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vad 37 05-03-2017
 
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चुनाव पूर्व सर्वेक्षण
 
जनता का बदला मिजाज

दि संडे पोस्ट आईएमआईएस सर्वेक्षण १७ दिसंबर २०१३ से २० जनवरी २०१४ के बीच राज्य के सभी तेरह जिलों में किया गया है। कुल पांच हज़ार लोगों ने इसमें भाग लिया सर्वेक्षण में राज्य के शहरी और ग्रामीण क्षेत्र पहाड़ी और मैदानी क्षेत्र के साथ साथ सभी वर्गों के लोगों को शामिल किया गया है। कोशिश यह भी रही है कि प्रदेश के सभी सत्तर विधानसभा क्षेत्रों को इसमें समाहित किया जाये।

 

क्या आप अपने सांसद के कार्यों से संतुष्ट हैं

नहीं

सांसदों ने पिछले वादे पूरे किए

नहीं

वे आपकी समस्याएं सुनते हैं

नहीं

मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के कार्यों से संतुष्ट हैं

नहीं-नहीं-नहीं।

क्या वर्तमान सरकार में भ्रष्टाचार बढ़ा है

हां

उपरोक्त संवाद किसी कहानी उपन्यास नाटक अथवा फिल्म के किसी दृश्य का भ्रम पैदा कर सकता है। मगर ऐसा है नहीं। ये उत्तराखण्ड में कराए गए सर्वे के जवाब हैं जो वहां के मौजूदा राजनीति परिदृश्य और जन-मन का हाल बयां करते हैं। तमाम प्रश्नों के जवाब में नहीं की गूंज के बीच अंतिम प्रश्न के उत्तर में आया हां भी नहीं को ही विस्तार देता है उसकी गूंज को और गहरा करता है। बेशक सवालों के सब जवाब पूर्णतया सही नहीं होते मगर सवालों के जवाबों से सच के करीब तो पहुंचा ही जा सकता है। और उत्तराखण्ड का सच यह है कि वहां वर्तमान सरकार से लोग नाखुश हैं जनता मानती है कि बहुगुणा सरकार पिछले साल आई भीषण आपदा से निपटने में नाकाम रहीकेदारनाथ में आज भी मलबों में दबी लाशें मुख्यमंत्री की संवेदनहीनता की बानगी हैं। मौजूदा सरकार में अप्रत्याशित रूप से भ्रष्टाचार बढ़ा है। दूसरी तस्वीर वहां के सांसदों की है। असंतुष्टि का मामला सांसदों से भी जुड़ा है। सांसदों ने पिछले चुनाव में दिए गए वादे पूरे नहीं किए न ही वे जनता की पुकार सुनते हैं। इन सबने मिलाकर वहां जो चुनावी या कहें राजनीतिक माहौल रचा है वह निश्चित तौर पर कांग्रेस के खिलाफ है। कांग्रेस के प्रति जनता की इस नाराजगी का सीधा लाभ भाजपा को मिल रहा है हालांकि उसके भी करम अच्छे नहीं हैं। उसको खुद अच्छा होने की वजह से नहीं बल्कि कांग्रेस के बहुत खराब होने के चलते लीड मिल रही है। कुछ समय से भारतीय राजनीति का चेहरा बदलने का चलन बढ़ा है। इसके मूल में पवित्र और उदात्त भावना कम अगले लोकसभा चुनाव में वोट का लोभ ज्यादा है। यह मान लिया गया है कि जहां सरकार से जनता में नाराजगी है भ्रष्टाचार है छले जाने का दर्द हैवहां आप है। आप माने आम आदमी पार्टी। इसे हैरानी वाले भाव में नहीं लेना चाहिए कि अपने १२ सालों के छोटे जीवन में यह छोटा-सा राज्य भ्रष्टाचार का बहुत बड़ा अड्डा बन गया है। द्घोटाले परवान चढ़ रहे हैं। जनता परेशान है। भाजपा- कांग्रेस के दो पाटों में वह किसी नीच टे्रजेडी की तरह पिस रही है। क्षेत्रीय पार्टियों की छोटी सोच और स्वार्थ लोलुपता ने विकल्प के चिराग को भी बुझा-सा दिया। ऐसे में सियासत की नई परिभाषा गढ़ने वाली आप ने सेंधमारी की है।  इसे हैरानी वाले भाव में नहीं लेना चाहिए। यह कहना ज्यादा मुनासिब होगा कि उसने एक चिराग रोशन किया है। यही वजह है कि सर्वे के मुताबिक वहां लोकसभा चुनाव में लड़ाई भाजपा और आप के बीच है कांग्रेस तीसरे स्थान पर है। खासकर उत्तराखण्ड के शहरी क्षेत्रों में तो आप ने भाजपा से भी बढ़त ले ली है।

 

आईएमआईएस और दि संडे पोस्ट के तत्वाधान में हुए लोकसभा चुनाव पूर्व इस सर्वे को तीन दृष्टि से देखने की जरूरत है। पहला वर्तमान सांसदों के कार्यों के प्रति जनता का क्या नजरिया है। दूसरे मौजूदा मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के कार्यकाल ने जनता के मन पर क्या छाप छोड़ी है तीसरे वर्तमान परिदृश्य में आप के लिए जगह बनी है या नहीं और बनी है तो किस हद तक किस शक्लओ-सूरत में। इसके अलावा अब तक के मुख्यमंत्रियों के शासनकाल और वर्तमान मंत्रियों के बारे में लोगों का नजरिया भी इस सर्वेक्षण में शामिल है। एक-एक कर हम उन तमाम बिन्दुओं पर आते हैं और अंत में उपसंहार के तौर पर निष्कर्ष कि लोकसभा चुनाव में ऊंट किस करवट बैठेगा?

 

सबसे पहले वर्तमान सांसदों यानी जनप्रतिनिधि के बारे में जनता का मन मिजाज। इन दोनों की निकटता दूरियां और परस्पर संबंधों के बारे में। कुछ बातें। सर्वेक्षण की माने तो प्रदेश की ८० प्रतिशत से ज्यादा जनता अपने सांसदों से खफा है। संतुष्ट रहने वाली जनता की तादाद महज १७ ़६९ फीसदी है। दुनिया में कोई भी चीज बेवजह नहीं होती। जनता की यह नाराजगी भी बेवजह नहीं है। इसकी माकूल वजहें हैं जो सर्वे के अन्य सवालों  के जवाब बता देते हैं। जब जनता से यह पूछा गया कि पिछले चुनाव के दौरान आपके सांसदों ने जो वादे किए क्या वे पूरे हुए? इस सवाल का जवाब ८३ ़०४ फीसदी लोगों ने नहीं में दिया। हां कहने वाले १३ ़२४ प्रतिशत थे। किसी वादे को पूरा करना या वादाखिलाफी बहुत हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि जिनसे वादा किया गया है उनके प्रति आप कितने कंसर्न और संवेदनशील है? इसका खुलासा भी सांसदों से जुड़े अन्य प्रश्नों के आए उत्तर दे देते हैं। मसलन सांसदों की उपलब्धता से जुड़े प्रश्न का जवाब ८९ ़४ फीसदी जनता ने नकारात्मक दिया। यानी इन्हें जनप्रतिनिधि आसानी से उपलब्ध नहीं होते। केवल १८ ़३३ प्रतिशत जनता ने स्वीकारा कि उनके सांसद भ्रमण पर आते हैं। इसके उलट ७७ ़६ फीसदी लोगों की राय थी कि सांसद अपने क्षेत्रों में नहीं आते। इसी से जुड़ा दूसरा प्रश्न था कि सांसद क्या आपकी समस्या सुनते हैं। इसके जवाब संतोष देने वाले नहीं हैं। इस बाबत ७६ ़०७ फीसदी लोगों ने नकारात्मक जवाब दिया और जब अपने-अपने सांसदों को उनकी कार्यशैली और पांच साल तक के किए गए कामों की एवज में नंबर देने की बारी आई तो यहां भी जनता के भीतर मायूसी ही उभर कर सामने आई। मतलब ७२ ़१९ फीसदी लोगों ने रिपोर्ट कार्ड में अपने सांसदों को फेल कर दिया? उन्होंने १० में से सिर्फ चार या उससे कम नंबर दिए। छह से ज्यादा नंबर देने वाले मात्र ७ ़५८ प्रतिशत ही थे।

 
         
 
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क्या मुख्यमंत्री हरीश रावत के सचिव के स्टिंग आॅपरेशन की खबर से कांग्रेस की छवि प्रभावित हुई है?

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  • गुंजन कुमार

इस बार का विधानसभा चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री हरीश रावत के बीच केंद्रित रहा। मोदी ने जहां चार रैलियां की वहीं रावत

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