा है। आउटसोर्सिंग की नीति अपनाने के बाद सबसे अधिक फिसड्डी यदि कोई विभाग साबित हो रहा है तो वह है शिक्षा विभाग। आज आलम यह है कि विभाग आउटसोर्सिंग एजेंसियों तक का चयन नहीं कर पा रहा है और जिन जनपदों में आउटसोर्सिंग एजेंसियां चयन कर भी ली गई हैं वहां पर प्रक्रिया विवादों के द्घेरे में है। चमोली जनपद में आलम यह है कि वित्तीय वर्ष के अंत में आउटसोर्सिंग एजेंसी को नियुक्ति का ठेका दिया गया जिस पर उक्त एजेंसी ने सिक्योरिटी मनी के नाम पर चयनित अभ्यर्थियों को खूब लूटा। दो माह के बाद वित्तीय सत्र समाप्त हो गया। बिना मानदेय दिए चयनित अभ्यर्थियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया। बाहर किए गए कार्मिकों ने जिला कार्यालय पर धरना प्रदर्शन किया। अब पुनः अक्टूबर माह में एक नई एजेंसी से अनुबंध कर विज्ञप्ति निकलवाकर ठेका दिया गया है। आखिर इस तरह का खिलवाड़ उत्तराखण्ड की सरकार बेरोजगारों के साथ क्यों कर रही है। चुनाव पूर्व रोजगार के सब्जबाग दिखाने वाली कांग्रेस सत्ता नसीब होते ही उल्टी चालें चलने लगी है। दूसरी तरफ मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ४० हजार रिक्त पदों पर भर्ती का लालच बेरोजगारों को दे रहे थे। भाजपा शासनकाल में मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने भी ५० हजार पदों पर भर्ती का ढिंढोरा खूब पीटा था। लेकिन सच्चाई यह है कि आज तक समूह ग की भर्ती प्रक्रिया सरकार पूरा नहीं कर पाई है। सोचने लायक बात यह है कि ठीक चुनावों से पहले इतने पद कैसे खाली हो जाते हैं और मुख्यमंत्री को सटीक आंकड़े का पता कैसे लग जाता है। जबकि समूह ग की परीक्षा पास करने के बाद भी अभ्यर्थियों को नौकरी नहीं दी जाती है यहां के नौजवान बेरोजगारों के साथ नाइंसाफी की जाती है। सरकार ने स्वच्छ एवं साफ भर्ती प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए ठेकेदारी प्रथा को जन्म दिया जिससे बैकडोर के रास्ते खुले हैं। इससे तुच्छ एवं गुमराह करने वाले नेताओं की राजनीति चमकने लगी है। नए-नए सरकारी कॉलेज खुल रहे हैं लेकिन नियुक्तियां किस दरवाजे से हो रही हैं यह बताने के लिए कोई तैयार नहीं। न जाने किस अंधेरगर्दी की ओर कांग्रेस सरकार इस राज्य को ले जाने की तैयारी में है।

देवेन्द्र नेगी

गोपेश्वर चमोली


 
         
 
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